“राज्य-प्रायोजित मंदिर उत्सव जाति को स्थायी नहीं कर सकते” — मद्रास उच्च न्यायालय का संवैधानिक दृष्टिकोण और सामाजिक न्याय की पुनर्पुष्टि
भारतीय समाज में मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का केंद्र भी रहे हैं। दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में मंदिर उत्सव (Temple Festivals) सामुदायिक पहचान, परंपरा और स्थानीय सहभागिता का महत्वपूर्ण प्रतीक माने जाते हैं। किंतु जब इन धार्मिक आयोजनों का संचालन सीधे राज्य के अधीन किसी विभाग के माध्यम से होता है, तब प्रश्न केवल परंपरा का नहीं, बल्कि संविधान और मौलिक अधिकारों का भी हो जाता है।
इसी संदर्भ में हाल ही में Madras High Court ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि राज्य द्वारा Hindu Religious and Charitable Endowments Department (एचआर एंड सीई विभाग) के माध्यम से आयोजित मंदिर उत्सव किसी भी प्रकार से जाति-आधारित स्थायी व्यवस्था को बनाए रखने या बढ़ावा देने का माध्यम नहीं बन सकते। न्यायालय का यह कथन भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों—समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय—की पुनर्पुष्टि के रूप में देखा जा रहा है।
1. विवाद की पृष्ठभूमि
मामला एक ऐसे मंदिर उत्सव से संबंधित था जिसका प्रशासन एचआर एंड सीई विभाग के नियंत्रण में था। याचिकाकर्ताओं ने यह आरोप लगाया कि उत्सव के दौरान कुछ विशिष्ट भूमिकाएँ—जैसे जुलूस में अग्रणी स्थान, धार्मिक अनुष्ठानों में विशेषाधिकार, या आयोजन समिति में स्थायी प्रतिनिधित्व—ऐतिहासिक रूप से कुछ खास जातियों को ही दिए जाते रहे हैं।
प्रश्न यह उठा कि क्या राज्य-नियंत्रित धार्मिक आयोजन में ऐसी परंपराएँ संवैधानिक रूप से स्वीकार्य हैं? यदि मंदिर का प्रशासन राज्य के हाथ में है, तो क्या वह परंपरा के नाम पर जाति-आधारित विभाजन को जारी रख सकता है?
2. न्यायालय का मूल तर्क
मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि जब कोई धार्मिक संस्था पूर्णतः निजी प्रबंधन के अधीन हो, तब उसकी आंतरिक परंपराओं पर सीमित हस्तक्षेप किया जा सकता है। किंतु जब राज्य स्वयं प्रशासनिक नियंत्रण संभालता है, तब वह संविधान से बंधा होता है।
न्यायालय ने कहा कि राज्य किसी भी रूप में जातिगत विशेषाधिकारों को “स्थायी” या “संरक्षित” नहीं कर सकता। यदि राज्य-प्रायोजित उत्सव में किसी एक जाति को विशिष्ट और अनन्य अधिकार दिए जाते हैं, तो यह अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) के विपरीत हो सकता है।
3. अनुच्छेद 14 और 15 की भूमिका
अनुच्छेद 14 सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता और विधि के समान संरक्षण का अधिकार देता है। इसका अर्थ यह है कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ मनमाना या भेदभावपूर्ण व्यवहार नहीं कर सकता।
अनुच्छेद 15 स्पष्ट रूप से धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव को निषिद्ध करता है। जब कोई धार्मिक उत्सव राज्य के अधीन विभाग द्वारा आयोजित किया जाता है, तो उसमें जाति-आधारित स्थायी पद या विशेषाधिकार देना संविधान की भावना के विरुद्ध हो सकता है।
न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन) की व्यापक भावना भी ऐसे मामलों में प्रासंगिक है। यद्यपि यहां प्रत्यक्ष अस्पृश्यता का प्रश्न नहीं था, किंतु सामाजिक बहिष्करण या जातिगत वर्चस्व की स्थायी संरचना संवैधानिक मूल्यों से मेल नहीं खाती।
4. राज्य और धर्म: सीमाएँ और दायित्व
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है, किंतु इसका अर्थ धर्म-विरोधी होना नहीं है। राज्य धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करता है और अनुच्छेद 25 एवं 26 के तहत धार्मिक समुदायों को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार देता है।
लेकिन जब राज्य स्वयं मंदिरों के प्रशासन में प्रवेश करता है—जैसे कि तमिलनाडु में एचआर एंड सीई विभाग के माध्यम से—तब वह एक सार्वजनिक प्राधिकरण बन जाता है। इस स्थिति में उसके निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन होते हैं और उन्हें संवैधानिक कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य की भूमिका “तटस्थ पर्यवेक्षक” की नहीं, बल्कि “संवैधानिक संरक्षक” की है। वह किसी भी सामाजिक विभाजन को बढ़ावा नहीं दे सकता।
5. परंपरा बनाम संवैधानिक नैतिकता
भारतीय समाज में कई धार्मिक परंपराएँ सदियों से चली आ रही हैं। कुछ परंपराएँ विशिष्ट समुदायों या जातियों को विशेष भूमिका देती रही हैं। प्रश्न यह है कि क्या ऐसी परंपराएँ स्वतः ही वैध मानी जाएँ?
