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अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अंतर्गत अधिवक्ताओं के नामांकन (Enrolment) से संबंधित उपबंधों का विस्तृत विवेचन

अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अंतर्गत अधिवक्ताओं के नामांकन (Enrolment) से संबंधित उपबंधों का विस्तृत विवेचन


भूमिका

भारत में विधि व्यवसाय (Legal Profession) को सुव्यवस्थित, संगठित एवं नियंत्रित करने के उद्देश्य से संसद द्वारा अधिवक्ता अधिनियम, 1961 पारित किया गया। यह अधिनियम अधिवक्ताओं के नामांकन, उनके अधिकारों, कर्तव्यों, अनुशासनात्मक नियंत्रण तथा बार काउंसिलों की स्थापना से संबंधित एक समग्र विधान है।

किसी भी व्यक्ति को न्यायालयों में विधि व्यवसाय करने का अधिकार तभी प्राप्त होता है जब उसका नाम विधिवत रूप से राज्य बार काउंसिल की सूची में अधिवक्ता के रूप में दर्ज हो। अतः अधिवक्ता अधिनियम, 1961 में अधिवक्ताओं के नामांकन से संबंधित उपबंध अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

भारत में विधि व्यवसाय को नियंत्रित करने वाली सर्वोच्च संस्था Bar Council of India है, जो अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अंतर्गत गठित की गई है।


1. नामांकन (Enrolment) का अर्थ

नामांकन का अर्थ है—किसी व्यक्ति का विधिवत रूप से राज्य बार काउंसिल की अधिवक्ताओं की सूची में पंजीकृत होना।
नामांकन के पश्चात ही व्यक्ति को “अधिवक्ता” का दर्जा प्राप्त होता है और वह विधि व्यवसाय करने का अधिकारी बनता है।


2. अधिवक्ता अधिनियम, 1961 का उद्देश्य

अधिवक्ताओं के नामांकन संबंधी उपबंधों का मुख्य उद्देश्य है—

  • विधि व्यवसाय में केवल योग्य और सक्षम व्यक्तियों को प्रवेश देना
  • पेशे की गरिमा बनाए रखना
  • एक समान और पारदर्शी प्रक्रिया स्थापित करना

3. अधिवक्ताओं के नामांकन से संबंधित प्रमुख धाराएँ

अधिवक्ता अधिनियम, 1961 में अध्याय III (Sections 16 से 28) अधिवक्ताओं के नामांकन से संबंधित है।


3.1 धारा 16 – अधिवक्ताओं के वर्ग (Classes of Advocates)

इस धारा के अनुसार अधिवक्ताओं को दो वर्गों में विभाजित किया गया है—

  1. वरिष्ठ अधिवक्ता (Senior Advocates)
  2. अन्य अधिवक्ता (Other Advocates)

वरिष्ठ अधिवक्ता वे होते हैं जिन्हें उनकी योग्यता, अनुभव और प्रतिष्ठा के आधार पर यह दर्जा दिया जाता है।


3.2 धारा 17 – राज्य बार काउंसिल द्वारा अधिवक्ताओं की सूची (State Roll)

प्रत्येक राज्य बार काउंसिल एक सूची (Roll) बनाए रखेगी जिसमें उस राज्य में नामांकित सभी अधिवक्ताओं के नाम दर्ज होंगे।

इस सूची में निम्नलिखित विवरण होते हैं—

  • अधिवक्ता का नाम
  • पता
  • नामांकन की तिथि

3.3 धारा 18 – सूची का प्रमाणित प्रतिलिपि

राज्य बार काउंसिल द्वारा बनाई गई अधिवक्ताओं की सूची की प्रमाणित प्रति सार्वजनिक निरीक्षण के लिए उपलब्ध होगी।


3.4 धारा 19 – बार काउंसिल ऑफ इंडिया को सूचना

प्रत्येक राज्य बार काउंसिल को अपने राज्य में नामांकित अधिवक्ताओं की सूची Bar Council of India को भेजनी होती है।


