अधिभोग प्रमाण पत्र के बिना कब्ज़ा, सेवा में कमी और उपभोक्ता मंचों की शक्ति : Parsvnath Developers Ltd. v. Mohit Khirbat (Civil Appeal No. 5289/2022) पर सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय (20.02.2026)
भारत में रियल एस्टेट क्षेत्र से जुड़े विवादों में उपभोक्ताओं की सबसे बड़ी शिकायत समय पर कब्ज़ा न मिलना, अधूरे निर्माण के साथ फ्लैट सौंपना, अथवा अधिभोग प्रमाण पत्र (Occupancy Certificate) के बिना कब्ज़ा देना रही है। 20 फरवरी 2026 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में बिल्डर की अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि आवास निर्माण “सेवा” के अंतर्गत आता है, और कब्ज़ा देने में देरी या अधिभोग प्रमाण पत्र के बिना कब्ज़ा देना “सेवा में कमी” (Deficiency in Service) है।
यह निर्णय Supreme Court of India द्वारा Parsvnath Developers Ltd. v. Mohit Khirbat में पारित किया गया, जिसमें बिल्डर Parsvnath Developers Ltd. की अपील को खारिज कर दिया गया।
1. वाद की पृष्ठभूमि
प्रतिवादी उपभोक्ता मोहित खिरबत ने बिल्डर के साथ एक आवासीय फ्लैट खरीदने का समझौता किया था। समझौते में एक निश्चित अवधि के भीतर निर्माण पूर्ण कर कब्ज़ा देने का वादा किया गया था। किंतु बिल्डर द्वारा:
- निर्धारित समयसीमा में निर्माण पूर्ण नहीं किया गया,
- कब्ज़ा देने में अत्यधिक विलंब किया गया,
- और सबसे महत्वपूर्ण — अधिभोग प्रमाण पत्र (Occupancy Certificate) के बिना ही कब्ज़ा देने का प्रयास किया गया।
उपभोक्ता ने इसे “सेवा में कमी” बताते हुए उपभोक्ता मंच का दरवाज़ा खटखटाया। राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने उपभोक्ता के पक्ष में आदेश पारित किया। इसके विरुद्ध बिल्डर ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की।
2. प्रमुख विधिक प्रश्न
न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न निम्न थे—
- क्या आवास निर्माण “सेवा” की परिभाषा में आता है?
- क्या संविदा में वर्णित शर्तें (जैसे विलंब पर सीमित मुआवज़ा) उपभोक्ता मंचों को बाध्य करती हैं?
- क्या अधिभोग प्रमाण पत्र के बिना कब्ज़ा देना वैध है?
- क्या समयसीमा के भीतर कब्ज़ा न देना “सेवा में कमी” है?
3. आवास निर्माण “सेवा” है – न्यायालय की पुनर्पुष्टि
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 2(1)(o) के अंतर्गत आवास निर्माण एक सेवा है।
अतः जब कोई बिल्डर उपभोक्ता से धन लेकर फ्लैट निर्माण का वादा करता है, तो वह सेवा प्रदान कर रहा है। यदि वह सेवा समय पर या विधिसम्मत तरीके से प्रदान नहीं की जाती, तो यह “सेवा में कमी” मानी जाएगी।
यह सिद्धांत पूर्व में भी विभिन्न निर्णयों में स्थापित किया जा चुका है, किंतु इस निर्णय ने इसे पुनः दृढ़ता से दोहराया।
4. संविदात्मक शर्तें बनाम उपभोक्ता अधिकार
बिल्डर का तर्क था कि समझौते में विलंब की स्थिति में एक सीमित दर से मुआवज़ा देने का प्रावधान है, अतः उपभोक्ता मंच उस सीमा से अधिक मुआवज़ा नहीं दे सकता।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा—
- यदि संविदात्मक शर्तें एकतरफा (one-sided) या दमनकारी (oppressive) हों,
- और उपभोक्ता के पास मोलभाव की वास्तविक शक्ति न हो,
तो उपभोक्ता मंच ऐसी शर्तों से परे जाकर न्यायोचित मुआवज़ा दे सकता है।
न्यायालय ने माना कि बिल्डर-खरीदार समझौते प्रायः “स्टैंडर्ड फॉर्म कॉन्ट्रैक्ट” होते हैं, जिनमें उपभोक्ता के पास शर्तों में परिवर्तन का कोई अवसर नहीं होता। ऐसी स्थिति में न्यायालय निष्पक्षता और न्याय के सिद्धांतों के आधार पर हस्तक्षेप कर सकता है।
5. कब्ज़ा देने में देरी = सेवा में कमी
न्यायालय ने कहा कि यदि बिल्डर संविदा में निर्धारित अवधि के भीतर कब्ज़ा देने में विफल रहता है, तो यह स्वतः “सेवा में कमी” है।