न्यायालय ने संकेत दिया कि यदि कोई परंपरा संविधान के मूल अधिकारों के विपरीत हो, तो उसे यथावत बनाए रखना उचित नहीं। “संवैधानिक नैतिकता” (Constitutional Morality) की अवधारणा यह कहती है कि सामाजिक आस्थाएँ और परंपराएँ भी संविधान की सीमाओं में रहकर ही मान्य होंगी।
6. सामाजिक न्याय और समावेशन
यह निर्णय सामाजिक समावेशन (inclusion) की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। मंदिर उत्सव सामुदायिक एकता का प्रतीक होते हैं। यदि उनमें सभी वर्गों और जातियों की समान भागीदारी सुनिश्चित की जाए, तो यह सामाजिक सद्भाव को सुदृढ़ कर सकता है।
न्यायालय ने यह नहीं कहा कि ऐतिहासिक भूमिकाएँ पूरी तरह समाप्त कर दी जाएँ, बल्कि यह स्पष्ट किया कि राज्य उन्हें “स्थायी जातिगत अधिकार” के रूप में संरक्षित नहीं कर सकता। यदि किसी समुदाय की भूमिका केवल परंपरा के आधार पर है और वह अन्य समुदायों को बाहर रखती है, तो राज्य को पुनर्विचार करना होगा।
7. संभावित प्रभाव
इस निर्णय का प्रभाव केवल एक मंदिर या एक उत्सव तक सीमित नहीं रहेगा। तमिलनाडु में हजारों मंदिर एचआर एंड सीई विभाग के अधीन हैं। यदि किसी भी आयोजन में जाति-आधारित स्थायी विशेषाधिकार दिए जाते हैं, तो उन्हें संवैधानिक दृष्टि से परखा जा सकता है।
यह आदेश अन्य राज्यों के लिए भी एक मार्गदर्शक सिद्धांत प्रस्तुत करता है, जहाँ राज्य धार्मिक संस्थाओं के प्रशासन में भूमिका निभाता है।
8. न्यायिक संतुलन
यह उल्लेखनीय है कि न्यायालय ने धार्मिक आस्था या पूजा-पद्धति में हस्तक्षेप नहीं किया। उसने केवल राज्य की भूमिका और उसके संवैधानिक दायित्व को रेखांकित किया। यह निर्णय न्यायिक संतुलन का उदाहरण है—जहाँ धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए समानता और सामाजिक न्याय को प्राथमिकता दी गई।
9. आलोचना और समर्थन
कुछ लोग इसे परंपरा में हस्तक्षेप मान सकते हैं। उनका तर्क हो सकता है कि मंदिरों की ऐतिहासिक संरचना और अनुष्ठानों को बदलना सांस्कृतिक विरासत पर आघात है।
वहीं, समर्थकों का कहना है कि संविधान का उद्देश्य ही सामाजिक सुधार और समानता की स्थापना है। यदि राज्य की भूमिका प्रत्यक्ष है, तो वह परंपरा के नाम पर भेदभाव को जारी नहीं रख सकता।
10. निष्कर्ष
मद्रास उच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना को सुदृढ़ करता है। जब राज्य धार्मिक आयोजनों का संचालन करता है, तो वह केवल प्रशासक नहीं, बल्कि संविधान का प्रतिनिधि होता है।
“राज्य-प्रायोजित मंदिर उत्सव जाति को स्थायी नहीं कर सकते”—यह कथन केवल एक कानूनी निष्कर्ष नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का संकेत है। यह संदेश स्पष्ट है कि परंपरा का सम्मान तभी तक है, जब तक वह संविधान के मूल सिद्धांतों—समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय—के अनुरूप हो।
इस प्रकार, यह निर्णय भारतीय समाज में समानता आधारित सहभागिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है और भविष्य में धार्मिक प्रशासन के मामलों में संवैधानिक मानकों को और अधिक स्पष्ट करेगा।