वे व्यक्ति जो अपकृत्य (Tort) के लिए वाद नहीं चला सकते
भूमिका
अपकृत्य विधि (Law of Torts) का मूल उद्देश्य यह है कि यदि किसी व्यक्ति के विधिक अधिकार का उल्लंघन हुआ हो और उसे हानि पहुँची हो, तो वह न्यायालय के समक्ष वाद प्रस्तुत कर क्षतिपूर्ति या अन्य उपचार प्राप्त कर सके। सामान्यतः यह माना जाता है कि जहाँ अधिकार है, वहाँ उपचार है (Ubi Jus Ibi Remedium)।
किन्तु यह सिद्धांत पूर्णतः निरपेक्ष नहीं है। कानून कुछ परिस्थितियों में कुछ व्यक्तियों को अपकृत्य के लिए वाद चलाने से वंचित करता है या उनकी क्षमता (capacity) को सीमित कर देता है। इसका कारण यह है कि या तो ऐसे व्यक्ति स्वयं विधिक रूप से अक्षम (incapable) होते हैं, या फिर विशेष विधिक संबंधों के कारण उन्हें वाद का अधिकार नहीं दिया जाता।
अतः यह जानना आवश्यक है कि वे कौन-से व्यक्ति हैं जो सामान्यतः अपकृत्य के लिए वाद नहीं चला सकते या जिनकी वाद चलाने की क्षमता सीमित होती है।
1. शत्रु विदेशी (Alien Enemy)
शत्रु विदेशी वह व्यक्ति होता है जो ऐसे राष्ट्र का नागरिक हो जो भारत या इंग्लैंड के साथ युद्ध की स्थिति में हो।
(क) सामान्य नियम
शत्रु विदेशी न्यायालय में वाद नहीं चला सकता, क्योंकि उसे कानून का संरक्षण प्राप्त नहीं होता।
(ख) अपवाद
यदि शत्रु विदेशी को सरकार की अनुमति प्राप्त हो, या वह देश के भीतर वैध रूप से निवास कर रहा हो, तो वह कुछ परिस्थितियों में वाद चला सकता है।
(ग) तर्क
युद्ध की स्थिति में शत्रु राष्ट्र के नागरिकों को विधिक अधिकार देना राज्य की सुरक्षा के विपरीत माना जाता है।
2. कैदी (Convict or Prisoner)
प्रारंभिक अंग्रेजी विधि में यह माना जाता था कि दोषसिद्ध कैदी नागरिक मृत्यु (civil death) की स्थिति में होता है और वह वाद नहीं चला सकता।
आधुनिक समय में यह दृष्टिकोण काफी हद तक बदल गया है।
(क) आधुनिक स्थिति
आज अधिकांश विधि प्रणालियों में कैदी को अपने विधिक अधिकारों की रक्षा के लिए वाद चलाने की अनुमति है, विशेषकर तब जब उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ हो।
(ख) सीमाएँ
फिर भी कुछ मामलों में उसकी स्वतंत्रता पर प्रतिबंध के कारण उसकी वाद चलाने की क्षमता सीमित हो सकती है।
3. शासक एवं राज्य के विरुद्ध वाद (Sovereign Immunity के अंतर्गत व्यक्ति)
परंपरागत रूप से यह सिद्धांत माना जाता था कि “राजा गलत नहीं कर सकता” (The King can do no wrong)।
(क) प्रभाव
इस सिद्धांत के कारण राजा या राज्य के विरुद्ध अपकृत्य का वाद चलाना कठिन था।
(ख) आधुनिक स्थिति
आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में राज्य को भी कई मामलों में उत्तरदायी ठहराया जाता है, परंतु कुछ संप्रभु कार्यों (sovereign functions) के संबंध में अब भी राज्य को प्रतिरक्षा प्राप्त होती है।
अतः यदि हानि संप्रभु कार्य के दौरान हुई हो, तो पीड़ित व्यक्ति अपकृत्य का वाद नहीं चला सकता।
4. पति और पत्नी (Husband and Wife)
प्रारंभिक कॉमन लॉ के अंतर्गत पति और पत्नी को एक ही विधिक इकाई (one legal person) माना जाता था।
(क) परिणाम
पत्नी पति के विरुद्ध और पति पत्नी के विरुद्ध अपकृत्य का वाद नहीं चला सकता था।
(ख) आधुनिक स्थिति
विवाहित स्त्री संपत्ति अधिनियमों (Married Women’s Property Acts) के पश्चात पत्नी को स्वतंत्र विधिक व्यक्तित्व प्राप्त हुआ। अब अधिकांश देशों में पति-पत्नी एक-दूसरे के विरुद्ध अपकृत्य का वाद चला सकते हैं।
फिर भी कुछ पारिवारिक मामलों में न्यायालय सावधानी बरतते हैं, जिससे वैवाहिक संबंधों में अनावश्यक तनाव न उत्पन्न हो।
5. नाबालिग (Minor)
नाबालिग वह व्यक्ति है जो कानून द्वारा निर्धारित आयु से कम हो।
(क) सामान्य नियम
नाबालिग स्वयं वाद नहीं चला सकता, परंतु उसके अभिभावक या मित्र (next friend) उसके behalf पर वाद चला सकते हैं।
(ख) सीमित क्षमता