समयसीमा कोई औपचारिकता मात्र नहीं है; यह उपभोक्ता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व है।
कई उपभोक्ता अपने जीवन की बचत, बैंक ऋण, और भविष्य की योजनाएँ इस अपेक्षा पर आधारित करते हैं कि उन्हें समय पर आवास मिलेगा। अतः अनावश्यक देरी केवल संविदा का उल्लंघन नहीं, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों का अतिक्रमण है।
6. अधिभोग प्रमाण पत्र (Occupancy Certificate) का महत्व
इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि न्यायालय ने स्पष्ट कहा—
अधिभोग प्रमाण पत्र के बिना कब्ज़ा देना सेवा में कमी है।
अधिभोग प्रमाण पत्र स्थानीय प्राधिकरण द्वारा जारी किया जाता है, जो यह प्रमाणित करता है कि—
- निर्माण स्वीकृत नक्शे के अनुरूप है,
- भवन सुरक्षा मानकों का पालन करता है,
- आवश्यक नागरिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
यदि बिना इस प्रमाण पत्र के कब्ज़ा दिया जाता है, तो—
- भवन की वैधता संदिग्ध रहती है,
- उपभोक्ता को पानी, बिजली, सीवर जैसी सुविधाओं में कठिनाई हो सकती है,
- भविष्य में विधिक जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं।
न्यायालय ने माना कि अधिभोग प्रमाण पत्र के अभाव में दिया गया कब्ज़ा अधूरा और अवैध है।
7. उपभोक्ता मंचों की शक्तियाँ
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उपभोक्ता मंच—
- वास्तविक हानि का आकलन कर सकते हैं,
- मानसिक पीड़ा और असुविधा के लिए मुआवज़ा दे सकते हैं,
- संविदा की दमनकारी शर्तों को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं,
- और न्यायसंगत प्रतिकर निर्धारित कर सकते हैं।
यह निर्णय उपभोक्ता मंचों की शक्तियों की पुनः पुष्टि करता है।
8. बिल्डर की अपील क्यों खारिज हुई?
सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि—
- विलंब असंगत और अनुचित था,
- अधिभोग प्रमाण पत्र के बिना कब्ज़ा देने का प्रयास किया गया,
- संविदात्मक शर्तें उपभोक्ता के हितों के प्रतिकूल थीं।
अतः बिल्डर की अपील में कोई विधिक बल नहीं था और उसे खारिज कर दिया गया।
9. व्यापक प्रभाव
यह निर्णय रियल एस्टेट क्षेत्र पर गहरा प्रभाव डालेगा—
(1) बिल्डर्स के लिए संदेश
समयसीमा का पालन अनिवार्य है। अधिभोग प्रमाण पत्र के बिना कब्ज़ा देने से कानूनी दायित्व उत्पन्न होंगे।
(2) उपभोक्ताओं के लिए राहत
उपभोक्ता अब अधिक आत्मविश्वास से अपने अधिकारों की रक्षा कर सकेंगे।
(3) न्यायिक दृष्टिकोण
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आर्थिक शक्ति के असंतुलन की स्थिति में न्यायालय उपभोक्ता के पक्ष में हस्तक्षेप करेगा।
10. पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टिकोण से सामंजस्य
यह निर्णय उपभोक्ता संरक्षण के व्यापक सिद्धांतों के अनुरूप है, जिनका उद्देश्य—
- निष्पक्ष व्यापार,
- पारदर्शिता,
- और उपभोक्ता हितों की रक्षा है।
हालाँकि मामला उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत था, इसके सिद्धांत वर्तमान उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 में भी समान रूप से लागू होते हैं।
11. निष्कर्ष
Parsvnath Developers Ltd. v. Mohit Khirbat का निर्णय उपभोक्ता न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि—
- आवास निर्माण सेवा है,
- देरी सेवा में कमी है,
- अधिभोग प्रमाण पत्र के बिना कब्ज़ा अवैध है,
- और उपभोक्ता मंच संविदा से परे जाकर न्यायोचित मुआवज़ा दे सकते हैं।
यह निर्णय केवल एक अपील का निपटारा नहीं है, बल्कि रियल एस्टेट क्षेत्र को अनुशासन में लाने की दिशा में एक सशक्त संदेश है।
उपभोक्ता संरक्षण के क्षेत्र में यह फैसला न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों की पुनः पुष्टि करता है।