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“घृणा-अपराध की अनदेखी नहीं चलेगी” : Supreme Court of India

“घृणा-अपराध की अनदेखी नहीं चलेगी” : Supreme Court of India की तीखी टिप्पणियों के बाद Uttar Pradesh Police ने काज़ीम अहमद शेरवानी प्रकरण में जांच पर सहमति दी

भारत के संवैधानिक ढांचे में धार्मिक पहचान के आधार पर हिंसा या धमकी को केवल एक आपराधिक कृत्य नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने पर सीधा आघात माना जाता है। ऐसे मामलों में राज्य की निष्पक्ष और त्वरित कार्रवाई नागरिकों के मौलिक अधिकारों—विशेषकर अनुच्छेद 14 (समानता), 19 (अभिव्यक्ति) और 21 (जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता)—की रक्षा के लिए अनिवार्य है।

इसी पृष्ठभूमि में, 2021 में नोएडा के एक मुस्लिम धर्मगुरु काज़ीम अहमद शेरवानी पर कथित रूप से धार्मिक पहचान के आधार पर हुए हमले के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की तीखी टिप्पणियों के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा घृणा-अपराध (hate crime) के पहलुओं की जांच पर सहमति देना एक महत्वपूर्ण संस्थागत विकास माना जा रहा है। यह कदम न केवल एक विशिष्ट मामले की प्रगति है, बल्कि व्यापक रूप से यह संदेश भी देता है कि धार्मिक पहचान पर आधारित हिंसा की जांच में शिथिलता स्वीकार्य नहीं होगी।


1. प्रकरण की पृष्ठभूमि

मामले के अनुसार, 2021 में नोएडा क्षेत्र में काज़ीम अहमद शेरवानी—जो एक स्थानीय मुस्लिम धर्मगुरु के रूप में जाने जाते हैं—पर कथित रूप से कुछ व्यक्तियों के समूह ने हमला किया। आरोप यह था कि हमला उनकी धार्मिक पहचान को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियों और शारीरिक हिंसा के साथ हुआ।

शुरुआती स्तर पर दर्ज अपराधों में सामान्य धाराएं लगाई गईं, परंतु पीड़ित पक्ष का कहना था कि घटना का वास्तविक स्वरूप घृणा-अपराध का था—अर्थात अपराध का प्रेरक तत्व (motive) धार्मिक पहचान थी। यही बिंदु आगे चलकर न्यायिक जांच का केंद्र बना।


2. सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका और टिप्पणियाँ

जब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पहुंचा, तो न्यायालय ने जांच की दिशा और गंभीरता पर प्रश्न उठाए। Supreme Court of India ने स्पष्ट संकेत दिया कि यदि किसी अपराध में धार्मिक पहचान के आधार पर हमला करने के आरोप हों, तो जांच एजेंसियों का दायित्व है कि वे उस कोण (angle) की विधिवत जांच करें।

न्यायालय की टिप्पणियों का सार यह था कि:

  • जांच केवल औपचारिकता न हो;
  • अपराध के पीछे के उद्देश्य (motive) का परीक्षण अनिवार्य है;
  • यदि धार्मिक घृणा की संभावना हो, तो संबंधित धाराएं और साक्ष्य एकत्र किए जाएं।

न्यायालय का यह दृष्टिकोण इस व्यापक सिद्धांत से मेल खाता है कि कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं, और किसी भी समुदाय के विरुद्ध लक्षित हिंसा को विशेष संवेदनशीलता के साथ देखा जाना चाहिए।


3. घृणा-अपराध (Hate Crime) की अवधारणा

भारतीय दंड विधान में “हेट क्राइम” शब्द का स्वतंत्र परिभाषित प्रावधान भले न हो, किंतु विभिन्न धाराओं के माध्यम से धार्मिक, जातीय या सामुदायिक आधार पर हिंसा को दंडनीय बनाया गया है। उदाहरणार्थ:

  • धार्मिक भावनाओं को आहत करने से संबंधित प्रावधान,
  • समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने वाली गतिविधियां,
  • आपराधिक धमकी, मारपीट और शारीरिक चोट की धाराएं।

यदि यह सिद्ध हो कि अपराध का मूल उद्देश्य किसी व्यक्ति को उसकी धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाना था, तो अपराध की गंभीरता और न्यायिक दृष्टिकोण दोनों प्रभावित होते हैं।

घृणा-अपराध केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं होता; वह उस समुदाय को संदेश देने का प्रयास भी हो सकता है जिससे पीड़ित जुड़ा है। इसलिए इसकी जांच में सामान्य अपराध से अधिक संवेदनशीलता अपेक्षित होती है।