3.5 धारा 20 – एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरण

यदि कोई अधिवक्ता अपना नामांकन एक राज्य बार काउंसिल से दूसरे राज्य बार काउंसिल में स्थानांतरित कराना चाहता है, तो वह आवेदन कर सकता है।


3.6 धारा 21 – विशेष सूची

बार काउंसिल ऑफ इंडिया किसी विशेष वर्ग के अधिवक्ताओं के लिए पृथक सूची बना सकती है।


3.7 धारा 22 – नामांकन प्रमाणपत्र (Certificate of Enrolment)

राज्य बार काउंसिल प्रत्येक नामांकित अधिवक्ता को नामांकन प्रमाणपत्र जारी करेगी।
यह प्रमाणपत्र इस बात का प्रमाण होता है कि व्यक्ति विधिवत रूप से अधिवक्ता है।


4. अधिवक्ता के रूप में नामांकन की योग्यताएँ (Section 24)

धारा 24 के अनुसार, कोई व्यक्ति तभी अधिवक्ता के रूप में नामांकित हो सकता है जब—

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. उसने किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से विधि की डिग्री प्राप्त की हो।
  3. उसने निर्धारित आयु पूरी कर ली हो।
  4. उसने आवश्यक नामांकन शुल्क अदा किया हो।

5. नामांकन हेतु अयोग्यताएँ (Section 24A)

निम्नलिखित व्यक्ति अधिवक्ता के रूप में नामांकित नहीं हो सकते—

  1. जिसे किसी नैतिक अधमता (Moral Turpitude) वाले अपराध में दोषसिद्ध किया गया हो।
  2. जिसे किसी विधि द्वारा पदच्युत (Dismissed) किया गया हो।
  3. जो मानसिक रूप से अक्षम हो।

6. नामांकन की प्रक्रिया

(क) आवेदन

इच्छुक व्यक्ति को राज्य बार काउंसिल में आवेदन करना होता है।

(ख) जाँच

राज्य बार काउंसिल आवेदन की जाँच करती है।

(ग) निर्णय

यदि सभी शर्तें पूरी हों, तो नामांकन कर दिया जाता है।


7. नामांकन से इंकार और अपील (Section 26)

यदि राज्य बार काउंसिल नामांकन से इंकार करती है, तो आवेदक बार काउंसिल ऑफ इंडिया में अपील कर सकता है।


8. नामांकन का प्रभाव

नामांकन के पश्चात अधिवक्ता को—

  • सभी न्यायालयों में प्रैक्टिस करने का अधिकार
  • विधिक परामर्श देने का अधिकार

प्राप्त होता है।


9. नामांकन और अनुशासनात्मक नियंत्रण

नामांकन केवल अधिकार प्रदान नहीं करता, बल्कि अधिवक्ता को अनुशासनात्मक नियंत्रण के अधीन भी करता है।
यदि अधिवक्ता पेशागत दुराचार करता है, तो उसके विरुद्ध कार्यवाही की जा सकती है।


10. नामांकन संबंधी उपबंधों का महत्व

  • विधि व्यवसाय की गुणवत्ता सुनिश्चित होती है
  • अयोग्य व्यक्तियों को पेशे में प्रवेश से रोका जाता है
  • जनता का विश्वास बना रहता है

11. न्यायिक दृष्टिकोण

न्यायालयों ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि अधिवक्ता अधिनियम का उद्देश्य विधि व्यवसाय की गरिमा बनाए रखना है और नामांकन की प्रक्रिया इस उद्देश्य की पूर्ति का महत्वपूर्ण साधन है।


निष्कर्ष

अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अंतर्गत अधिवक्ताओं के नामांकन से संबंधित उपबंध विधि व्यवसाय की नींव हैं। ये उपबंध यह सुनिश्चित करते हैं कि केवल योग्य, सक्षम और नैतिक व्यक्ति ही इस महान पेशे में प्रवेश करें।

अतः कहा जा सकता है कि नामांकन संबंधी प्रावधान न केवल अधिवक्ताओं के अधिकारों को स्थापित करते हैं, बल्कि न्याय-प्रणाली की शुद्धता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।