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धारा 66A का आलोचनात्मक परीक्षण तथा Shreya Singhal v. Union of India के आलोक में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और साइबर स्पेस का संतुलन

धारा 66A का आलोचनात्मक परीक्षण तथा Shreya Singhal v. Union of India के आलोक में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और साइबर स्पेस का संतुलन


1. प्रस्तावना

डिजिटल युग में अभिव्यक्ति के साधन व्यापक और तीव्र हो गए हैं। सोशल मीडिया, ब्लॉग, ई-मेल और मैसेजिंग प्लेटफ़ॉर्म ने नागरिकों को अपनी बात रखने का अभूतपूर्व मंच दिया है। किंतु यही मंच गलत सूचना, अपमानजनक टिप्पणियों, घृणा-भाषण और धमकियों के लिए भी प्रयुक्त होने लगा। इस पृष्ठभूमि में Information Technology Act, 2000 की धारा 66A जोड़ी गई (2008 संशोधन), जिसका उद्देश्य ऑनलाइन संचार में “आपत्तिजनक” संदेशों पर अंकुश लगाना था।

समस्या तब उत्पन्न हुई जब इस प्रावधान की भाषा अत्यंत व्यापक, अस्पष्ट और व्यक्तिपरक निकली। परिणामस्वरूप, कई मामलों में सामान्य अभिव्यक्ति को भी अपराध मानकर गिरफ़्तारियाँ हुईं। अंततः 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने Shreya Singhal प्रकरण में धारा 66A को असंवैधानिक घोषित कर दिया। यह निर्णय भारतीय संवैधानिक विधि में अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य और डिजिटल विनियमन के संतुलन का मील का पत्थर है।


2. धारा 66A : उद्देश्य और पाठ

धारा 66A के अंतर्गत किसी कंप्यूटर संसाधन या संचार उपकरण के माध्यम से ऐसा संदेश भेजना दंडनीय था जो—

  1. “अत्यंत आपत्तिजनक” (grossly offensive) हो;
  2. “धमकीपूर्ण” (menacing) हो;
  3. झूठी जानकारी हो जिसे कष्ट, असुविधा, बाधा, अपमान, शत्रुता या द्वेष उत्पन्न करने के उद्देश्य से भेजा गया हो;
  4. बार-बार ऐसे संदेश भेजे गए हों जिससे उत्पीड़न हो।

दंड: तीन वर्ष तक का कारावास और जुर्माना।

उद्देश्य था— ऑनलाइन उत्पीड़न, स्पैम, धमकी और अशांति को रोकना। परंतु विधिक शब्दावली की अस्पष्टता ने इसे विवादास्पद बना दिया।


3. धारा 66A की प्रमुख कमियाँ (आलोचनात्मक परीक्षण)

(क) अत्यधिक अस्पष्टता (Vagueness)

“Grossly offensive”, “annoyance”, “inconvenience”, “ill will” जैसे शब्दों की कोई स्पष्ट विधिक परिभाषा नहीं थी। आपत्तिजनक क्या है, यह व्यक्तिपरक है—जो एक व्यक्ति के लिए अपमानजनक हो, दूसरे के लिए नहीं। आपराधिक कानून में स्पष्टता (certainty) अनिवार्य है; अन्यथा नागरिकों को यह ज्ञात नहीं होगा कि कौन-सा आचरण दंडनीय है।

(ख) अत्यधिक व्यापकता (Overbreadth)

धारा 66A का दायरा इतना व्यापक था कि वैध राजनीतिक आलोचना, व्यंग्य या असहमति भी इसके घेरे में आ सकती थी। इससे chilling effect उत्पन्न हुआ—लोग गिरफ्तारी के भय से वैध अभिव्यक्ति से भी बचने लगे।

(ग) अनुच्छेद 19(1)(a) से टकराव

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत ही राज्य “यथोचित प्रतिबंध” लगा सकता है—जैसे राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, मानहानि, अश्लीलता आदि। धारा 66A में प्रयुक्त आधार 19(2) में निर्दिष्ट श्रेणियों से स्पष्ट रूप से मेल नहीं खाते थे।

(घ) अनुपातिकता का अभाव (Lack of Proportionality)

तीन वर्ष तक के कारावास का प्रावधान मामूली या तुच्छ अभिव्यक्तियों पर भी लागू हो सकता था। यह दंड अपराध की गंभीरता के अनुपात में नहीं था।

(ङ) मनमानी प्रवर्तन की संभावना

पुलिस को व्यापक विवेकाधिकार मिल गया था, जिसके कारण कई मामलों में सोशल मीडिया पोस्ट या “लाइक/शेयर” के आधार पर गिरफ्तारी हुई। इससे विधि का दुरुपयोग बढ़ा।


4. Shreya Singhal वाद : पृष्ठभूमि और मुद्दे

इस वाद में याचिकाकर्ताओं ने धारा 66A की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी। प्रश्न था—क्या धारा 66A अनुच्छेद 19(1)(a) का उल्लंघन करती है? क्या इसे अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत उचित प्रतिबंध माना जा सकता है?

