लीग ऑफ नेशंस (League of Nations) : नामकरण, सदस्यता, लक्ष्य एवं उद्देश्य – एक विस्तृत अध्ययन
प्रस्तावना
प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) मानव इतिहास का एक अत्यंत विनाशकारी युद्ध था। इस युद्ध ने न केवल करोड़ों लोगों की जान ली, बल्कि विश्व की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संरचना को भी हिला कर रख दिया। युद्ध के बाद यह अनुभव किया गया कि यदि राष्ट्रों के बीच विवादों के समाधान के लिए कोई स्थायी और संगठित व्यवस्था नहीं बनाई गई, तो भविष्य में भी मानवता को ऐसे ही विनाशकारी संघर्षों का सामना करना पड़ेगा।
इसी पृष्ठभूमि में एक ऐसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन की आवश्यकता महसूस की गई, जो युद्ध की रोकथाम कर सके, राष्ट्रों के बीच सहयोग को बढ़ावा दे और वैश्विक शांति की स्थापना करे। इस आवश्यकता के परिणामस्वरूप लीग ऑफ नेशंस (League of Nations) का जन्म हुआ, जिसे आधुनिक काल का पहला राजनीतिक अंतर्राष्ट्रीय संगठन माना जाता है।
इस लेख में लीग ऑफ नेशंस के नामकरण (Nomenclature), सदस्यता (Membership), तथा लक्ष्य एवं उद्देश्य (Goals and Objectives) का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।
1. लीग ऑफ नेशंस का संक्षिप्त परिचय
League of Nations की स्थापना 10 जनवरी 1920 को वर्साय संधि के अंतर्गत हुई। इसका मुख्यालय स्विट्ज़रलैंड के जेनेवा नगर में स्थित था। यह संगठन राष्ट्रों के एक ऐसे संघ के रूप में अस्तित्व में आया, जिसका प्रमुख उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाए रखना था।
लीग ऑफ नेशंस को अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन की Fourteen Points योजना से प्रेरणा मिली, जिसमें सामूहिक सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर विशेष बल दिया गया था।
2. लीग ऑफ नेशंस का नामकरण (Nomenclature)
(क) नाम का अर्थ
“League of Nations” का शाब्दिक अर्थ है — राष्ट्रों का संघ या राष्ट्रों की लीग।
यह नाम स्वयं ही संगठन की प्रकृति और उद्देश्य को स्पष्ट करता है। इसका अभिप्राय था कि विश्व के विभिन्न राष्ट्र एक संघ या समूह के रूप में संगठित होकर कार्य करेंगे।
(ख) नामकरण का उद्देश्य
लीग ऑफ नेशंस का नाम इस प्रकार चुना गया था ताकि—
- राष्ट्रों की समानता का भाव प्रदर्शित हो
- यह संकेत मिले कि सभी सदस्य राष्ट्र परस्पर सहयोग से कार्य करेंगे
- शक्ति-आधारित राजनीति के स्थान पर संघ-आधारित राजनीति को बढ़ावा मिले
यह नाम इस विचार को प्रतिबिंबित करता है कि अंतर्राष्ट्रीय शांति केवल व्यक्तिगत राष्ट्रों के प्रयास से नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयास से ही संभव है।
(ग) प्रतीकात्मक महत्व
नामकरण का प्रतीकात्मक महत्व यह था कि—
- राष्ट्र एक-दूसरे के शत्रु नहीं, बल्कि साझेदार हैं
- सहयोग संघर्ष से श्रेष्ठ है
- युद्ध के स्थान पर संवाद को प्राथमिकता दी जानी चाहिए
इस प्रकार, लीग ऑफ नेशंस का नामकरण स्वयं में शांति और सहयोग का संदेश देता है।
3. लीग ऑफ नेशंस की सदस्यता (Membership)
लीग ऑफ नेशंस की सदस्यता व्यवस्था संगठन की सफलता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई थी। इसका उद्देश्य था कि अधिक से अधिक राष्ट्र इस संगठन से जुड़ें, ताकि इसे वास्तव में एक वैश्विक संस्था बनाया जा सके।
(क) सदस्यता की श्रेणियाँ
लीग ऑफ नेशंस में सदस्यता को मुख्यतः तीन श्रेणियों में बाँटा गया—
- मूल सदस्य (Original Members)
वे राष्ट्र जिन्होंने वर्साय संधि पर हस्ताक्षर किए और लीग की संधि (Covenant) को स्वीकार किया। - आमंत्रित सदस्य (Invited Members)
वे राष्ट्र जिन्हें बाद में लीग की सदस्यता के लिए आमंत्रित किया गया। - नवीन सदस्य (New Members)
