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अपकृत्य (Law of Torts) में वाद से मुक्त (Exempted) व्यक्ति

अपकृत्य (Law of Torts) में वाद से मुक्त (Exempted) व्यक्ति

भूमिका

अपकृत्य विधि (Law of Torts) का सामान्य सिद्धांत यह है कि यदि किसी व्यक्ति के विधिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है और उसे हानि पहुँची है, तो वह न्यायालय में वाद प्रस्तुत कर सकता है और दोषी व्यक्ति से क्षतिपूर्ति या अन्य उपचार प्राप्त कर सकता है। यह सिद्धांत प्रसिद्ध उक्ति “Ubi Jus Ibi Remedium” (जहाँ अधिकार है, वहाँ उपचार है) पर आधारित है।

किन्तु यह सिद्धांत पूर्णतः निरपेक्ष (absolute) नहीं है। कानून कुछ विशेष व्यक्तियों या संस्थाओं को कुछ परिस्थितियों में अपकृत्य के वाद से मुक्त (exempted) करता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वे व्यक्ति कभी भी गलत कार्य नहीं करते, बल्कि यह कि विशेष परिस्थितियों में उनके विरुद्ध अपकृत्य का वाद नहीं चलाया जा सकता या उनकी जिम्मेदारी सीमित होती है।

ये अपवाद ऐतिहासिक, संवैधानिक, नीतिगत तथा सार्वजनिक हित के आधार पर विकसित हुए हैं।


1. संप्रभु राज्य (Sovereign State)

(क) सिद्धांत – “राजा गलत नहीं कर सकता”

अंग्रेजी कॉमन लॉ में यह सिद्धांत प्रचलित था कि “The King can do no wrong” अर्थात् राजा या राज्य के विरुद्ध अपकृत्य का वाद नहीं चलाया जा सकता।

इस सिद्धांत के अनुसार राज्य अपने संप्रभु (sovereign) कार्यों के लिए उत्तरदायी नहीं माना जाता।

(ख) संप्रभु कार्य क्या हैं?

वे कार्य जो राज्य अपनी सत्ता और शासन के अधिकार से करता है, जैसे—

  • युद्ध और रक्षा
  • कर संग्रह
  • पुलिस और प्रशासनिक कार्य

यदि इन कार्यों के दौरान किसी को हानि होती है, तो सामान्यतः राज्य के विरुद्ध अपकृत्य का वाद नहीं चलाया जा सकता।

(ग) आधुनिक स्थिति

आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों में यह प्रतिरक्षा पूर्ण नहीं रही है। कई देशों में राज्य को गैर-संप्रभु (non-sovereign) या व्यावसायिक कार्यों के लिए उत्तरदायी ठहराया जाता है। फिर भी, संप्रभु कार्यों के संबंध में राज्य को अब भी काफी हद तक संरक्षण प्राप्त है।


2. न्यायाधीश (Judges)

(क) सामान्य नियम

न्यायाधीशों को उनके न्यायिक कार्यों के लिए अपकृत्य के वाद से प्रतिरक्षा प्राप्त होती है।

यदि न्यायाधीश ने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर और सद्भावना (good faith) से कोई आदेश पारित किया है, तो उसके विरुद्ध अपकृत्य का वाद नहीं चलाया जा सकता।

(ख) उद्देश्य

इस प्रतिरक्षा का उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखना है, ताकि न्यायाधीश बिना भय या दबाव के अपने कर्तव्य निभा सकें।

(ग) सीमा

यदि न्यायाधीश ने दुर्भावनापूर्ण (malafide) तरीके से या अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर कार्य किया हो, तो उसे संरक्षण प्राप्त नहीं होगा।


3. विधायी सदस्य (Members of Legislature)

संसद या विधानमंडल के सदस्य अपने विधायी कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कथनों या कार्यों के लिए अपकृत्य के वाद से मुक्त होते हैं।

(क) आधार

यह प्रतिरक्षा संवैधानिक विशेषाधिकार (parliamentary privilege) पर आधारित है।

(ख) उद्देश्य

ताकि विधायी सदस्य निर्भीक होकर जनता के हित में विचार-विमर्श कर सकें।


4. सार्वजनिक सेवक (Public Servants)

सार्वजनिक सेवकों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान किए गए कार्यों के लिए कुछ सीमा तक प्रतिरक्षा प्राप्त होती है।

यदि उन्होंने सद्भावना से और अपने अधिकार क्षेत्र में कार्य किया हो, तो उनके विरुद्ध अपकृत्य का वाद नहीं चलाया जा सकता।

किन्तु यदि उन्होंने अधिकारों का दुरुपयोग किया हो या दुर्भावना से कार्य किया हो, तो वे उत्तरदायी होंगे।


5. विदेशी राजदूत और कूटनीतिक प्रतिनिधि (Foreign Diplomats)

अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार विदेशी राजदूतों और कूटनीतिक प्रतिनिधियों को मेज़बान देश के न्यायालयों से प्रतिरक्षा प्राप्त होती है।

