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अपकृत्य (Law of Torts) में दायित्व की सामान्य शर्तें

अपकृत्य (Law of Torts) में दायित्व की सामान्य शर्तें

भूमिका

अपकृत्य विधि (Law of Torts) नागरिक विधि की वह शाखा है, जो ऐसे नागरिक अपकृत्यों से संबंधित है जिनमें किसी व्यक्ति के गलत कार्य या चूक से दूसरे व्यक्ति को हानि पहुँचती है और जिसके लिए क्षतिपूर्ति (compensation) या अन्य उपचार उपलब्ध कराया जाता है। अपकृत्य विधि का मूल उद्देश्य पीड़ित व्यक्ति को न्याय प्रदान करना तथा समाज में अनुचित आचरण को नियंत्रित करना है।

किसी भी व्यक्ति को अपकृत्य के लिए उत्तरदायी ठहराने से पूर्व यह आवश्यक है कि कुछ सामान्य शर्तें (General Conditions) पूरी हों। यदि ये शर्तें पूर्ण नहीं होतीं, तो दायित्व स्थापित नहीं किया जा सकता।

सामान्य रूप से कहा जाए तो अपकृत्य में दायित्व के लिए तीन प्रमुख आधार माने जाते हैं—

  1. प्रतिवादी का विधिक दायित्व (Legal Duty)
  2. उस दायित्व का उल्लंघन (Breach of Duty)
  3. उल्लंघन के परिणामस्वरूप वादी को हुई विधिक हानि (Legal Damage)

इन तीनों के अतिरिक्त, समय के साथ-साथ न्यायालयों ने कुछ अन्य सहायक शर्तें भी विकसित की हैं, जो अपकृत्य में दायित्व निर्धारित करने में सहायक होती हैं।


1. विधिक दायित्व का अस्तित्व (Existence of Legal Duty)

अपकृत्य में दायित्व स्थापित करने की पहली और मूलभूत शर्त यह है कि प्रतिवादी पर वादी के प्रति कोई विधिक दायित्व होना चाहिए।

विधिक दायित्व का अर्थ है—ऐसा दायित्व जिसे कानून मान्यता देता हो, न कि केवल नैतिक या सामाजिक दायित्व।

(क) दायित्व की प्रकृति

विधिक दायित्व सामान्यतः समाज के प्रति होता है, किंतु उसका प्रभाव किसी विशेष व्यक्ति पर पड़ता है। उदाहरणार्थ—

  • प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है कि वह दूसरों को शारीरिक हानि न पहुँचाए।
  • प्रत्येक चालक का दायित्व है कि वह वाहन सावधानीपूर्वक चलाए।

यदि ऐसा दायित्व ही अस्तित्व में नहीं है, तो दायित्व का प्रश्न ही नहीं उठता।

(ख) पड़ोसी सिद्धांत (Neighbour Principle)

आधुनिक अपकृत्य विधि में दायित्व की अवधारणा को व्यापक रूप से विकसित करने का श्रेय प्रसिद्ध निर्णय Donoghue v Stevenson को दिया जाता है।

इस निर्णय में कहा गया कि—
व्यक्ति को अपने उन “पड़ोसियों” के प्रति सावधानी बरतनी चाहिए, जिन पर उसके कार्यों का प्रत्यक्ष और युक्तिसंगत प्रभाव पड़ सकता है।

इस प्रकार, दायित्व केवल प्रत्यक्ष संबंधों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संभावित रूप से प्रभावित व्यक्तियों तक विस्तारित हो गया।


2. विधिक दायित्व का उल्लंघन (Breach of Legal Duty)

केवल दायित्व का अस्तित्व पर्याप्त नहीं है; यह भी आवश्यक है कि उस दायित्व का उल्लंघन हुआ हो।

उल्लंघन का अर्थ है—
प्रतिवादी द्वारा ऐसा कार्य करना, या ऐसा कार्य न करना, जिसे करना उसका विधिक कर्तव्य था।

(क) उल्लंघन का निर्धारण

यह देखा जाता है कि क्या प्रतिवादी ने वह सावधानी बरती, जो एक सामान्य समझदार व्यक्ति (reasonable man) समान परिस्थितियों में बरतता।

यदि उत्तर नकारात्मक है, तो यह माना जाएगा कि दायित्व का उल्लंघन हुआ है।

(ख) उदाहरण

यदि कोई व्यक्ति सड़क पर गड्ढा खोदकर बिना चेतावनी संकेत लगाए छोड़ देता है और कोई राहगीर गिरकर घायल हो जाता है, तो यह स्पष्ट उल्लंघन है।


3. विधिक हानि या क्षति (Legal Damage or Injury)

