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इंग्लैंड में अपकृत्य विधि (Law of Torts) की उत्पत्ति और विकास

इंग्लैंड में अपकृत्य विधि (Law of Torts) की उत्पत्ति और विकास

भूमिका

अपकृत्य विधि (Law of Torts) आधुनिक नागरिक विधि की एक अत्यंत महत्वपूर्ण शाखा है, जिसका मुख्य उद्देश्य ऐसे गलत कार्यों के लिए उपचार प्रदान करना है जो अनुबंध के उल्लंघन या अपराध की श्रेणी में नहीं आते, किंतु जिनसे किसी व्यक्ति को हानि पहुँचती है। इंग्लैंड में अपकृत्य विधि का विकास क्रमिक (gradual) रहा है और यह न्यायालयों द्वारा विकसित न्यायनिर्णयों (case law) के माध्यम से आगे बढ़ी है। इसका इतिहास कॉमन लॉ (Common Law), इक्विटी (Equity) तथा न्यायिक मिसालों (precedents) से गहराई से जुड़ा हुआ है।

इंग्लैंड में अपकृत्य विधि का विकास किसी एक संहिता या अधिनियम के माध्यम से नहीं हुआ, बल्कि विभिन्न ऐतिहासिक कालों में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप यह विधि विकसित होती गई।


1. प्रारंभिक काल में अपकृत्य की अवधारणा

प्रारंभिक अंग्रेजी विधि में अपकृत्य को स्वतंत्र विधिक शाखा के रूप में नहीं पहचाना जाता था। उस समय गलत कार्यों को मुख्यतः अपराध (crime) की श्रेणी में रखा जाता था। यदि किसी व्यक्ति को हानि पहुँचती थी, तो उसे व्यक्तिगत प्रतिशोध (private vengeance) या राजा के न्यायालयों के माध्यम से न्याय प्राप्त करना पड़ता था।

धीरे-धीरे यह विचार विकसित हुआ कि कुछ गलत कार्य ऐसे हैं जिनके लिए दंड के बजाय क्षतिपूर्ति (compensation) अधिक उपयुक्त उपाय है। इसी विचार से अपकृत्य विधि की नींव पड़ी।


2. रिट प्रणाली (Writ System) और अपकृत्य का विकास

इंग्लैंड में कॉमन लॉ के अंतर्गत न्याय प्राप्त करने के लिए Writ (राजकीय आदेश) आवश्यक था। प्रत्येक प्रकार के गलत कार्य के लिए अलग-अलग रिट निर्धारित थे।

प्रमुख रिट –

  1. Writ of Trespass – बलपूर्वक और प्रत्यक्ष हानि के मामलों में
  2. Writ of Case – अप्रत्यक्ष या परिणामी हानि के मामलों में

(क) ट्रेसपास (Trespass)

ट्रेसपास उन मामलों में लागू होता था जहाँ प्रतिवादी के कार्य से प्रत्यक्ष और तत्काल हानि हुई हो, जैसे – किसी को मारना, संपत्ति में जबरन प्रवेश करना आदि।

(ख) केस (Case)

जहाँ हानि प्रत्यक्ष न होकर परिणामी होती थी, वहाँ Writ of Case का प्रयोग होता था। यही आगे चलकर लापरवाही (negligence), मानहानि (defamation) और उपद्रव (nuisance) जैसे अपकृत्यों का आधार बना।

इस प्रकार, रिट प्रणाली ने अपकृत्य विधि के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


3. कॉमन लॉ न्यायालयों की भूमिका

कॉमन लॉ न्यायालयों ने समय-समय पर विभिन्न निर्णयों के माध्यम से अपकृत्य विधि को आकार दिया। न्यायालयों ने यह स्वीकार किया कि –

  • प्रत्येक व्यक्ति पर यह दायित्व है कि वह दूसरों को हानि न पहुँचाए।
  • यदि कोई इस दायित्व का उल्लंघन करता है, तो वह क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी होगा।

इस प्रकार, “कर्तव्य और दायित्व” (duty and liability) की अवधारणा विकसित हुई।


4. इक्विटी न्यायालयों का योगदान

कॉमन लॉ की कठोरता के कारण कई बार पीड़ित व्यक्ति को पर्याप्त न्याय नहीं मिल पाता था। ऐसे मामलों में इक्विटी न्यायालयों ने हस्तक्षेप किया और निषेधाज्ञा (injunction), विशिष्ट पालन (specific performance) तथा अन्य न्यायसंगत उपचार प्रदान किए।