4. उत्तर प्रदेश पुलिस की सहमति: संस्थागत प्रतिक्रिया

सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों के बाद Uttar Pradesh Police ने मामले में घृणा-अपराध के पहलुओं की जांच पर सहमति दी। यह सहमति न्यायालय के समक्ष दर्ज हुई और इससे यह संकेत गया कि राज्य एजेंसियां न्यायालय की चिंता को गंभीरता से ले रही हैं।

इस निर्णय के व्यावहारिक निहितार्थ निम्नलिखित हो सकते हैं:

  1. जांच का पुनर्मूल्यांकन (re-evaluation);
  2. घटना के वीडियो, प्रत्यक्षदर्शियों और डिजिटल साक्ष्यों की पुनः जांच;
  3. आरोपी व्यक्तियों के कथित बयान और सोशल मीडिया गतिविधियों का परीक्षण;
  4. धार्मिक अपशब्दों या नफरत भरे नारों के साक्ष्य का विश्लेषण।

5. संवैधानिक परिप्रेक्ष्य

भारतीय संविधान का ढांचा बहुलतावाद (pluralism) और धर्मनिरपेक्षता (secularism) पर आधारित है। अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है।

यदि किसी व्यक्ति को उसकी धार्मिक पहचान के कारण लक्षित किया जाता है, तो यह केवल दंड संहिता का प्रश्न नहीं, बल्कि संविधान के मूल ढांचे से जुड़ा विषय बन जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय पूर्व में भी यह कह चुका है कि राज्य का कर्तव्य है कि वह न केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखे, बल्कि अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।


6. न्यायिक सक्रियता और पुलिस विवेक

यह प्रश्न अक्सर उठता है कि जांच एजेंसियों को कितना विवेकाधिकार (discretion) प्राप्त है और न्यायालय किस सीमा तक हस्तक्षेप कर सकता है।

न्यायालय का हस्तक्षेप तब उचित माना जाता है जब:

  • जांच में स्पष्ट चूक दिखाई दे;
  • पक्षपात या लापरवाही का आरोप हो;
  • या संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का प्रश्न हो।

इस मामले में न्यायालय की टिप्पणियों को जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है, न कि जांच एजेंसी के कार्य में अनावश्यक दखल के रूप में।


7. सामाजिक प्रभाव

घृणा-अपराधों की जांच और अभियोजन केवल कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश भी है।

यदि ऐसे अपराधों को सामान्य मारपीट या झगड़े के रूप में दर्ज कर लिया जाए, तो इससे पीड़ित समुदाय में असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो सकती है। वहीं, यदि स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया जाए कि धार्मिक पहचान के आधार पर हमला अस्वीकार्य है, तो इससे कानून के प्रति विश्वास बढ़ता है।


8. मीडिया और सार्वजनिक विमर्श

इस प्रकार के मामलों में मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। तथ्यों की पुष्टि किए बिना सनसनीखेज रिपोर्टिंग कभी-कभी सामुदायिक तनाव बढ़ा सकती है।

सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व में यह भी कहा है कि संवेदनशील मामलों में संयमित भाषा और जिम्मेदार रिपोर्टिंग आवश्यक है।


9. आगे की राह

अब जबकि उत्तर प्रदेश पुलिस ने घृणा-अपराध के पहलुओं की जांच पर सहमति दी है, अगला महत्वपूर्ण चरण होगा:

  • निष्पक्ष और समयबद्ध जांच;
  • आरोप-पत्र (charge sheet) में स्पष्ट निष्कर्ष;
  • यदि पर्याप्त साक्ष्य हों तो प्रभावी अभियोजन।

न्याय की प्रक्रिया पारदर्शी और विधि-सम्मत होनी चाहिए, ताकि परिणाम चाहे जो हो, उस पर सार्वजनिक विश्वास बना रहे।


10. निष्कर्ष

काज़ीम अहमद शेरवानी प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियां और उसके बाद उत्तर प्रदेश पुलिस की सहमति यह दर्शाती है कि न्यायिक संस्थाएं धार्मिक पहचान के आधार पर कथित हमलों को हल्के में लेने के पक्ष में नहीं हैं।

Supreme Court of India का रुख यह स्पष्ट करता है कि जांच का दायरा व्यापक होना चाहिए और यदि घृणा-प्रेरित अपराध का कोण हो, तो उसे विधिवत जांचा जाना चाहिए।

साथ ही, Uttar Pradesh Police की सहमति संस्थागत जवाबदेही की दिशा में एक सकारात्मक कदम है।

अंततः, यह प्रकरण हमें याद दिलाता है कि विधि शासन (Rule of Law) का वास्तविक अर्थ केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी भी नागरिक को उसकी पहचान के कारण भय में न जीना पड़े। धार्मिक विविधता भारत की शक्ति है—और कानून का दायित्व है कि वह इस विविधता की रक्षा करे।