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“भ्रमित करने वाली मध्यस्थता शर्तें पेशेवर दुराचार के समान” : 20 फरवरी की सुनवाई में Supreme Court of India की सख्त टिप्पणी

“भ्रमित करने वाली मध्यस्थता शर्तें पेशेवर दुराचार के समान” : 20 फरवरी की सुनवाई में Supreme Court of India की सख्त टिप्पणी

20 फरवरी की सुनवाई में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कानून फर्मों द्वारा तैयार की जा रही “कन्फ्यूज़िंग” (भ्रमित करने वाली) मध्यस्थता धाराओं पर तीखी आपत्ति दर्ज की। न्यायालय ने कहा कि अस्पष्ट, परस्पर-विरोधी या तकनीकी रूप से त्रुटिपूर्ण आर्बिट्रेशन क्लॉज़ ऐसे विवाद पैदा कर देती हैं जिन्हें टाला जा सकता था—और इस तरह वे पहले से ही बोझिल अदालतों पर अनावश्यक मुकदमों का दबाव बढ़ाती हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि यह प्रवृत्ति पेशेवर दुराचार (professional misconduct) की सीमा तक पहुंचती है।

यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है; यह पूरे कॉरपोरेट व विधिक परिदृश्य के लिए चेतावनी है कि अनुबंध-लेखन में लापरवाही या रणनीतिक अस्पष्टता न्यायिक समय की बर्बादी का कारण बनती है।


1. पृष्ठभूमि: मध्यस्थता का उद्देश्य और वास्तविकता

भारत में वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) को प्रोत्साहित करने के लिए 1996 में मध्यस्थता एवं सुलह कानून लागू किया गया। इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य था—त्वरित, गोपनीय और विशेषज्ञ-आधारित विवाद निपटान

लेकिन व्यवहार में अक्सर यह देखा गया है कि विवाद का मुख्य मुद्दा मेरिट (merits) नहीं, बल्कि यह बन जाता है कि:

  • क्या वास्तव में वैध आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट है?
  • कौन-सा संस्थान या नियम लागू होंगे?
  • एकल मध्यस्थ होगा या पैनल?
  • नियुक्ति की प्रक्रिया क्या होगी?
  • सीट (seat) और वेन्यू (venue) क्या है?

जब क्लॉज़ अस्पष्ट हो, तो पक्षकार पहले ही चरण में अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं—जिससे वही मुकदमेबाजी शुरू हो जाती है जिसे टालने के लिए मध्यस्थता चुनी गई थी।


2. सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी का सार

Supreme Court of India ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि:

  • अनुबंध तैयार करते समय पेशेवर सावधानी अपेक्षित है।
  • यदि कानून फर्म जानबूझकर या लापरवाही से अस्पष्ट शर्तें लिखती हैं, तो इससे अनावश्यक मुकदमेबाजी उत्पन्न होती है।
  • अदालतों का समय कीमती है; उसे तकनीकी त्रुटियों के समाधान में व्यर्थ नहीं किया जा सकता।

न्यायालय की यह टिप्पणी उस व्यापक चिंता को दर्शाती है कि भारत की अदालतें पहले से ही लंबित मामलों के भारी बोझ से जूझ रही हैं। ऐसे में यदि अनुबंध-लेखन की कमियों के कारण विवाद पैदा हों, तो यह न्यायिक संसाधनों का दुरुपयोग है।


3. “कन्फ्यूज़िंग” आर्बिट्रेशन क्लॉज़ की सामान्य समस्याएँ

अस्पष्टता कई रूपों में सामने आती है:

  1. हाइब्रिड क्लॉज़ – जिसमें एक ही अनुबंध में अलग-अलग संस्थागत नियमों का उल्लेख हो।
  2. सीट और वेन्यू का भ्रम – उदाहरण के लिए, “विवाद दिल्ली में सुना जाएगा” पर यह स्पष्ट न हो कि कानूनी सीट कौन-सी है।
  3. नियुक्ति प्रक्रिया का विरोधाभास – एक जगह एकल मध्यस्थ, दूसरी जगह तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल।
  4. कानून और अधिकार क्षेत्र का टकराव – लागू कानून अलग, पर न्यायालय अधिकार क्षेत्र किसी अन्य स्थान का।

इन त्रुटियों के कारण अक्सर पहले यह तय करने में वर्षों लग जाते हैं कि मध्यस्थता की प्रक्रिया कैसे शुरू होगी।


4. पेशेवर दायित्व और नैतिकता

कानून फर्म और अधिवक्ता केवल अपने मुवक्किल के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि न्याय प्रणाली के अधिकारी (officers of the court) भी माने जाते हैं।

