अंतर्राष्ट्रीय विधि (International Law) के विषय (Subjects) से आप क्या समझते हैं? अंतर्राष्ट्रीय विधि के विषय-वस्तु (Subject-matter) कौन-कौन हैं और क्यों? – एक विस्तृत अध्ययन
प्रस्तावना
अंतर्राष्ट्रीय विधि (International Law) वह विधिक प्रणाली है जो राज्यों तथा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की अन्य इकाइयों के बीच संबंधों को नियंत्रित करती है। यह विधि यह निर्धारित करती है कि कौन-सी इकाइयाँ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अधिकार और दायित्व रखती हैं, तथा वे किस प्रकार अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकती हैं और दायित्वों का निर्वहन कर सकती हैं।
अंतर्राष्ट्रीय विधि के अध्ययन में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक यह है कि अंतर्राष्ट्रीय विधि का विषय (Subject of International Law) कौन है? दूसरे शब्दों में, यह जानना आवश्यक है कि किन व्यक्तियों, संस्थाओं या इकाइयों को अंतर्राष्ट्रीय विधि अधिकार और दायित्व प्रदान करती है।
परंपरागत रूप से केवल राज्यों को ही अंतर्राष्ट्रीय विधि का विषय माना जाता था, किंतु आधुनिक युग में यह अवधारणा विस्तृत हो गई है और अब अंतर्राष्ट्रीय संगठन, व्यक्ति तथा कुछ अन्य इकाइयाँ भी अंतर्राष्ट्रीय विधि के विषय मानी जाती हैं।
इस लेख में हम निम्नलिखित बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे—
- अंतर्राष्ट्रीय विधि के विषय की अवधारणा
- विषय और वस्तु (Subject और Object) में अंतर
- परंपरागत विषय : राज्य
- आधुनिक विषय : अंतर्राष्ट्रीय संगठन, व्यक्ति और अन्य इकाइयाँ
- अंतर्राष्ट्रीय विधि की विषय-वस्तु (Subject-matter)
- इन विषयों को मान्यता देने का औचित्य (Why they are subjects)
1. अंतर्राष्ट्रीय विधि का विषय (Subject of International Law) – अर्थ
अंतर्राष्ट्रीय विधि का विषय वह इकाई है—
- जिसे अंतर्राष्ट्रीय विधि के अंतर्गत अधिकार प्राप्त हों,
- जिस पर अंतर्राष्ट्रीय विधि के अंतर्गत दायित्व आरोपित किए जा सकें, और
- जो अंतर्राष्ट्रीय विधि के अंतर्गत अपने अधिकारों की रक्षा हेतु दावा प्रस्तुत कर सके।
सरल शब्दों में, जो इकाई अंतर्राष्ट्रीय विधि के अंतर्गत अधिकार और कर्तव्य दोनों रखती है, वही अंतर्राष्ट्रीय विधि का विषय कहलाती है।
2. विषय (Subject) और वस्तु (Object) में अंतर
अंतर्राष्ट्रीय विधि में—
- विषय (Subject) = जो अधिकार और दायित्व रखता है।
- वस्तु (Object) = जिसके संबंध में अधिकारों का प्रयोग किया जाता है।
उदाहरण के लिए, कोई राज्य अंतर्राष्ट्रीय विधि का विषय है, जबकि उसका क्षेत्र (territory) या जनसंख्या अंतर्राष्ट्रीय विधि की वस्तु हो सकती है।
3. परंपरागत दृष्टिकोण : राज्य ही अंतर्राष्ट्रीय विधि का विषय
शास्त्रीय (Classical) अंतर्राष्ट्रीय विधि के अनुसार केवल राज्य ही अंतर्राष्ट्रीय विधि का विषय थे। इसके कारण—
- अंतर्राष्ट्रीय विधि राज्यों की सहमति से बनी,
- संधियाँ राज्यों के बीच होती थीं,
- युद्ध और शांति के निर्णय राज्य लेते थे।
इसलिए प्रारंभिक काल में व्यक्ति और अन्य इकाइयाँ अंतर्राष्ट्रीय विधि के प्रत्यक्ष विषय नहीं मानी जाती थीं।
4. राज्य (State) : अंतर्राष्ट्रीय विधि का प्राथमिक विषय
राज्य को अंतर्राष्ट्रीय विधि का प्रमुख विषय इसलिए माना जाता है क्योंकि—
- राज्य संधियाँ कर सकता है।
- राज्य युद्ध और शांति की घोषणा कर सकता है।
- राज्य को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त होती है।
- राज्य अंतर्राष्ट्रीय विवादों में पक्षकार बन सकता है।
राज्य के अधिकारों में शामिल हैं—
- संप्रभुता का अधिकार
- क्षेत्रीय अखंडता का अधिकार
- आत्मरक्षा का अधिकार
राज्य के दायित्वों में शामिल हैं—
- अन्य राज्यों की संप्रभुता का सम्मान
- अंतर्राष्ट्रीय शांति बनाए रखना
- संधियों का पालन करना
इस प्रकार, राज्य अंतर्राष्ट्रीय विधि का मूल और केंद्रीय विषय है।
5. आधुनिक दृष्टिकोण : अंतर्राष्ट्रीय संगठन भी विषय
