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धर्म के आधार पर आवास से इनकार: गरिमा, समानता और संवैधानिक नैतिकता पर Justice Ujjal Bhuyan की सशक्त टिप्पणी

धर्म के आधार पर आवास से इनकार: गरिमा, समानता और संवैधानिक नैतिकता पर Justice Ujjal Bhuyan की सशक्त टिप्पणी

दिल्ली जैसे महानगर में उच्च शिक्षा के लिए आई एक शोधार्थी छात्रा को केवल उसके मुस्लिम नाम के कारण आवास देने से मना कर दिया जाता है—यह घटना केवल एक निजी विवाद नहीं, बल्कि भारतीय संविधान की मूल आत्मा पर सीधा प्रश्नचिह्न है। हाल ही में न्यायमूर्ति Ujjal Bhuyan द्वारा की गई टिप्पणी ने इस मुद्दे को न्यायिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म के आधार पर किसी को आवास से वंचित करना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह मानव गरिमा और समानता के सिद्धांतों के विरुद्ध भी है।

यह प्रसंग उस समय सामने आया जब एक छात्रा, जो नोएडा की एक निजी विश्वविद्यालय में पीएच.डी. कर रही है, दक्षिण दिल्ली में एक कार्यरत महिला छात्रावास में कमरा देखने गई। प्रारंभ में उसका नाम “अस्पष्ट” लगा, परंतु जैसे ही उपनाम से उसकी मुस्लिम पहचान उजागर हुई, मकान मालकिन ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि “कमरा उपलब्ध नहीं है।” यह कथन केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि समाज में गहरे बैठे पूर्वाग्रहों का प्रतीक है।


1. घटना का सामाजिक संदर्भ

भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा का अधिकार देता है। फिर भी, शहरी जीवन में “नो मुस्लिम”, “नो नॉर्थ-ईस्ट”, “नो बैचलर” जैसे अनौपचारिक नियमों का प्रचलन एक चिंताजनक सामाजिक प्रवृत्ति को दर्शाता है। किराये के मकानों और छात्रावासों में पहचान के आधार पर चयन या अस्वीकृति एक प्रकार का “सॉफ्ट डिस्क्रिमिनेशन” है—जो कानूनी रूप से भले स्पष्ट शब्दों में परिभाषित न हो, परंतु संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है।

दक्षिण दिल्ली जैसे क्षेत्र में, जहाँ शिक्षा और रोजगार के अवसर प्रचुर हैं, वहाँ इस प्रकार की अस्वीकृति सामाजिक समरसता को कमजोर करती है। यह घटना केवल एक छात्रा की नहीं, बल्कि उन हजारों युवाओं की है जो अपनी पहचान छुपाने या बदलने के लिए मजबूर हो जाते हैं।


2. न्यायमूर्ति Ujjal Bhuyan की टिप्पणी का महत्व

न्यायमूर्ति Ujjal Bhuyan ने इस प्रकार की घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि धर्म के आधार पर भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 की भावना के प्रतिकूल है।

  • अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समानता
  • अनुच्छेद 15: धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव का निषेध

यद्यपि निजी संपत्ति के स्वामित्व का अधिकार भी एक संवैधानिक संरक्षण प्राप्त अधिकार है, परंतु जब उसका उपयोग किसी नागरिक की गरिमा को ठेस पहुँचाने के लिए किया जाता है, तो वह संवैधानिक नैतिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

न्यायमूर्ति भुइयाँ ने यह भी रेखांकित किया कि भारत की विविधता उसकी शक्ति है। यदि नागरिकों को उनके नाम या पहचान के आधार पर अलग-थलग किया जाएगा, तो यह सामाजिक ताने-बाने को क्षति पहुँचाएगा।


3. निजी स्वतंत्रता बनाम सार्वजनिक नैतिकता

यह प्रश्न उठता है कि क्या एक निजी मकान मालिक को यह अधिकार है कि वह अपनी पसंद के अनुसार किरायेदार चुने? सामान्यतः उत्तर “हाँ” है। परंतु जब चयन की प्रक्रिया किसी विशेष समुदाय को लक्षित कर बहिष्कृत करती है, तो यह केवल निजी पसंद नहीं रह जाती—यह संरचनात्मक भेदभाव का रूप ले लेती है।