अनुबंध-लेखन में उनकी जिम्मेदारी है कि वे:

  • स्पष्ट, सुसंगत और लागू करने योग्य शर्तें तैयार करें;
  • संभावित विवादों को न्यूनतम करें;
  • क्लॉज़ को न्यायिक परीक्षण में टिकाऊ बनाएं।

यदि लापरवाही या रणनीतिक अस्पष्टता से विवाद बढ़ते हैं, तो यह केवल क्लाइंट के प्रति ही नहीं, बल्कि न्याय प्रणाली के प्रति भी जिम्मेदारी का उल्लंघन है।


5. न्यायिक दृष्टिकोण: हालिया प्रवृत्तियाँ

पिछले कुछ वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने मध्यस्थता कानून की व्याख्या में “प्रो-आर्बिट्रेशन” रुख अपनाया है। उद्देश्य यह रहा है कि:

  • अदालतें न्यूनतम हस्तक्षेप करें;
  • प्रक्रिया शीघ्र शुरू हो;
  • मध्यस्थता को प्रभावी बनाया जाए।

लेकिन यदि क्लॉज़ ही अस्पष्ट हो, तो अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ता है—जो इस नीति के विपरीत है। 20 फरवरी की टिप्पणी इसी पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है।


6. लंबित मामलों का संदर्भ

भारत की अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं। ऐसे में यदि हर व्यावसायिक अनुबंध में अस्पष्ट मध्यस्थता धारा हो और प्रत्येक विवाद अदालत तक पहुंचे, तो यह न्यायिक प्रणाली पर अतिरिक्त बोझ डालेगा।

न्यायालय का संदेश स्पष्ट है: अनुबंध-लेखन की गुणवत्ता सुधारना भी न्याय सुधार का हिस्सा है।


7. कॉरपोरेट क्षेत्र पर प्रभाव

इस टिप्पणी के बाद संभवतः:

  • बड़ी कंपनियाँ अपने मानक अनुबंधों (standard form contracts) की समीक्षा करेंगी।
  • कानून फर्में ड्राफ्टिंग प्रोटोकॉल कड़े करेंगी।
  • क्लॉज़ में स्पष्ट रूप से सीट, नियम, भाषा और नियुक्ति प्रक्रिया का उल्लेख किया जाएगा।

कॉरपोरेट गवर्नेंस के दृष्टिकोण से भी यह आवश्यक है कि अनुबंध विवाद-निरोधक (dispute preventive) हों, न कि विवाद-उत्पादक।


8. संभावित अनुशासनात्मक परिणाम

यदि किसी विशेष मामले में यह सिद्ध हो कि ड्राफ्टिंग में गंभीर पेशेवर लापरवाही थी, तो संबंधित अधिवक्ताओं के विरुद्ध बार काउंसिल के समक्ष शिकायत संभव है।

हालांकि न्यायालय की टिप्पणी सामान्य चेतावनी के रूप में थी, पर यह संकेत अवश्य है कि भविष्य में गंभीर मामलों में अनुशासनात्मक कार्रवाई से इंकार नहीं किया जाएगा।


9. सुधार के उपाय

  1. मानकीकृत क्लॉज़ का उपयोग – प्रतिष्ठित संस्थानों के मॉडल क्लॉज़ अपनाए जाएं।
  2. डबल-लेयर समीक्षा – ड्राफ्टिंग के बाद स्वतंत्र कानूनी समीक्षा।
  3. स्पष्ट भाषा – तकनीकी जटिलता से बचना।
  4. सीट और कानून का स्पष्ट निर्धारण – विवाद की स्थिति में अधिकार क्षेत्र स्पष्ट हो।

10. निष्कर्ष

20 फरवरी की सुनवाई में Supreme Court of India की टिप्पणी केवल आलोचना नहीं, बल्कि सुधार का आह्वान है।

भ्रमित करने वाली मध्यस्थता धाराएँ न केवल पक्षकारों के समय और संसाधनों की बर्बादी करती हैं, बल्कि न्यायिक प्रणाली पर अनावश्यक दबाव भी डालती हैं। यदि कानून फर्में अनुबंध-लेखन में पेशेवर सावधानी नहीं बरततीं, तो यह पेशेवर दायित्व का उल्लंघन माना जा सकता है।

मध्यस्थता का उद्देश्य अदालतों का बोझ कम करना है, न कि नए विवाद पैदा करना। इसलिए स्पष्ट, सुसंगत और न्यायसंगत ड्राफ्टिंग ही वह मार्ग है जिससे भारत में मध्यस्थता तंत्र को वास्तव में प्रभावी बनाया जा सकता है।