तीसरी आवश्यक शर्त यह है कि वादी को विधिक हानि पहुँची हो।

(क) Injury और Damage का अंतर

  • Injury – विधिक अधिकार का उल्लंघन
  • Damage – वास्तविक हानि या नुकसान

अपकृत्य में मुख्य रूप से Injury पर ध्यान दिया जाता है।

(ख) Injuria Sine Damnum

यदि किसी व्यक्ति के विधिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है, भले ही वास्तविक हानि न हुई हो, तब भी अपकृत्य बनता है।

(ग) Damnum Sine Injuria

यदि किसी व्यक्ति को वास्तविक हानि हुई है, पर उसका कोई विधिक अधिकार नहीं टूटा, तो अपकृत्य नहीं बनता।


4. प्रतिवादी और हानि के बीच कारणात्मक संबंध (Causation)

वादी को यह सिद्ध करना होता है कि जो हानि हुई है, वह प्रतिवादी के कार्य या चूक का प्रत्यक्ष परिणाम है।

यदि हानि किसी स्वतंत्र या बाहरी कारण से हुई है, तो प्रतिवादी उत्तरदायी नहीं होगा।

(क) निकट कारण (Proximate Cause)

न्यायालय यह देखता है कि प्रतिवादी का कार्य हानि का निकटतम कारण था या नहीं।


5. क्षति का पूर्वानुमेय होना (Foreseeability of Damage)

यदि प्रतिवादी यह युक्तिसंगत रूप से अनुमान कर सकता था कि उसके कार्य से हानि हो सकती है, तो वह उत्तरदायी होगा।

यदि हानि अत्यंत असामान्य और अप्रत्याशित है, तो दायित्व स्थापित करना कठिन होता है।


6. प्रतिवादी की मानसिक स्थिति (Mental Element)

अपकृत्य में सामान्यतः दोषसिद्धि के लिए अपराध की तरह मंशा (mens rea) आवश्यक नहीं होती, किंतु कुछ अपकृत्यों में मंशा का महत्व होता है, जैसे—

  • मानहानि
  • दुर्भावनापूर्ण अभियोजन

7. प्रतिरक्षा का अभाव (Absence of Valid Defence)

यदि प्रतिवादी के पास कोई वैध प्रतिरक्षा (defence) उपलब्ध है, तो वह दायित्व से मुक्त हो सकता है।

प्रमुख प्रतिरक्षाएँ—

  • स्वेच्छा से जोखिम उठाना (Volenti non fit injuria)
  • आत्मरक्षा
  • अनिवार्यता (Necessity)
  • ईश्वर का कार्य (Act of God)

यदि इन में से कोई प्रतिरक्षा सिद्ध हो जाए, तो दायित्व समाप्त हो जाता है।


8. उपचार का उपलब्ध होना (Availability of Remedy)

अपकृत्य तभी माना जाएगा जब कानून उस गलत कार्य के लिए कोई उपचार प्रदान करता हो, जैसे—

  • क्षतिपूर्ति
  • निषेधाज्ञा (Injunction)
  • पुनर्स्थापन (Restitution)

9. दायित्व के सिद्धांतों का वर्गीकरण

अपकृत्य में दायित्व मुख्यतः तीन प्रकार का हो सकता है—

  1. दोष पर आधारित दायित्व (Fault Liability)
  2. सख्त दायित्व (Strict Liability)
  3. निरपेक्ष दायित्व (Absolute Liability)

इन तीनों सिद्धांतों ने अपकृत्य में दायित्व की सामान्य शर्तों को और अधिक व्यापक बनाया है।


10. सामाजिक और विधिक महत्व

दायित्व की इन सामान्य शर्तों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि—

  • निर्दोष व्यक्ति को दंडित न किया जाए।
  • पीड़ित को न्याय मिले।
  • समाज में अनुचित आचरण पर नियंत्रण हो।

निष्कर्ष

अपकृत्य में दायित्व की सामान्य शर्तें—विधिक दायित्व का अस्तित्व, उसका उल्लंघन, तथा उसके परिणामस्वरूप हुई विधिक हानि—अपकृत्य विधि की आधारशिला हैं। इनके साथ-साथ कारणात्मक संबंध, क्षति का पूर्वानुमेय होना, तथा प्रतिरक्षा का अभाव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इन शर्तों के माध्यम से अपकृत्य विधि एक संतुलित व्यवस्था प्रदान करती है, जिसमें एक ओर पीड़ित को न्याय मिलता है और दूसरी ओर प्रतिवादी को अनुचित रूप से उत्तरदायी नहीं ठहराया जाता। इस प्रकार, अपकृत्य विधि समाज में अधिकारों की रक्षा और उत्तरदायित्व की भावना को सुदृढ़ करती है।