भारत में अभी तक “फेयर हाउसिंग लॉ” (Fair Housing Law) जैसा कोई व्यापक कानून नहीं है, जो निजी आवास में भेदभाव को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करे। परिणामस्वरूप, पीड़ितों को न्याय पाने के लिए संवैधानिक प्रावधानों या मानवाधिकार आयोगों का सहारा लेना पड़ता है।


4. गरिमा (Dignity) का संवैधानिक आयाम

भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि “गरिमा” (Dignity) संविधान का मूल तत्व है। किसी व्यक्ति को उसके धर्म के कारण सार्वजनिक रूप से अस्वीकार करना उसकी आत्मसम्मान और गरिमा पर आघात है।

जब एक छात्रा, जो अपने शैक्षणिक भविष्य के लिए संघर्ष कर रही है, केवल अपने नाम के कारण अस्वीकृत होती है, तो यह संदेश जाता है कि उसकी पहचान उसके योग्यता से अधिक महत्वपूर्ण है। यह स्थिति न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि लोकतांत्रिक आदर्शों के भी विपरीत है।


5. महानगरों में ‘अनौपचारिक गेटोकरण’

दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे शहरों में कई बार देखा गया है कि कुछ इलाकों में विशेष समुदायों का ही निवास है। यह “गेटोकरण” (Ghettoisation) सामाजिक दूरी को और बढ़ाता है। जब मकान मालिक खुले या छिपे रूप में किसी समुदाय को मना करते हैं, तो वे अनजाने में ही विभाजन को प्रोत्साहित करते हैं।

इस घटना ने पुनः यह प्रश्न खड़ा किया है कि क्या भारत में विविधता के साथ सह-अस्तित्व की भावना कमजोर हो रही है?


6. महिला छात्रावास और सुरक्षा का तर्क

अक्सर मकान मालिक सुरक्षा, खान-पान या सांस्कृतिक भिन्नताओं का हवाला देकर भेदभाव को उचित ठहराने का प्रयास करते हैं। परंतु यहाँ स्पष्ट रूप से धर्म ही कारण था। यदि कोई छात्रावास “वर्किंग वूमेन्स हॉस्टल” के रूप में संचालित हो रहा है, तो उसका दायित्व है कि वह सभी महिलाओं को समान अवसर दे।

धर्म के आधार पर अस्वीकृति न तो सुरक्षा से जुड़ी है, न प्रशासनिक सुविधा से—यह केवल पूर्वाग्रह का परिणाम है।


7. न्यायपालिका की भूमिका

भारतीय न्यायपालिका ने कई ऐतिहासिक निर्णयों में समानता और गरिमा को सर्वोपरि रखा है। न्यायमूर्ति भुइयाँ की टिप्पणी इसी परंपरा का विस्तार है। यह संदेश स्पष्ट है कि संवैधानिक मूल्यों को केवल सरकारी संस्थानों में ही नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार में भी लागू होना चाहिए।

यद्यपि यह मामला प्रत्यक्ष रूप से किसी मुकदमे का विषय न भी बने, फिर भी न्यायालय की टिप्पणी सामाजिक चेतना को झकझोरने का कार्य करती है।


8. समाधान की दिशा

  1. कानूनी सुधार: निजी आवास में भेदभाव को रोकने के लिए स्पष्ट कानून की आवश्यकता है।
  2. जागरूकता अभियान: सामाजिक पूर्वाग्रहों को समाप्त करने के लिए शिक्षा और संवाद आवश्यक है।
  3. संवैधानिक नैतिकता का प्रचार: नागरिकों को यह समझना होगा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व में संतुलन आवश्यक है।

9. निष्कर्ष: संविधान की आत्मा का प्रश्न

यह घटना केवल एक छात्रा की कहानी नहीं, बल्कि उस संघर्ष का प्रतीक है जो भारत जैसे बहुलतावादी समाज में समानता के लिए जारी है। न्यायमूर्ति Ujjal Bhuyan की टिप्पणी हमें याद दिलाती है कि संविधान केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि एक जीवंत नैतिक संहिता है।

यदि नागरिकों को उनके नाम, धर्म या पहचान के आधार पर अलग किया जाएगा, तो यह न केवल उनके अधिकारों का हनन है, बल्कि राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए भी खतरा है।

भारत की शक्ति उसकी विविधता में है—और उस विविधता का सम्मान करना ही सच्ची देशभक्ति और संवैधानिक प्रतिबद्धता है।