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अधिवक्ता (Advocate) कौन है? अधिवक्ता के रूप में नामांकन (Enrolment) हेतु आवश्यक योग्यताएँ: एक विस्तृत अध्ययन

अधिवक्ता (Advocate) कौन है? अधिवक्ता के रूप में नामांकन (Enrolment) हेतु आवश्यक योग्यताएँ: एक विस्तृत अध्ययन


भूमिका

विधि-व्यवस्था (Legal System) किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला होती है। इस व्यवस्था को प्रभावी ढंग से संचालित करने में अधिवक्ता (Advocate) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। अधिवक्ता न केवल अपने मुवक्किल का प्रतिनिधित्व करता है, बल्कि वह न्यायालय का अधिकारी (Officer of the Court) भी माना जाता है। उसका दायित्व केवल मुकदमे लड़ना ही नहीं, बल्कि न्याय के प्रशासन में सहयोग देना, विधि की गरिमा बनाए रखना और समाज में विधि-शासन (Rule of Law) को सुदृढ़ करना भी होता है।

इसी कारण यह आवश्यक है कि अधिवक्ता बनने के लिए कुछ निश्चित योग्यताएँ, मानक और प्रक्रियाएँ निर्धारित हों। भारत में अधिवक्ताओं के नामांकन तथा पेशे को नियंत्रित करने का कार्य मुख्यतः Bar Council of India एवं राज्य बार काउंसिलों द्वारा किया जाता है।


भाग – I

अधिवक्ता (Advocate) की परिभाषा और अर्थ

1. अधिवक्ता का सामान्य अर्थ

साधारण शब्दों में, अधिवक्ता वह व्यक्ति है जो विधि का ज्ञान रखता हो और जिसे विधिक रूप से न्यायालयों, अधिकरणों (Tribunals) अथवा अन्य विधिक मंचों पर पक्षकारों का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार प्राप्त हो।

2. विधिक अर्थ में अधिवक्ता

भारतीय विधि के अनुसार, अधिवक्ता वह व्यक्ति है जिसका नाम किसी राज्य बार काउंसिल की सूची में नामांकित (enrolled) हो और जो विधि व्यवसाय करने का अधिकारी हो।

इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि केवल विधि की डिग्री प्राप्त करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि विधिवत नामांकन होना भी आवश्यक है।


भाग – II

अधिवक्ता की भूमिका और महत्व

अधिवक्ता की भूमिका बहुआयामी होती है—

  1. मुवक्किल का प्रतिनिधि
  2. न्यायालय का अधिकारी
  3. विधि का व्याख्याता
  4. समाज का मार्गदर्शक

अधिवक्ता न केवल कानूनी विवादों का समाधान करता है, बल्कि सामाजिक न्याय, मानवाधिकारों की रक्षा और संवैधानिक मूल्यों की स्थापना में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।


भाग – III

अधिवक्ता के रूप में नामांकन (Enrolment) का अर्थ

नामांकन का अर्थ है किसी व्यक्ति का विधिवत रूप से राज्य बार काउंसिल की सूची में अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत होना। नामांकन के पश्चात ही व्यक्ति को न्यायालयों में प्रैक्टिस करने का अधिकार प्राप्त होता है।


भाग – IV

अधिवक्ता के रूप में नामांकन हेतु आवश्यक योग्यताएँ

भारत में अधिवक्ता बनने के लिए कुछ आवश्यक योग्यताएँ निर्धारित की गई हैं, जिन्हें निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत समझा जा सकता है—


1. शैक्षणिक योग्यता (Educational Qualification)

अधिवक्ता बनने के लिए सबसे पहली और आवश्यक योग्यता विधि की डिग्री है।

(क) मान्यता प्राप्त विधि डिग्री

व्यक्ति को किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से—

  • तीन वर्षीय LL.B. (Three Year LL.B.)
    या
  • पाँच वर्षीय एकीकृत विधि पाठ्यक्रम (Five Year Integrated Law Course – जैसे BA LL.B., BBA LL.B., B.Sc. LL.B. आदि)

पूरा किया होना चाहिए।

(ख) विश्वविद्यालय की मान्यता

डिग्री उस विश्वविद्यालय से प्राप्त होनी चाहिए जो विधि शिक्षा प्रदान करने के लिए सक्षम प्राधिकारी द्वारा मान्यता प्राप्त हो।


2. नागरिकता (Citizenship)

सामान्यतः अधिवक्ता बनने के लिए व्यक्ति का भारत का नागरिक होना आवश्यक है।
हालाँकि, कुछ परिस्थितियों में अन्य देशों के नागरिकों को भी अनुमति दी जा सकती है, यदि उनके देश में भारतीय नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हों (Reciprocity का सिद्धांत)।