साथ ही, अदालत के समक्ष यह भी मुद्दा था कि इंटरनेट अभिव्यक्ति को पारंपरिक माध्यमों की तुलना में अधिक नियंत्रित किया जा सकता है या नहीं।


5. सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने 24 मार्च 2015 को धारा 66A को पूर्णतः असंवैधानिक घोषित कर दिया। न्यायालय ने निम्न प्रमुख आधारों पर निर्णय दिया:

(क) अस्पष्टता और अनिश्चितता

न्यायालय ने कहा कि आपराधिक कानून स्पष्ट और सुस्पष्ट होना चाहिए। “Grossly offensive” जैसे शब्दों की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है; अतः नागरिकों को यह ज्ञात नहीं होगा कि कौन-सा आचरण अपराध है।

(ख) Discussion, Advocacy, Incitement का भेद

न्यायालय ने महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किया—

  • Discussion (चर्चा) और
  • Advocacy (समर्थन)
    संविधान के संरक्षण में आते हैं।
    केवल Incitement (उकसावा) जो हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था की ओर ले जाए, वही दंडनीय हो सकता है।

धारा 66A इस भेद का सम्मान नहीं करती थी।

(ग) Chilling Effect

न्यायालय ने माना कि इस धारा का अस्तित्व ही नागरिकों में भय उत्पन्न करता है, जिससे वे वैध अभिव्यक्ति से भी बचते हैं। यह लोकतंत्र के लिए घातक है।

(घ) अनुच्छेद 19(2) से असंगति

धारा 66A में प्रयुक्त आधार—जैसे “annoyance” या “inconvenience”—अनुच्छेद 19(2) में निर्दिष्ट नहीं हैं; अतः इन्हें वैध प्रतिबंध नहीं माना जा सकता।


6. साइबर स्पेस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता : संतुलन का प्रश्न

(क) डिजिटल मंच की विशिष्टता

इंटरनेट की पहुँच व्यापक और त्वरित है; संदेश तुरंत लाखों लोगों तक पहुँच सकते हैं। इसलिए राज्य का तर्क था कि ऑनलाइन अभिव्यक्ति का प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है।

(ख) न्यायालय का दृष्टिकोण

न्यायालय ने कहा कि माध्यम (medium) के आधार पर अभिव्यक्ति के अधिकार में भेद नहीं किया जा सकता। इंटरनेट भी उतना ही संरक्षित है जितना प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया।

(ग) यथोचित प्रतिबंध की आवश्यकता

हालाँकि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि घृणा-भाषण, मानहानि, अश्लीलता, राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा जैसे मामलों में अन्य वैध प्रावधान लागू रहेंगे। धारा 66A हटने का अर्थ यह नहीं कि साइबर स्पेस पूर्णतः अनियंत्रित हो गया।


7. निर्णय का प्रभाव

  1. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुदृढ़ संरक्षण मिला।
  2. पुलिस के मनमाने अधिकारों पर अंकुश लगा।
  3. डिजिटल लोकतंत्र को प्रोत्साहन मिला।
  4. विधायिका को स्पष्ट और संतुलित कानून बनाने का संदेश गया।

हालाँकि व्यवहार में कुछ समय तक धारा 66A के अंतर्गत मुकदमे दर्ज होते रहे, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि निर्णय के प्रभावी कार्यान्वयन हेतु प्रशासनिक सतर्कता भी आवश्यक है।


8. आलोचनात्मक दृष्टि

कुछ विद्वानों का मत है कि धारा 66A को पूर्णतः निरस्त करने के बजाय संशोधित किया जा सकता था। उनका तर्क है कि ऑनलाइन उत्पीड़न और धमकियों के विरुद्ध एक विशिष्ट प्रावधान आवश्यक था।

परंतु प्रतिवाद यह है कि मौजूदा दंड संहिता और अन्य प्रावधान पर्याप्त थे; समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि प्रवर्तन की थी।

अतः सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य की रक्षा के पक्ष में अधिक संगत प्रतीत होता है।


9. निष्कर्ष

धारा 66A का उद्देश्य भले ही साइबर स्पेस को सुरक्षित बनाना था, किंतु उसकी भाषा और संरचना ने उसे दमनकारी बना दिया। Shreya Singhal निर्णय ने स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र में असहमति, आलोचना और तीखी अभिव्यक्ति भी संरक्षित है, जब तक वह हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था को उकसाती न हो।

यह निर्णय डिजिटल युग में संविधान की आत्मा की पुनर्पुष्टि है। साइबर स्पेस में संतुलन का अर्थ अभिव्यक्ति का दमन नहीं, बल्कि स्पष्ट, सीमित और अनुपातिक प्रतिबंध है।

अंततः, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और साइबर विनियमन के बीच संतुलन वही है जो संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(2) के बीच निहित है—स्वतंत्रता मूल है, प्रतिबंध अपवाद।