20वीं शताब्दी में अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के विकास के साथ यह स्पष्ट हो गया कि केवल राज्य ही अंतर्राष्ट्रीय विधि के विषय नहीं हैं।
उदाहरणस्वरूप—
- League of Nations
- United Nations
इन संगठनों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अधिकार और दायित्व प्राप्त हैं, जैसे—
- संधियाँ करना
- संपत्ति अर्जित करना
- मुकदमा दायर करना या सामना करना
इसलिए अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को अंतर्राष्ट्रीय विधि का व्युत्पन्न विषय (Derived Subject) माना जाता है।
6. व्यक्ति (Individuals) : अंतर्राष्ट्रीय विधि के विषय
आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय विधि में व्यक्ति को भी सीमित रूप से विषय माना जाता है।
(क) मानवाधिकारों के क्षेत्र में
व्यक्तियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अधिकार प्राप्त हैं, जैसे—
- जीवन का अधिकार
- स्वतंत्रता का अधिकार
- समानता का अधिकार
(ख) अंतर्राष्ट्रीय अपराधों के क्षेत्र में
व्यक्ति पर अंतर्राष्ट्रीय अपराधों के लिए दायित्व आरोपित किया जा सकता है, जैसे—
- युद्ध अपराध
- नरसंहार
- मानवता के विरुद्ध अपराध
इससे स्पष्ट है कि व्यक्ति अब केवल अंतर्राष्ट्रीय विधि की वस्तु नहीं, बल्कि विषय भी बन चुका है।
7. अन्य विषय
(क) राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन (National Liberation Movements)
कुछ परिस्थितियों में इन्हें सीमित मान्यता दी जाती है।
(ख) बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (Multinational Corporations)
इनका प्रभाव बढ़ रहा है, किंतु इन्हें अभी पूर्ण विषय का दर्जा प्राप्त नहीं है।
(ग) गैर-सरकारी संगठन (NGOs)
इनकी भूमिका महत्वपूर्ण है, परंतु इन्हें औपचारिक विषय नहीं माना जाता।
8. अंतर्राष्ट्रीय विधि की विषय-वस्तु (Subject-matter of International Law)
अंतर्राष्ट्रीय विधि की विषय-वस्तु उन सभी विषयों को सम्मिलित करती है जिन पर अंतर्राष्ट्रीय नियम लागू होते हैं, जैसे—
(क) राज्य संबंधी विषय
- मान्यता (Recognition)
- उत्तराधिकार (State Succession)
- क्षेत्रीय सीमाएँ
(ख) शांति और सुरक्षा
- युद्ध और शांति
- हथियार नियंत्रण
- सामूहिक सुरक्षा
(ग) मानवाधिकार
- मौलिक अधिकार
- अल्पसंख्यक अधिकार
(घ) समुद्री, वायु और अंतरिक्ष विधि
- समुद्र का कानून
- वायुयान नियम
- बाह्य अंतरिक्ष का उपयोग
(ङ) आर्थिक और व्यापारिक संबंध
- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार
- निवेश
- विकास सहायता
(च) पर्यावरण संरक्षण
- जलवायु परिवर्तन
- जैव विविधता संरक्षण
9. इन्हें विषय क्यों माना जाता है? (Why they are Subjects)
किसी इकाई को अंतर्राष्ट्रीय विधि का विषय मानने के मुख्य आधार हैं—
- उसके पास अंतर्राष्ट्रीय अधिकार हों।
- उस पर अंतर्राष्ट्रीय दायित्व हों।
- वह अंतर्राष्ट्रीय मंच पर दावा प्रस्तुत कर सके।
राज्य, अंतर्राष्ट्रीय संगठन और व्यक्ति इन तीनों कसौटियों पर किसी न किसी सीमा तक खरे उतरते हैं, इसलिए इन्हें अंतर्राष्ट्रीय विधि के विषय माना जाता है।
10. मूल्यांकन
आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय विधि स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील है। समय के साथ नए विषय जुड़ते जा रहे हैं। यह विकास इस तथ्य को दर्शाता है कि अंतर्राष्ट्रीय विधि अब केवल राज्यों की विधि नहीं रही, बल्कि मानवता की विधि बनती जा रही है।
निष्कर्ष
अंतर्राष्ट्रीय विधि का विषय वह इकाई है जिसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अधिकार और दायित्व प्राप्त हों। परंपरागत रूप से राज्य ही अंतर्राष्ट्रीय विधि का विषय थे, किंतु आधुनिक युग में अंतर्राष्ट्रीय संगठन और व्यक्ति भी इस श्रेणी में सम्मिलित हो चुके हैं।
अंतर्राष्ट्रीय विधि की विषय-वस्तु अत्यंत व्यापक है और इसमें राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, मानवीय तथा पर्यावरणीय सभी पहलू सम्मिलित हैं। इस प्रकार, अंतर्राष्ट्रीय विधि का विकास मानव समाज की बढ़ती हुई पारस्परिक निर्भरता और सहयोग की भावना का प्रत्यक्ष प्रमाण है।