3. आयु (Age)

अधिवक्ता बनने के लिए न्यूनतम आयु सीमा निर्धारित की गई है। सामान्यतः—

  • नामांकन के समय व्यक्ति बालिग (18 वर्ष या उससे अधिक) होना चाहिए।

4. चरित्र और आचरण (Good Character and Conduct)

अधिवक्ता का पेशा उच्च नैतिकता की अपेक्षा करता है। अतः—

  • आवेदक का चरित्र अच्छा होना चाहिए।
  • यदि किसी व्यक्ति को नैतिक अधमता (Moral Turpitude) से संबंधित अपराध में दोषसिद्ध किया गया हो, तो वह अधिवक्ता बनने के लिए अयोग्य हो सकता है।

5. अयोग्यताएँ (Disqualifications)

कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति को अधिवक्ता के रूप में नामांकित नहीं किया जा सकता, जैसे—

  1. यदि वह किसी गंभीर अपराध में दोषसिद्ध हो।
  2. यदि वह किसी सरकारी सेवा में कार्यरत हो और विधि व्यवसाय करने की अनुमति न हो।
  3. यदि वह मानसिक रूप से अक्षम (Unsound Mind) हो।

6. नामांकन हेतु आवेदन (Application for Enrolment)

इच्छुक व्यक्ति को—

  • संबंधित राज्य बार काउंसिल में निर्धारित प्रपत्र में आवेदन करना होता है।
  • आवश्यक दस्तावेज संलग्न करने होते हैं, जैसे—
    • विधि डिग्री प्रमाणपत्र
    • आयु प्रमाणपत्र
    • नागरिकता प्रमाणपत्र
    • चरित्र प्रमाणपत्र

7. नामांकन शुल्क (Enrolment Fee)

आवेदक को निर्धारित नामांकन शुल्क जमा करना होता है, जो बार काउंसिल के नियमों के अनुसार तय किया जाता है।


8. बार काउंसिल द्वारा परीक्षण (Scrutiny)

राज्य बार काउंसिल आवेदन की जाँच करती है। यदि आवेदक सभी शर्तें पूरी करता है, तो उसका नाम अधिवक्ताओं की सूची में दर्ज कर दिया जाता है।


9. अधिवक्ता के रूप में शपथ (Oath)

नामांकन के पश्चात, अधिवक्ता को शपथ दिलाई जाती है कि वह—

  • संविधान और कानून का पालन करेगा
  • ईमानदारी और निष्ठा से पेशा करेगा

10. अखिल भारतीय बार परीक्षा (All India Bar Examination)

वर्तमान व्यवस्था के अनुसार, नामांकन के बाद अधिवक्ता को अखिल भारतीय बार परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती है, ताकि उसे विधि व्यवसाय करने का प्रमाणपत्र प्राप्त हो सके।


भाग – V

अधिवक्ता बनने के बाद अधिकार

नामांकन के पश्चात अधिवक्ता को—

  • न्यायालयों में प्रैक्टिस करने का अधिकार
  • मुवक्किल का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार
  • विधिक परामर्श देने का अधिकार

प्राप्त होता है।


भाग – VI

अधिवक्ता बनने के बाद कर्तव्य

अधिवक्ता को—

  • न्यायालय के प्रति सम्मान
  • मुवक्किल के प्रति निष्ठा
  • समाज के प्रति उत्तरदायित्व

का पालन करना होता है।


भाग – VII

अधिवक्ता बनने की प्रक्रिया का महत्व

यह पूरी प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि केवल योग्य, सक्षम और नैतिक व्यक्ति ही इस प्रतिष्ठित पेशे में प्रवेश करें। इससे—

  • न्याय प्रणाली मजबूत होती है
  • जनता का विश्वास बढ़ता है
  • पेशे की गरिमा बनी रहती है

निष्कर्ष

अधिवक्ता वह व्यक्ति है जो विधि का ज्ञाता, न्याय का सेवक और समाज का मार्गदर्शक होता है। अधिवक्ता बनने के लिए आवश्यक योग्यताएँ केवल औपचारिकताएँ नहीं हैं, बल्कि वे इस बात की गारंटी हैं कि इस महान पेशे में वही व्यक्ति प्रवेश करे जो ज्ञान, चरित्र और नैतिकता—तीनों में समृद्ध हो।

अतः कहा जा सकता है कि अधिवक्ता के रूप में नामांकन हेतु निर्धारित योग्यताएँ न्याय-प्रणाली की शुद्धता और विश्वसनीयता बनाए रखने का महत्वपूर्ण साधन हैं।