इक्विटी ने अपकृत्य विधि को अधिक मानवीय और लचीला बनाया।


5. उन्नीसवीं शताब्दी में अपकृत्य विधि का विस्तार

औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के पश्चात इंग्लैंड में नए प्रकार के सामाजिक और आर्थिक संबंध विकसित हुए। मशीनों, कारखानों और परिवहन के साधनों के कारण दुर्घटनाएँ बढ़ीं।

इसके परिणामस्वरूप लापरवाही (negligence) का सिद्धांत विकसित हुआ। न्यायालयों ने यह माना कि यदि कोई व्यक्ति उचित सावधानी नहीं बरतता और इससे किसी को हानि होती है, तो वह उत्तरदायी होगा।


6. डोनोघ्यू बनाम स्टीवेन्सन और आधुनिक अपकृत्य विधि

आधुनिक अपकृत्य विधि के विकास में एक ऐतिहासिक निर्णय Donoghue v Stevenson है।

इस वाद में न्यायालय ने Neighbour Principle (पड़ोसी सिद्धांत) प्रतिपादित किया, जिसके अनुसार –
“व्यक्ति को अपने पड़ोसी के प्रति सावधानी बरतनी चाहिए।”

यह निर्णय लापरवाही के आधुनिक सिद्धांत की आधारशिला माना जाता है।


7. मानहानि, उपद्रव और अन्य अपकृत्यों का विकास

(क) मानहानि (Defamation)

न्यायालयों ने यह स्वीकार किया कि व्यक्ति की प्रतिष्ठा भी विधिक संरक्षण योग्य अधिकार है। मौखिक मानहानि (slander) और लिखित मानहानि (libel) के बीच अंतर स्थापित किया गया।

(ख) उपद्रव (Nuisance)

व्यक्ति के शांतिपूर्ण जीवन और संपत्ति के उपभोग में अनुचित हस्तक्षेप को उपद्रव माना गया।

(ग) अतिक्रमण (Trespass)

अतिक्रमण को व्यक्ति और संपत्ति दोनों के विरुद्ध अपकृत्य के रूप में मान्यता दी गई।


8. विधिक सिद्धांतों का विकास

इंग्लैंड में अपकृत्य विधि के विकास के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण सिद्धांत विकसित हुए –

  1. Ubi Jus Ibi Remedium – जहाँ अधिकार है, वहाँ उपचार है।
  2. Damnum Sine Injuria – हानि हुई, पर अधिकार का उल्लंघन नहीं।
  3. Injuria Sine Damnum – अधिकार का उल्लंघन हुआ, पर वास्तविक हानि नहीं।

9. विधायी हस्तक्षेप (Legislative Intervention)

यद्यपि अपकृत्य विधि मुख्यतः न्यायनिर्णयों द्वारा विकसित हुई, फिर भी समय-समय पर संसद ने कुछ अधिनियम पारित किए, जैसे –

  • कारखाना अधिनियम
  • नियोक्ता दायित्व अधिनियम

इन अधिनियमों ने अपकृत्य विधि को अधिक प्रभावी बनाया।


10. आधुनिक काल में अपकृत्य विधि

आज इंग्लैंड में अपकृत्य विधि एक विकसित और सुव्यवस्थित विधिक शाखा है। यह नए-नए सामाजिक परिवर्तनों के अनुसार स्वयं को ढाल रही है, जैसे –

  • पर्यावरणीय क्षति
  • उपभोक्ता संरक्षण
  • चिकित्सकीय लापरवाही

निष्कर्ष

इंग्लैंड में अपकृत्य विधि का विकास एक दीर्घकालिक और क्रमिक प्रक्रिया का परिणाम है। प्रारंभिक रिट प्रणाली से लेकर आधुनिक लापरवाही सिद्धांत तक, इस विधि ने समाज की आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं को निरंतर विकसित किया है। कॉमन लॉ और इक्विटी न्यायालयों के योगदान से यह विधि अधिक न्यायसंगत, लचीली और प्रभावी बनी। आज अपकृत्य विधि न केवल व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करती है, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व और न्यायपूर्ण व्यवहार को भी प्रोत्साहित करती है।