राज्य का अपकृत्यात्मक दायित्व (Tortious Liability of State)
भूमिका
अपकृत्य विधि (Law of Torts) का एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या राज्य (State) अपने कर्मचारियों या एजेंटों द्वारा किए गए गलत कार्यों (torts) के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है या नहीं। प्रारंभिक कॉमन लॉ में यह सिद्धांत प्रचलित था कि “The King can do no wrong” अर्थात् राजा या राज्य कोई गलत कार्य नहीं कर सकता। इस सिद्धांत के कारण राज्य को अपकृत्यात्मक दायित्व से पूर्णतः मुक्त माना जाता था।
परंतु आधुनिक लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में यह दृष्टिकोण काफी हद तक बदल चुका है। अब यह स्वीकार किया जाता है कि राज्य भी एक विधिक व्यक्ति है और उसे अपने अधिकारियों द्वारा किए गए गलत कार्यों के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, विशेषतः तब जब वे कार्य गैर-संप्रभु (non-sovereign) प्रकृति के हों।
भारत में राज्य के अपकृत्यात्मक दायित्व का विकास मुख्यतः न्यायालयों द्वारा दिए गए निर्णयों के माध्यम से हुआ है।
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अंग्रेजी कॉमन लॉ में राज्य को प्रतिरक्षा (immunity) प्राप्त थी। भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान भी यही सिद्धांत लागू था।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 300 में यह प्रावधान किया गया है कि भारत सरकार तथा राज्य सरकारों पर उसी प्रकार वाद चलाया जा सकता है, जिस प्रकार ब्रिटिश क्राउन पर चलाया जा सकता था।
इस प्रकार, भारत में राज्य का दायित्व भी उसी सीमा तक माना गया, जितना ब्रिटिश शासन के समय क्राउन का था।
2. संप्रभु और गैर-संप्रभु कार्यों में अंतर
राज्य का अपकृत्यात्मक दायित्व मुख्यतः इस अंतर पर आधारित है—
- संप्रभु कार्य (Sovereign Functions)
- गैर-संप्रभु या व्यावसायिक कार्य (Non-Sovereign / Commercial Functions)
(क) संप्रभु कार्य
वे कार्य जो राज्य अपनी संप्रभु सत्ता के प्रयोग में करता है, जैसे—
- रक्षा और युद्ध
- कानून-व्यवस्था बनाए रखना
- कर संग्रह
इन कार्यों के संबंध में राज्य को सामान्यतः अपकृत्यात्मक दायित्व से छूट प्राप्त होती है।
(ख) गैर-संप्रभु कार्य
वे कार्य जो कोई निजी व्यक्ति भी कर सकता है, जैसे—
- परिवहन सेवाएँ
- औद्योगिक गतिविधियाँ
- व्यापारिक उपक्रम
इन कार्यों के लिए राज्य को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।
3. राज्य बनाम विद्यावती (State of Rajasthan v. Vidyawati)
इस मामले में एक सरकारी वाहन का चालक लापरवाही से वाहन चला रहा था, जिससे एक महिला की मृत्यु हो गई।
निर्णय –
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वाहन चलाना संप्रभु कार्य नहीं है, बल्कि एक सामान्य प्रशासनिक कार्य है। अतः राज्य को क्षतिपूर्ति देने के लिए उत्तरदायी ठहराया गया।
महत्व –
इस निर्णय ने स्पष्ट किया कि राज्य अपने कर्मचारियों की लापरवाही के लिए उत्तरदायी हो सकता है, यदि कार्य गैर-संप्रभु प्रकृति का हो।
4. कस्तूरीलाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (Kasturi Lal v. State of Uttar Pradesh)
इस मामले में पुलिस ने वादी का सोना जब्त किया, परंतु बाद में वह सोना पुलिस की लापरवाही से खो गया।
निर्णय –
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब्ती और अभिरक्षा (custody) का कार्य संप्रभु कार्य है, इसलिए राज्य उत्तरदायी नहीं होगा।
महत्व –
इस निर्णय में संप्रभु और गैर-संप्रभु कार्यों के बीच अंतर को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया।
5. नीलाबति बेहेरा बनाम उड़ीसा राज्य (Nilabati Behera v. State of Orissa)
इस मामले में पुलिस हिरासत में एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई।
निर्णय –
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को मुआवजा देने का आदेश दिया और कहा कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में राज्य प्रतिरक्षा का दावा नहीं कर सकता।
महत्व –
इस निर्णय ने यह स्थापित किया कि जहाँ मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो, वहाँ राज्य को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, चाहे कार्य संप्रभु ही क्यों न हो।
6. डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (D.K. Basu v. State of West Bengal)
इस मामले में हिरासत में यातना और मृत्यु के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश जारी किए।
निर्णय –
न्यायालय ने कहा कि राज्य अपने अधिकारियों द्वारा किए गए ऐसे कृत्यों के लिए उत्तरदायी होगा और पीड़ितों को मुआवजा दिया जाएगा।
महत्व –
यह मामला राज्य के अपकृत्यात्मक दायित्व को मानवाधिकार संरक्षण से जोड़ता है।
7. राज्य का प्रत्यायोजित दायित्व (Vicarious Liability of State)
राज्य अपने कर्मचारियों द्वारा किए गए कार्यों के लिए प्रत्यायोजित रूप से उत्तरदायी हो सकता है, यदि—
- कर्मचारी राज्य के अधीन कार्यरत हो
- कार्य उसके कर्तव्य के दौरान किया गया हो
8. विधिक आधार
राज्य के अपकृत्यात्मक दायित्व का आधार निम्नलिखित सिद्धांतों पर है—
- Rule of Law – कानून के समक्ष सभी समान हैं
- Ubi Jus Ibi Remedium – जहाँ अधिकार है, वहाँ उपचार है
- न्याय और समानता का सिद्धांत
9. आधुनिक प्रवृत्ति
आधुनिक न्यायिक दृष्टिकोण यह है कि राज्य को अधिक से अधिक मामलों में उत्तरदायी ठहराया जाए, ताकि—
- प्रशासनिक लापरवाही पर अंकुश लगे
- नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हो
- शासन में पारदर्शिता आए
10. आलोचना और सुधार की आवश्यकता
संप्रभु और गैर-संप्रभु कार्यों के बीच अंतर कई बार अस्पष्ट होता है। इससे न्यायालयों के निर्णयों में असंगति दिखाई देती है।
कई विद्वानों का मत है कि अब इस पुराने सिद्धांत को समाप्त कर राज्य को सभी अपकृत्यों के लिए उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए, सिवाय कुछ अत्यंत सीमित परिस्थितियों के।
निष्कर्ष
राज्य का अपकृत्यात्मक दायित्व भारत में क्रमिक रूप से विकसित हुआ है। प्रारंभ में राज्य को व्यापक प्रतिरक्षा प्राप्त थी, परंतु आधुनिक न्यायिक प्रवृत्ति राज्य को नागरिकों के प्रति अधिक उत्तरदायी बनाने की दिशा में अग्रसर है।
विभिन्न न्यायिक निर्णयों से यह स्पष्ट होता है कि—
- गैर-संप्रभु कार्यों के लिए राज्य उत्तरदायी है
- मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में राज्य प्रतिरक्षा का दावा नहीं कर सकता
इस प्रकार, राज्य का अपकृत्यात्मक दायित्व आज न्याय, समानता और उत्तरदायित्व के सिद्धांतों पर आधारित एक विकसित अवधारणा बन चुका है, जो लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की आत्मा को प्रतिबिंबित करता है।