इस कारण उनके विरुद्ध सामान्यतः अपकृत्य का वाद नहीं चलाया जा सकता।

इस प्रतिरक्षा का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय संबंधों को सुचारु बनाए रखना है।


6. माता-पिता और अभिभावक (Parents and Guardians)

माता-पिता या अभिभावक अपने बच्चों या आश्रितों के हित में किए गए सद्भावनापूर्ण कार्यों के लिए सामान्यतः अपकृत्य के वाद से मुक्त होते हैं।

उदाहरणार्थ—
यदि माता-पिता बच्चे को अनुशासन में रखने के लिए हल्की दंडात्मक कार्रवाई करते हैं, तो उसे अपकृत्य नहीं माना जाएगा।

किन्तु अत्यधिक क्रूरता या दुर्व्यवहार के मामलों में यह प्रतिरक्षा लागू नहीं होगी।


7. शिक्षक (Teachers)

शिक्षकों को भी छात्रों के अनुशासन और कल्याण के लिए किए गए सद्भावनापूर्ण कार्यों के लिए सीमित प्रतिरक्षा प्राप्त होती है।

यदि शिक्षक ने युक्तिसंगत सीमा में रहकर कार्य किया है, तो उसके विरुद्ध अपकृत्य का वाद नहीं चलेगा।


8. जीवनरक्षक कार्य करने वाले व्यक्ति (Persons Acting Under Necessity)

यदि कोई व्यक्ति आपातकालीन स्थिति में किसी की जान बचाने या बड़ी हानि रोकने के लिए किसी के अधिकार में हस्तक्षेप करता है, तो उसे अपकृत्य के वाद से मुक्त किया जा सकता है।

उदाहरण—
आग बुझाने के लिए किसी की दीवार तोड़ना।


9. वह व्यक्ति जिसने वैधानिक प्राधिकार (Statutory Authority) के अंतर्गत कार्य किया हो

यदि किसी व्यक्ति ने किसी विधि या अधिनियम के अंतर्गत दिए गए अधिकारों के अनुसार कार्य किया है, तो वह अपकृत्य के लिए उत्तरदायी नहीं होगा, भले ही उससे किसी को हानि हुई हो।

उदाहरण—
सरकारी अधिकारी द्वारा विधिक आदेश के अंतर्गत भूमि अधिग्रहण।


10. सैन्यकर्मी (Armed Forces Personnel)

युद्धकाल या विशेष सैन्य अभियानों के दौरान किए गए कार्यों के लिए सैन्यकर्मियों को अपकृत्य के वाद से प्रतिरक्षा प्राप्त होती है, बशर्ते वे अपने कर्तव्य के दायरे में कार्य कर रहे हों।


11. निगम और स्थानीय प्राधिकरण (Corporations and Local Authorities)

कुछ मामलों में स्थानीय निकायों को भी उनके वैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कार्यों के लिए प्रतिरक्षा प्राप्त होती है।

किन्तु यदि उन्होंने लापरवाही की हो, तो वे उत्तरदायी हो सकते हैं।


12. स्वेच्छा से जोखिम स्वीकार करने वाला व्यक्ति

(Volenti non fit injuria)

यदि वादी ने स्वयं किसी जोखिम को स्वीकार किया है, तो प्रतिवादी को अपकृत्य के वाद से मुक्त किया जा सकता है।

उदाहरण—
खतरनाक खेलों में भाग लेने वाला खिलाड़ी आयोजक के विरुद्ध सामान्यतः वाद नहीं चला सकता।


सामाजिक और विधिक आधार

इन प्रतिरक्षाओं का उद्देश्य यह है कि—

  1. सार्वजनिक कार्यों के निष्पादन में बाधा न आए।
  2. न्यायपालिका और विधायिका की स्वतंत्रता बनी रहे।
  3. आपातकालीन या आवश्यक परिस्थितियों में कार्य करने वालों को संरक्षण मिले।

निष्कर्ष

अपकृत्य विधि का मूल उद्देश्य पीड़ित को न्याय प्रदान करना है, किन्तु साथ ही यह भी आवश्यक है कि कुछ व्यक्तियों और संस्थाओं को विशेष परिस्थितियों में संरक्षण दिया जाए, ताकि वे निर्भीक होकर अपने कर्तव्य निभा सकें।

संप्रभु राज्य, न्यायाधीश, विधायी सदस्य, सार्वजनिक सेवक, विदेशी राजदूत, तथा वैधानिक प्राधिकार के अंतर्गत कार्य करने वाले व्यक्ति—ये सभी प्रमुख वर्ग हैं जिन्हें अपकृत्य के वाद से पूर्ण या आंशिक रूप से मुक्त किया गया है।

इस प्रकार, अपकृत्य विधि अधिकारों की रक्षा और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन स्थापित करती है तथा एक न्यायसंगत विधिक व्यवस्था को बनाए रखती है।