अपकृत्यात्मक दायित्व में “Act of State” (राज्य का कार्य) का प्रतिरक्षा के रूप में महत्व
भूमिका
अपकृत्य विधि (Law of Torts) का सामान्य सिद्धांत यह है कि यदि किसी व्यक्ति के गलत कार्य या चूक से किसी अन्य व्यक्ति को विधिक क्षति (legal injury) होती है, तो वह व्यक्ति उस क्षति के लिए उत्तरदायी होगा और पीड़ित को क्षतिपूर्ति (compensation) मिलेगी। यह सिद्धांत Ubi Jus Ibi Remedium (जहाँ अधिकार है, वहाँ उपचार है) पर आधारित है।
किन्तु यह सिद्धांत पूर्णतः निरपेक्ष नहीं है। कानून ने कुछ परिस्थितियों में प्रतिवादी को दायित्व से मुक्त करने के लिए विशेष प्रतिरक्षाएँ (Defences) प्रदान की हैं। इन्हीं प्रतिरक्षाओं में से एक महत्वपूर्ण प्रतिरक्षा है—
👉 Act of State (राज्य का कार्य)
Act of State का सिद्धांत इस बात को मान्यता देता है कि जब राज्य अपनी संप्रभु शक्ति (sovereign power) के अंतर्गत कोई कार्य करता है, तो उस कार्य के लिए सामान्यतः राज्य या उसके अधिकारी अपकृत्यात्मक दायित्व के अधीन नहीं होंगे।
इस प्रकार, Act of State न केवल एक तकनीकी प्रतिरक्षा है, बल्कि यह राज्य की संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से गहराई से जुड़ा हुआ सिद्धांत है।
1. Act of State का अर्थ और अवधारणा
Act of State से अभिप्राय ऐसे कार्य से है—
- जो राज्य द्वारा अपनी संप्रभु सत्ता के प्रयोग में किया गया हो
- जो राजनीतिक या सार्वजनिक प्रकृति का हो
- जो न्यायालयों की समीक्षा (judicial scrutiny) से परे माना जाता हो
सरल शब्दों में, जब सरकार या राज्य किसी विदेशी नागरिक या शत्रु विदेशी के विरुद्ध, अथवा अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़े मामलों में, संप्रभु शक्ति के अंतर्गत कोई कार्य करता है, तो उसे Act of State कहा जाता है।
ऐसे कार्यों के लिए सामान्यतः अपकृत्य का वाद नहीं चलाया जा सकता।
2. Act of State का ऐतिहासिक आधार
इस सिद्धांत की जड़ें अंग्रेजी कॉमन लॉ में मिलती हैं। प्रारंभिक काल में यह माना जाता था कि—
👉 “The King can do no wrong”
(राजा कोई गलत कार्य नहीं कर सकता)
इस सिद्धांत का उद्देश्य राजा या राज्य को न्यायालयों के हस्तक्षेप से बचाना था, विशेषकर उन मामलों में जहाँ राज्य की संप्रभुता और विदेश नीति से जुड़े प्रश्न हों।
धीरे-धीरे यह सिद्धांत विकसित होकर Act of State के रूप में स्थापित हुआ।
3. Act of State की आवश्यक विशेषताएँ
किसी कार्य को Act of State कहे जाने के लिए सामान्यतः निम्नलिखित तत्वों का होना आवश्यक है—
- कार्य राज्य द्वारा किया गया हो
- कार्य संप्रभु शक्ति के प्रयोग में किया गया हो
- कार्य राजनीतिक या सार्वजनिक प्रकृति का हो
- कार्य का संबंध विदेशी नागरिकों या शत्रु विदेशियों से हो
यदि ये तत्व विद्यमान हों, तो वह कार्य अपकृत्यात्मक दायित्व से मुक्त माना जाएगा।
4. Act of State और सामान्य अपकृत्य में अंतर
सामान्य अपकृत्य में—
- व्यक्ति या संस्था के गलत कार्य के लिए दायित्व होता है।
Act of State में—
- राज्य का कार्य, भले ही किसी को हानि पहुँचाए, अपकृत्य नहीं माना जाता।
इस प्रकार, Act of State अपकृत्य के सामान्य सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण अपवाद है।
5. प्रमुख न्यायिक निर्णय
(क) Buron v Denman
इस मामले में ब्रिटिश नौसेना अधिकारी ने अफ्रीका के एक क्षेत्र में दास व्यापार को रोकने के लिए एक स्थानीय व्यक्ति की संपत्ति नष्ट कर दी।
निर्णय –
न्यायालय ने कहा कि यह कार्य ब्रिटिश सरकार की संप्रभु नीति के अंतर्गत किया गया था, अतः यह Act of State है और अधिकारी उत्तरदायी नहीं होगा।
महत्व –
इस मामले ने Act of State को प्रतिरक्षा के रूप में स्पष्ट रूप से मान्यता दी।
(ख) Secretary of State v Kamachee Boye Sahaba
