अधिवक्ता के अधिकार (Rights of an Advocate): एक विस्तृत विवेचना
भूमिका
अधिवक्ता (Advocate) विधि-प्रणाली का एक अनिवार्य अंग है। न्यायालय, मुवक्किल और समाज के बीच सेतु के रूप में कार्य करते हुए अधिवक्ता न केवल अपने मुवक्किल के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि न्याय के प्रशासन में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिवक्ता की स्वतंत्रता, गरिमा और अधिकारों की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि एक सशक्त और स्वतंत्र अधिवक्ता ही प्रभावी रूप से न्याय दिलाने में सक्षम होता है।
भारत में अधिवक्ताओं के अधिकारों को मुख्य रूप से अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) तथा Bar Council of India द्वारा बनाए गए नियमों के माध्यम से मान्यता दी गई है। इन अधिकारों का उद्देश्य अधिवक्ताओं को निर्भय होकर अपने पेशे का निर्वहन करने में सक्षम बनाना तथा विधि-व्यवसाय की गरिमा बनाए रखना है।
1. अधिवक्ता के अधिकारों का अर्थ और स्वरूप
अधिवक्ता के अधिकार वे विधिक शक्तियाँ और विशेषाधिकार हैं, जिनके माध्यम से वह अपने पेशे का स्वतंत्र, निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से अभ्यास कर सकता है। ये अधिकार केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि न्याय के व्यापक हित में प्रदान किए गए हैं।
अधिवक्ता के अधिकारों को मोटे तौर पर निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है—
- प्रैक्टिस करने का अधिकार
- न्यायालय के समक्ष उपस्थिति और बहस का अधिकार
- मुवक्किल से संबंधित अधिकार
- पेशेवर स्वतंत्रता से जुड़े अधिकार
- पारिश्रमिक (फीस) से संबंधित अधिकार
- सम्मान और संरक्षण से संबंधित अधिकार
2. प्रैक्टिस करने का अधिकार (Right to Practise)
(क) सभी न्यायालयों में प्रैक्टिस करने का अधिकार
अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 30 के अनुसार, प्रत्येक अधिवक्ता जिसे राज्य बार काउंसिल में नामांकित किया गया है, उसे—
- भारत के सभी न्यायालयों,
- अधिकरणों (Tribunals),
- तथा विधिक प्राधिकरणों के समक्ष
प्रैक्टिस करने का अधिकार प्राप्त है।
यह अधिकार अधिवक्ता को पूरे देश में विधि व्यवसाय करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
(ख) समान अवसर का अधिकार
कोई भी न्यायालय या प्राधिकरण किसी अधिवक्ता को मनमाने ढंग से प्रैक्टिस करने से नहीं रोक सकता, जब तक कि वह कानून द्वारा अयोग्य घोषित न किया गया हो।
3. न्यायालय के समक्ष उपस्थिति और बहस का अधिकार
अधिवक्ता को अपने मुवक्किल की ओर से—
- दलीलें प्रस्तुत करने,
- साक्ष्य पर जिरह करने,
- आवेदन और याचिकाएँ दाखिल करने,
- तथा कानूनी तर्क रखने
का अधिकार है।
यह अधिकार न्याय के प्रशासन का मूल आधार है, क्योंकि इसके बिना मुवक्किल अपनी बात प्रभावी ढंग से न्यायालय के समक्ष नहीं रख सकता।
4. मुवक्किल का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार
अधिवक्ता को यह अधिकार है कि वह—
- मुवक्किल की ओर से वकालतनामा प्रस्तुत करे,
- उसके लिए मुकदमा दायर करे या बचाव करे,
- तथा उसके हितों की रक्षा करे।
यह अधिकार अधिवक्ता और मुवक्किल के बीच विश्वासपूर्ण संबंध पर आधारित होता है।
5. पेशेवर स्वतंत्रता का अधिकार (Professional Independence)
अधिवक्ता को अपने पेशे का निर्वहन करते समय—