वे राष्ट्र जिन्होंने बाद में आवेदन कर सदस्यता प्राप्त की।
(ख) सदस्यता प्राप्त करने की शर्तें
किसी भी राष्ट्र को लीग ऑफ नेशंस की सदस्यता प्राप्त करने के लिए—
- शांतिप्रिय होना आवश्यक था
- लीग की संधि के नियमों को स्वीकार करना आवश्यक था
- महासभा की स्वीकृति प्राप्त करनी होती थी
(ग) सदस्यता की संख्या
स्थापना के समय लीग ऑफ नेशंस में लगभग 42 सदस्य थे। समय के साथ यह संख्या बढ़कर लगभग 58 तक पहुँच गई।
(घ) प्रमुख अनुपस्थिति : अमेरिका
यद्यपि लीग ऑफ नेशंस की परिकल्पना अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने की थी, फिर भी संयुक्त राज्य अमेरिका इसका सदस्य नहीं बना। यह लीग की सबसे बड़ी कमजोरी मानी जाती है।
(ङ) सदस्यता की समाप्ति और निष्कासन
- कोई भी राष्ट्र स्वेच्छा से लीग की सदस्यता छोड़ सकता था
- यदि कोई राष्ट्र लीग के सिद्धांतों का उल्लंघन करता, तो उसे निष्कासित किया जा सकता था
जर्मनी, जापान और इटली जैसे देशों ने बाद में लीग की सदस्यता छोड़ दी, जिससे संगठन की शक्ति और प्रभाव कमजोर हो गया।
4. लीग ऑफ नेशंस के लक्ष्य (Goals)
लीग ऑफ नेशंस की स्थापना कुछ स्पष्ट और व्यापक लक्ष्यों के साथ की गई थी।
(क) अंतर्राष्ट्रीय शांति की स्थापना
लीग का मुख्य लक्ष्य था—
- युद्धों को रोकना
- राष्ट्रों के बीच विवादों का शांतिपूर्ण समाधान करना
(ख) सामूहिक सुरक्षा (Collective Security)
यह सिद्धांत इस विचार पर आधारित था कि—
यदि किसी एक राष्ट्र पर आक्रमण होता है, तो सभी सदस्य राष्ट्र मिलकर उसके विरुद्ध कार्रवाई करेंगे।
(ग) सहयोग और मैत्री
राष्ट्रों के बीच आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ावा देना भी लीग का लक्ष्य था।
(घ) मानव कल्याण
स्वास्थ्य, श्रम, शरणार्थी सहायता और मानव तस्करी की रोकथाम जैसे विषयों पर कार्य करना।
5. लीग ऑफ नेशंस के उद्देश्य (Objectives)
लीग के उद्देश्यों को उसकी संधि (Covenant) में स्पष्ट रूप से उल्लेखित किया गया था।
(क) युद्ध की रोकथाम
- हथियारों के नियंत्रण पर बल
- विवादों को पंचाट और न्यायिक माध्यम से हल करना
(ख) अंतर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान
- संधियों का पालन
- अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों का निर्वहन
(ग) सामाजिक और आर्थिक सुधार
- श्रमिकों की स्थिति में सुधार
- स्वास्थ्य सेवाओं का विकास
(घ) अल्पसंख्यकों और शरणार्थियों की रक्षा
- अल्पसंख्यक अधिकारों का संरक्षण
- शरणार्थियों के पुनर्वास की व्यवस्था
6. लक्ष्य और उद्देश्यों का महत्व
लीग ऑफ नेशंस के लक्ष्य और उद्देश्य इसलिए महत्वपूर्ण थे क्योंकि—
- उन्होंने शांति को एक वैश्विक आदर्श बनाया
- युद्ध को नीति के साधन के रूप में अस्वीकार किया
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की संस्कृति विकसित की
7. मूल्यांकन
यद्यपि लीग ऑफ नेशंस अपने लक्ष्यों को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं कर सका, फिर भी इसके नामकरण, सदस्यता व्यवस्था और उद्देश्यों ने आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के लिए आधार तैयार किया। बाद में स्थापित संयुक्त राष्ट्र संगठन ने इन्हीं अनुभवों से सीख लेकर अधिक प्रभावी ढाँचा विकसित किया।
निष्कर्ष
लीग ऑफ नेशंस का नामकरण उसके शांति और सहयोग के आदर्शों को दर्शाता है। इसकी सदस्यता व्यवस्था इसे एक वैश्विक संगठन बनाने का प्रयास थी, जबकि इसके लक्ष्य और उद्देश्य मानवता को युद्ध की विभीषिका से बचाने के लिए समर्पित थे।
यद्यपि लीग ऑफ नेशंस अंततः विफल सिद्ध हुआ, फिर भी इसने यह प्रमाणित कर दिया कि राष्ट्रों के बीच सहयोग के लिए अंतर्राष्ट्रीय संगठन अनिवार्य हैं। इसी कारण लीग ऑफ नेशंस को आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का प्रथम प्रयोगशाला (First Experiment) कहा जाता है।