इस मामले में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा एक भारतीय शासक की संपत्ति जब्त की गई।
निर्णय –
प्रिवी काउंसिल ने कहा कि यह संप्रभु शक्ति का प्रयोग है और Act of State है, इसलिए इसके विरुद्ध अपकृत्य का वाद नहीं चलाया जा सकता।
महत्व –
यह निर्णय भारतीय संदर्भ में Act of State सिद्धांत का आधारभूत मामला है।
6. Act of State का प्रतिरक्षा के रूप में महत्व
(1) राज्य की संप्रभुता की रक्षा
Act of State सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि न्यायालय राज्य के संप्रभु कार्यों में हस्तक्षेप न करें। इससे राज्य की स्वतंत्रता और संप्रभुता बनी रहती है।
(2) विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की सुरक्षा
अंतरराष्ट्रीय मामलों में राज्य को कई बार कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं। यदि ऐसे कार्यों के लिए अपकृत्य के वाद चलने लगें, तो विदेश नीति प्रभावित हो सकती है।
Act of State इस खतरे को रोकता है।
(3) प्रशासनिक कार्यों में सुगमता
राज्य के अधिकारी निर्भीक होकर अपने कर्तव्य निभा सकते हैं, क्योंकि उन्हें यह भय नहीं रहता कि प्रत्येक संप्रभु कार्य के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराया जाएगा।
(4) न्यायालयों की सीमाओं का निर्धारण
यह सिद्धांत न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन बनाए रखता है और यह स्पष्ट करता है कि कौन-से मामले न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और कौन-से नहीं।
(5) राष्ट्रीय सुरक्षा का संरक्षण
युद्ध, रक्षा और आपातकालीन परिस्थितियों में किए गए कार्यों को न्यायालयी विवादों से मुक्त रखकर राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाती है।
7. Act of State की सीमाएँ
यद्यपि Act of State एक महत्वपूर्ण प्रतिरक्षा है, परंतु यह असीमित नहीं है।
- यदि कार्य नागरिकों (citizens) के विरुद्ध किया गया हो, तो Act of State लागू नहीं होगा।
- यदि कार्य संप्रभु शक्ति के अंतर्गत न होकर सामान्य प्रशासनिक कार्य हो, तो प्रतिरक्षा उपलब्ध नहीं होगी।
- यदि कार्य संविधान या विधि का उल्लंघन करता हो, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकते हैं।
8. भारतीय संवैधानिक परिप्रेक्ष्य
भारत में संविधान का अनुच्छेद 300 राज्य को वादों के लिए उत्तरदायी ठहराने की अनुमति देता है, परंतु Act of State जैसे सिद्धांतों के कारण संप्रभु कार्यों में राज्य को प्रतिरक्षा प्राप्त रहती है।
हालाँकि, आधुनिक भारतीय न्यायिक दृष्टिकोण यह है कि जहाँ मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो, वहाँ राज्य Act of State का सहारा नहीं ले सकता।
9. आलोचनात्मक मूल्यांकन
सकारात्मक पक्ष
- राज्य की संप्रभुता की रक्षा
- प्रशासनिक दक्षता में वृद्धि
- राष्ट्रीय हित की सुरक्षा
नकारात्मक पक्ष
- कभी-कभी पीड़ित को न्याय नहीं मिल पाता
- राज्य को अत्यधिक संरक्षण मिल जाता है
- दुरुपयोग की संभावना
निष्कर्ष
Act of State अपकृत्यात्मक दायित्व के क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतिरक्षा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य अपने संप्रभु और राजनीतिक कार्यों को बिना न्यायालयी हस्तक्षेप के कर सके।
हालाँकि आधुनिक विधि का झुकाव इस ओर है कि राज्य को अधिक उत्तरदायी बनाया जाए, फिर भी Act of State का सिद्धांत आज भी राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और संप्रभुता की रक्षा के लिए प्रासंगिक बना हुआ है।
इस प्रकार, Act of State प्रतिरक्षा राज्य की शक्ति और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है और अपकृत्य विधि को एक व्यावहारिक एवं संतुलित स्वरूप प्रदान करती है।