इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख एवं डिजिटल हस्ताक्षर की विधिक मान्यता : Information Technology Act, 2000 के आलोक में प्रमाणन प्राधिकारियों (Certifying Authorities) की भूमिका
1. प्रस्तावना
इक्कीसवीं शताब्दी को सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (Information and Communication Technology) की शताब्दी कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कंप्यूटर, इंटरनेट और मोबाइल तकनीक ने मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया है। आज सरकारी अभिलेख, बैंकिंग लेन–देन, व्यापारिक अनुबंध, शैक्षणिक प्रमाणपत्र और न्यायिक दस्तावेज़ तक डिजिटल स्वरूप में उपलब्ध हैं।
डिजिटल युग में सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि इलेक्ट्रॉनिक रूप में तैयार दस्तावेज़ों को किस प्रकार कानूनी मान्यता दी जाए तथा उनकी प्रामाणिकता और विश्वसनीयता कैसे सुनिश्चित की जाए। इसी उद्देश्य से भारत में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 को लागू किया गया, जिसने इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों (Electronic Records) और डिजिटल हस्ताक्षरों (Digital Signatures) को वैधानिक मान्यता प्रदान की।
यह लेख इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों और डिजिटल हस्ताक्षरों की विधिक स्थिति का विस्तृत विश्लेषण करता है तथा अधिनियम के अंतर्गत प्रमाणन प्राधिकारियों (Certifying Authorities) की भूमिका को स्पष्ट करता है।
2. इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख (Electronic Records) की अवधारणा
इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख वह सूचना या डेटा है जो कंप्यूटर, मोबाइल, सर्वर या किसी अन्य डिजिटल माध्यम में इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में तैयार, संग्रहीत या प्रेषित किया जाता है।
सरल शब्दों में, कोई भी सूचना जो कागज़ पर न होकर डिजिटल रूप में मौजूद हो, इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख कहलाती है। उदाहरण के लिए—
- ई-मेल
- पीडीएफ दस्तावेज़
- ऑनलाइन फॉर्म
- डिजिटल प्रमाणपत्र
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 ने इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों को कागज़ी दस्तावेज़ों के समान कानूनी मान्यता प्रदान की है।
3. इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों की विधिक मान्यता
(क) सामान्य सिद्धांत
अधिनियम का मूल सिद्धांत यह है कि जहाँ किसी कानून में लिखित (written) या हस्ताक्षरित (signed) दस्तावेज़ की आवश्यकता है, वहाँ इलेक्ट्रॉनिक रूप में उपलब्ध दस्तावेज़ भी वैध होंगे, यदि वे अधिनियम में निर्धारित शर्तों का पालन करते हों।
(ख) मान्यता का प्रभाव
- सरकारी कार्यालयों में ई-फाइलिंग संभव हुई।
- ई-गवर्नेंस को बढ़ावा मिला।
- कागज़ रहित प्रशासन की दिशा में कदम बढ़ा।
(ग) सुरक्षा और अखंडता
इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों की वैधता तभी मानी जाएगी जब उनकी अखंडता (integrity) और प्रामाणिकता सुनिश्चित हो। इसका अर्थ है कि दस्तावेज़ में बिना अनुमति कोई परिवर्तन न हुआ हो और उसका स्रोत प्रमाणित हो।
4. डिजिटल हस्ताक्षर (Digital Signatures) की अवधारणा
डिजिटल हस्ताक्षर एक क्रिप्टोग्राफिक तकनीक पर आधारित इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर है, जिसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता और अखंडता सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है।
डिजिटल हस्ताक्षर निम्नलिखित बातों की पुष्टि करता है—
- दस्तावेज़ किस व्यक्ति द्वारा भेजा गया है।
- दस्तावेज़ में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है।
- प्रेषक दस्तावेज़ से इंकार नहीं कर सकता (Non-repudiation)।
5. डिजिटल हस्ताक्षर की विधिक मान्यता
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 ने डिजिटल हस्ताक्षरों को हस्तलिखित हस्ताक्षरों के समान कानूनी मान्यता दी है।
इस मान्यता के कारण—
- ऑनलाइन अनुबंध वैध हुए।
- ई-टेंडरिंग और ई-प्रोक्योरमेंट संभव हुआ।
- डिजिटल प्रमाणपत्रों का उपयोग बढ़ा।
डिजिटल हस्ताक्षर तभी वैध माने जाते हैं जब वे सुरक्षित डिजिटल हस्ताक्षर (Secure Digital Signature) हों और किसी मान्यता प्राप्त प्रमाणन प्राधिकारी द्वारा जारी किए गए डिजिटल प्रमाणपत्र पर आधारित हों।
6. इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख एवं डिजिटल हस्ताक्षर : परस्पर संबंध
इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख दस्तावेज़ का डिजिटल स्वरूप है, जबकि डिजिटल हस्ताक्षर उस दस्तावेज़ की प्रामाणिकता का साधन है। दोनों मिलकर डिजिटल लेन–देन को सुरक्षित बनाते हैं।
यदि केवल इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख हो और डिजिटल हस्ताक्षर न हो, तो उसकी प्रामाणिकता संदिग्ध हो सकती है। इसी प्रकार, डिजिटल हस्ताक्षर का उपयोग केवल इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों के साथ ही संभव है।
7. प्रमाणन प्राधिकारी (Certifying Authorities) की अवधारणा
प्रमाणन प्राधिकारी वह संस्था या प्राधिकरण है जो डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र (Digital Signature Certificate – DSC) जारी करता है।
ये प्रमाणपत्र यह प्रमाणित करते हैं कि—
- प्रमाणपत्र धारक की पहचान सही है।
- उसका सार्वजनिक कुंजी (Public Key) वास्तविक है।
भारत में प्रमाणन प्राधिकारियों को सरकार द्वारा लाइसेंस प्रदान किया जाता है।
8. प्रमाणन प्राधिकारियों की भूमिका
(क) डिजिटल प्रमाणपत्र जारी करना
प्रमाणन प्राधिकारी व्यक्ति या संस्था की पहचान सत्यापित कर डिजिटल प्रमाणपत्र जारी करता है।
(ख) प्रमाणपत्रों का नवीनीकरण
समय-समय पर डिजिटल प्रमाणपत्रों का नवीनीकरण किया जाता है।
(ग) प्रमाणपत्रों का निरस्तीकरण
यदि किसी प्रमाणपत्र का दुरुपयोग हो या धारक की पहचान संदिग्ध हो, तो उसे निरस्त किया जा सकता है।
(घ) प्रमाणपत्र डेटाबेस का रख-रखाव
प्रमाणन प्राधिकारी सभी जारी और निरस्त प्रमाणपत्रों का रिकॉर्ड रखता है।
(ङ) सुरक्षा मानकों का पालन
उच्च स्तरीय सुरक्षा तकनीकों का उपयोग सुनिश्चित करना।
9. नियंत्रक (Controller of Certifying Authorities)
अधिनियम के अंतर्गत एक नियंत्रक की नियुक्ति की जाती है जो—
- प्रमाणन प्राधिकारियों को लाइसेंस देता है।
- उनके कार्यों की निगरानी करता है।
- नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई करता है।
10. इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख एवं डिजिटल हस्ताक्षर की व्यावहारिक उपयोगिता
- ई-गवर्नेंस
- ई-कॉमर्स
- ऑनलाइन बैंकिंग
- न्यायालयों में ई-फाइलिंग
- शैक्षणिक प्रमाणपत्रों का डिजिटलीकरण
11. चुनौतियाँ
- साइबर सुरक्षा खतरे
- तकनीकी ज्ञान की कमी
- फर्जी डिजिटल प्रमाणपत्रों की संभावना
12. सुधार की आवश्यकता
- जागरूकता कार्यक्रम
- तकनीकी प्रशिक्षण
- सख्त प्रवर्तन
13. निष्कर्ष
इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों और डिजिटल हस्ताक्षरों को विधिक मान्यता देकर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 ने भारत को डिजिटल युग में एक मजबूत कानूनी आधार प्रदान किया है। प्रमाणन प्राधिकारियों की भूमिका इस पूरे ढाँचे की रीढ़ है, क्योंकि वे डिजिटल विश्वास (Digital Trust) की स्थापना करते हैं।
इस प्रकार, इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख, डिजिटल हस्ताक्षर और प्रमाणन प्राधिकारी मिलकर भारत के साइबर विधिक ढाँचे को सुदृढ़ बनाते हैं तथा डिजिटल शासन और व्यापार को नई दिशा प्रदान करते हैं।
नीचे इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख, डिजिटल हस्ताक्षर तथा Information Technology Act, 2000 से संबंधित 5 महत्वपूर्ण Short Answer Type प्रश्न–उत्तर दिए जा रहे हैं:
1. इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख (Electronic Record) क्या है?
उत्तर:
इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख वह सूचना या डेटा है जो कंप्यूटर, मोबाइल या किसी अन्य डिजिटल माध्यम में इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में तैयार, संग्रहीत या प्रेषित किया जाता है।
2. डिजिटल हस्ताक्षर (Digital Signature) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
डिजिटल हस्ताक्षर एक क्रिप्टोग्राफिक तकनीक आधारित इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर है, जो इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज़ की प्रामाणिकता और अखंडता सुनिश्चित करता है।
3. डिजिटल हस्ताक्षर की विधिक मान्यता का क्या अर्थ है?
उत्तर:
इसका अर्थ है कि डिजिटल हस्ताक्षर को कानून द्वारा हस्तलिखित हस्ताक्षर के समान वैध माना गया है।
4. प्रमाणन प्राधिकारी (Certifying Authority) की भूमिका क्या है?
उत्तर:
प्रमाणन प्राधिकारी डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र जारी करता है तथा धारक की पहचान सत्यापित करता है।
5. नियंत्रक (Controller of Certifying Authorities) का मुख्य कार्य क्या है?
उत्तर:
नियंत्रक प्रमाणन प्राधिकारियों को लाइसेंस देना, उनके कार्यों की निगरानी करना और नियम उल्लंघन पर कार्रवाई करना है।