- किसी राजनीतिक दबाव,
- प्रशासनिक हस्तक्षेप,
- या बाहरी प्रभाव
से मुक्त रहना चाहिए।
पेशेवर स्वतंत्रता अधिवक्ता के अधिकारों की आत्मा है। यदि अधिवक्ता स्वतंत्र नहीं होगा, तो वह न्याय के पक्ष में निर्भय होकर खड़ा नहीं हो सकेगा।
6. पारिश्रमिक (फीस) प्राप्त करने का अधिकार
अधिवक्ता को अपने द्वारा दी गई सेवाओं के लिए उचित पारिश्रमिक प्राप्त करने का अधिकार है।
(क) फीस निर्धारण
अधिवक्ता और मुवक्किल के बीच आपसी सहमति से फीस तय की जा सकती है।
(ख) फीस की वसूली
यदि मुवक्किल उचित फीस का भुगतान नहीं करता, तो अधिवक्ता विधिक उपायों के माध्यम से अपनी फीस की वसूली कर सकता है।
7. सम्मान और गरिमा का अधिकार
अधिवक्ता को—
- न्यायालय,
- मुवक्किल,
- सह-अधिवक्ताओं,
- तथा समाज
द्वारा सम्मानित किए जाने का अधिकार है।
न्यायालयों ने अनेक बार यह कहा है कि अधिवक्ता के साथ अपमानजनक व्यवहार न्याय-प्रणाली की गरिमा को ठेस पहुँचाता है।
8. पेशागत संघ बनाने और सदस्य बनने का अधिकार
अधिवक्ता को यह अधिकार है कि वह—
- बार एसोसिएशन का सदस्य बने,
- पेशागत संगठनों में भाग ले,
- तथा सामूहिक रूप से अपने हितों की रक्षा करे।
यह अधिकार अधिवक्ताओं की एकता और सामूहिक शक्ति को बढ़ाता है।
9. न्यायिक कार्यवाही में संरक्षण का अधिकार
अधिवक्ता को न्यायालय में कही गई बातों या पेशेवर कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कार्यों के लिए सामान्यतः दंडात्मक कार्रवाई से संरक्षण प्राप्त होता है, बशर्ते उसका आचरण सद्भावना में किया गया हो।
10. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित अधिकार
अधिवक्ता को विधिक मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त करने, लेख लिखने, सेमिनारों में भाग लेने और विधिक सुधारों पर सुझाव देने का अधिकार है। यह अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है।
11. समानता का अधिकार
अधिवक्ता को कानून के समक्ष समानता का अधिकार प्राप्त है। किसी भी अधिवक्ता के साथ जाति, धर्म, लिंग या भाषा के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता।
12. अधिकारों के साथ कर्तव्य
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि अधिवक्ता के अधिकार निरंकुश नहीं हैं। उनके साथ कुछ कर्तव्य भी जुड़े हुए हैं—
- न्यायालय के प्रति सम्मान
- मुवक्किल के प्रति निष्ठा
- पेशागत नैतिकता का पालन
अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं।
13. अधिकारों के उल्लंघन के परिणाम
यदि किसी अधिवक्ता के अधिकारों का उल्लंघन किया जाता है, तो वह—
- न्यायालय में गुहार लगा सकता है,
- बार काउंसिल से शिकायत कर सकता है,
- या उपयुक्त संवैधानिक उपाय अपना सकता है।
14. अधिवक्ता के अधिकारों का महत्व
- न्याय तक प्रभावी पहुँच सुनिश्चित होती है।
- अधिवक्ता निर्भय होकर कार्य कर सकता है।
- जनता का न्याय-प्रणाली में विश्वास बढ़ता है।
- विधि-शासन सुदृढ़ होता है।
निष्कर्ष
अधिवक्ता के अधिकार केवल व्यक्तिगत विशेषाधिकार नहीं हैं, बल्कि वे न्याय-प्रणाली की प्रभावशीलता के लिए अनिवार्य साधन हैं। एक स्वतंत्र, सम्मानित और सशक्त अधिवक्ता ही समाज में न्याय, समानता और विधि-शासन की स्थापना कर सकता है।
अतः कहा जा सकता है कि अधिवक्ता के अधिकारों की रक्षा करना वास्तव में न्याय-प्रणाली की रक्षा करना है।