इस प्रकार, नाबालिग प्रत्यक्ष रूप से अपकृत्य के लिए वाद नहीं चला सकता, बल्कि प्रतिनिधि के माध्यम से ही ऐसा कर सकता है।
6. पागल व्यक्ति (Person of Unsound Mind)
पागल या मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति सामान्यतः विधिक कार्य करने में सक्षम नहीं होता।
(क) नियम
ऐसा व्यक्ति स्वयं वाद नहीं चला सकता।
(ख) अपवाद
उसका संरक्षक (guardian) या प्रतिनिधि उसके behalf पर वाद चला सकता है।
7. मृत व्यक्ति (Dead Person)
मृत व्यक्ति न तो अधिकार रख सकता है और न ही वाद चला सकता है।
(क) सामान्य सिद्धांत
व्यक्ति की मृत्यु के साथ उसके व्यक्तिगत अधिकार समाप्त हो जाते हैं।
(ख) अपवाद
कुछ मामलों में मृत व्यक्ति के विधिक प्रतिनिधि (legal representatives) हानि के लिए वाद चला सकते हैं, जैसे—घातक दुर्घटना के मामलों में।
किन्तु स्वयं मृत व्यक्ति अपकृत्य का वाद नहीं चला सकता।
8. वह व्यक्ति जिसने स्वेच्छा से जोखिम स्वीकार किया हो
(Volenti non fit injuria)
यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से किसी जोखिम को स्वीकार करता है, तो वह बाद में अपकृत्य का वाद नहीं चला सकता।
उदाहरण
यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर खतरनाक खेल में भाग लेता है और घायल हो जाता है, तो वह सामान्यतः आयोजक के विरुद्ध अपकृत्य का वाद नहीं चला सकता।
9. वह व्यक्ति जिसके पास विधिक अधिकार नहीं है
अपकृत्य का वाद केवल वही व्यक्ति चला सकता है, जिसके विधिक अधिकार का उल्लंघन हुआ हो।
यदि किसी व्यक्ति को केवल नैतिक या भावनात्मक हानि हुई हो, पर उसका कोई विधिक अधिकार नहीं टूटा हो, तो वह वाद नहीं चला सकता।
10. सार्वजनिक उपद्रव के मामलों में सामान्य व्यक्ति
यदि कोई कार्य सार्वजनिक उपद्रव (public nuisance) की श्रेणी में आता है, तो सामान्य व्यक्ति तब तक वाद नहीं चला सकता जब तक वह यह सिद्ध न करे कि उसे सामान्य जनता से अधिक विशेष हानि हुई है।
11. वैधानिक निषेध के अधीन व्यक्ति
कुछ विधियों में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान होता है कि कुछ परिस्थितियों में वाद नहीं चलाया जा सकता।
उदाहरणार्थ—यदि किसी अधिनियम में यह कहा गया हो कि उसके अंतर्गत किए गए कार्यों के लिए कोई अपकृत्य वाद नहीं चलेगा, तो उस अधिनियम के अंतर्गत आने वाले व्यक्ति वाद नहीं चला सकते।
12. संविदात्मक प्रतिबंध के अधीन व्यक्ति
कभी-कभी व्यक्ति अनुबंध द्वारा यह स्वीकार कर लेता है कि वह किसी विशेष हानि के लिए वाद नहीं चलाएगा।
ऐसे मामलों में वह व्यक्ति बाद में अपकृत्य का वाद नहीं चला सकता, बशर्ते कि ऐसा अनुबंध कानून के विरुद्ध न हो।
सामाजिक और विधिक आधार
इन सीमाओं का उद्देश्य यह नहीं है कि पीड़ित को न्याय से वंचित किया जाए, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि—
- न्यायालयों का दुरुपयोग न हो।
- विधिक संबंधों में संतुलन बना रहे।
- विशेष परिस्थितियों में सार्वजनिक हित की रक्षा हो।
निष्कर्ष
अपकृत्य विधि सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार देती है कि वह अपने विधिक अधिकारों के उल्लंघन पर न्यायालय में वाद प्रस्तुत कर सके। किन्तु कुछ व्यक्तियों की विधिक अक्षमता, विशेष विधिक संबंधों, या वैधानिक प्रतिबंधों के कारण वे अपकृत्य का वाद नहीं चला सकते या उनकी क्षमता सीमित होती है।
शत्रु विदेशी, मृत व्यक्ति, पागल व्यक्ति, नाबालिग (प्रत्यक्ष रूप से), तथा वे व्यक्ति जिन्होंने स्वेच्छा से जोखिम स्वीकार किया हो—ऐसे प्रमुख वर्ग हैं जो सामान्यतः अपकृत्य का वाद नहीं चला सकते।
इन अपवादों के बावजूद, आधुनिक विधि का झुकाव इस ओर है कि अधिक से अधिक व्यक्तियों को न्याय प्राप्त करने का अवसर दिया जाए, ताकि अपकृत्य विधि अपने मूल उद्देश्य—अधिकारों की रक्षा और हानि की भरपाई—को प्रभावी रूप से पूरा कर सके।