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भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 8 : सत्र न्यायाधीश की अनुपस्थिति में न्यायिक शक्तियों का प्रयोग 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 8 : सत्र न्यायाधीश की अनुपस्थिति में न्यायिक शक्तियों का प्रयोग 

भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में न्यायिक निरंतरता (Judicial Continuity) एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यदि किसी कारणवश न्यायाधीश उपलब्ध न हो, तो न्यायिक प्रक्रिया ठप नहीं होनी चाहिए। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 8 का निर्माण किया गया है।

यह धारा सुनिश्चित करती है कि सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge) की अनुपस्थिति या कार्य करने में असमर्थता की स्थिति में भी तात्कालिक (urgent) न्यायिक कार्य बाधित न हों। यह प्रावधान प्रशासनिक सुविधा मात्र नहीं, बल्कि न्याय के संवैधानिक दर्शन का हिस्सा है।


1. धारा 8 का विधिक पाठ और उसका आशय

धारा 8 का सार यह है कि—

यदि सत्र न्यायाधीश अपनी अनुपस्थिति या किसी अन्य कारण से कार्य करने में असमर्थ हों, तो वे किसी तत्काल आवेदन के निपटान हेतु—

  1. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (Additional Sessions Judge) को अधिकृत कर सकते हैं;
  2. यदि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश उपलब्ध न हो, तो मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (Chief Judicial Magistrate – CJM) को अधिकृत कर सकते हैं।

ऐसे अधिकृत न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट को उस आवेदन के निपटान का वही अधिकार होगा जो सत्र न्यायाधीश को प्राप्त है, बशर्ते वह अधिकार उसी सीमित प्रयोजन तक सीमित हो।

यह स्पष्ट है कि यह स्थायी शक्ति-हस्तांतरण नहीं है, बल्कि परिस्थितिजन्य (contingent) व्यवस्था है।


2. धारा 8 की पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक आधार

BNSS ने पुराने दंड प्रक्रिया कानून का स्थान लिया है। पूर्व में Code of Criminal Procedure, 1973 (CrPC) में भी इसी प्रकार की व्यवस्था थी।

अर्थात् धारा 8 कोई नवीन विधिक प्रयोग नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रशासन की एक स्थापित परंपरा का आधुनिक पुनर्संरचन है। BNSS ने पुराने प्रावधानों को व्यवस्थित कर अधिक स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत किया है।


3. धारा 8 की आवश्यकता : न्यायिक निरंतरता का सिद्धांत

भारतीय न्यायालयों में अनेक आवेदन ऐसे होते हैं जिनका त्वरित निपटान आवश्यक होता है। उदाहरण—

  • जमानत आवेदन
  • अग्रिम जमानत
  • अंतरिम राहत
  • स्थगन आदेश (Stay)
  • रिमांड से संबंधित आवेदन

यदि ऐसे मामलों में सत्र न्यायाधीश अनुपस्थित हों और कोई वैकल्पिक व्यवस्था न हो, तो—

  • अभियुक्त का व्यक्तिगत स्वतंत्रता अधिकार प्रभावित होगा
  • पीड़ित को राहत में विलंब होगा
  • न्यायिक प्रक्रिया बाधित होगी

धारा 8 इस संभावित शून्यता को भरती है।


4. “अनुपस्थिति” और “असमर्थता” का अर्थ

धारा 8 में दो स्थितियाँ वर्णित हैं—

(1) अनुपस्थिति (Absence)

जब सत्र न्यायाधीश अवकाश पर हों, स्थानांतरित हो चुके हों, या किसी अन्य कारण से न्यायालय में उपस्थित न हों।

(2) असमर्थता (Inability)

जब सत्र न्यायाधीश स्वास्थ्य कारणों, प्रशासनिक दायित्वों या अन्य बाधाओं के कारण कार्य करने में सक्षम न हों।

यहाँ “असमर्थता” का अर्थ स्थायी अयोग्यता नहीं, बल्कि अस्थायी कार्य-असमर्थता है।


5. “तत्काल आवेदन” की अवधारणा

धारा 8 केवल “तत्काल” (urgent) आवेदन पर लागू होती है।

यह शब्द विधि में परिभाषित नहीं है, अतः इसका अर्थ परिस्थितियों के अनुसार न्यायिक विवेक से निर्धारित होगा।

तत्काल आवेदन के उदाहरण:

  • हिरासत में बंद अभियुक्त की जमानत
  • जीवन एवं स्वतंत्रता से संबंधित अंतरिम राहत
  • गंभीर आपराधिक मामले में स्थगन आवेदन
  • सर्च वारंट या रिमांड की तात्कालिक आवश्यकता

अर्थात् ऐसे आवेदन जिनमें विलंब से गंभीर हानि हो सकती है।


6. शक्ति का हस्तांतरण (Delegation of Power)

धारा 8 के अंतर्गत सत्र न्यायाधीश—

  • सामान्य आदेश द्वारा
  • या विशेष आदेश द्वारा

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अथवा CJM को अधिकृत कर सकते हैं।

यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि—

  • शक्ति स्थायी रूप से हस्तांतरित नहीं होती
  • केवल विशेष परिस्थिति में प्रयोग की जाती है
  • और सीमित दायरे में लागू होती है

7. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की भूमिका

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश मूलतः सत्र न्यायालय का ही अंग होते हैं। उन्हें सत्र न्यायाधीश के समान अधिकार प्राप्त होते हैं, जब उन्हें प्रकरण सौंपा जाता है।

धारा 8 इस संरचना को औपचारिक मान्यता देती है और स्पष्ट करती है कि अनुपस्थिति की स्थिति में वे तत्काल आवेदन पर निर्णय दे सकते हैं।


8. मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) की भूमिका

यदि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश उपलब्ध न हों, तो मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को अधिकृत किया जा सकता है।

यह व्यवस्था असाधारण स्थिति के लिए है।
क्योंकि सामान्यतः CJM सत्र न्यायालय के अधीन कार्य करते हैं, परंतु धारा 8 उन्हें अस्थायी रूप से विशेष अधिकार प्रदान करती है।


9. संवैधानिक परिप्रेक्ष्य

धारा 8 अप्रत्यक्ष रूप से संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़ी है।

अनुच्छेद 21 के अंतर्गत—

“किसी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित किया जाएगा।”

न्यायालयों ने “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” की व्याख्या करते हुए “त्वरित न्याय” (Speedy Trial) को मौलिक अधिकार का भाग माना है।

यदि जमानत जैसे आवेदन लंबित रह जाएँ केवल इसलिए कि सत्र न्यायाधीश उपलब्ध नहीं हैं, तो यह अनुच्छेद 21 की भावना के विपरीत होगा।


10. व्यावहारिक उदाहरण

उदाहरण 1 : जमानत आवेदन

एक अभियुक्त हत्या के आरोप में गिरफ्तार है। वह सत्र न्यायालय में जमानत आवेदन दायर करता है। उसी समय सत्र न्यायाधीश लंबी छुट्टी पर हैं।

ऐसी स्थिति में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धारा 8 के तहत आवेदन सुन सकते हैं।


उदाहरण 2 : अग्रिम जमानत

किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी की आशंका है। वह अग्रिम जमानत हेतु आवेदन करता है।
सत्र न्यायाधीश अस्वस्थ हैं।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, यदि अधिकृत हों, तो उस आवेदन पर निर्णय दे सकते हैं।


उदाहरण 3 : स्थगन आदेश

किसी संपत्ति विवाद में आपराधिक मामला दर्ज है और तुरंत स्थगन आवश्यक है।
न्यायालय की अनुपस्थिति में आदेश न मिले तो अपूरणीय क्षति हो सकती है।
धारा 8 ऐसी स्थिति में राहत का मार्ग प्रशस्त करती है।


11. सीमाएँ और सावधानियाँ

धारा 8 के प्रयोग में निम्न सावधानियाँ आवश्यक हैं—

  1. केवल तत्काल मामलों में ही प्रयोग हो
  2. अधिकार-सीमा से बाहर आदेश न दिया जाए
  3. शक्ति का प्रयोग न्यायिक विवेक से हो
  4. स्थायी शक्ति-हस्तांतरण न समझा जाए

यदि कोई आदेश अधिकार-सीमा से परे दिया जाता है, तो वह अपीलीय न्यायालय में चुनौती योग्य होगा।


12. न्यायिक प्रशासन में धारा 8 का महत्व

धारा 8—

  • न्यायिक शून्यता रोकती है
  • मामलों के लंबित होने से बचाती है
  • अभियुक्त और पीड़ित दोनों के अधिकार सुरक्षित रखती है
  • प्रशासनिक दक्षता बढ़ाती है

यह प्रावधान न्यायिक संरचना में लचीलापन (Flexibility) लाता है।


13. संभावित व्याख्यात्मक प्रश्न

  1. क्या “तत्काल” का निर्धारण सत्र न्यायाधीश करेंगे या अधिकृत न्यायाधीश?
  2. क्या सामान्य प्रशासनिक आदेश पर्याप्त है?
  3. क्या CJM को सत्र न्यायाधीश के समान दंडादेश देने का अधिकार होगा?

इन प्रश्नों का उत्तर न्यायिक व्याख्या और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।


14. आलोचनात्मक दृष्टिकोण

कुछ विधि-विशेषज्ञ यह प्रश्न उठा सकते हैं कि—

  • क्या मजिस्ट्रेट स्तर के न्यायाधीश को सत्र स्तर की शक्ति देना उचित है?
  • क्या इससे अधिकार-सीमा में भ्रम उत्पन्न हो सकता है?

परंतु यह ध्यान देना आवश्यक है कि यह व्यवस्था अस्थायी और सीमित प्रयोजन के लिए है।


15. निष्कर्ष

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 8 न्यायिक प्रशासन का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है।

यह सुनिश्चित करती है कि—

  • न्यायिक प्रक्रिया बाधित न हो
  • तात्कालिक मामलों में विलंब न हो
  • और नागरिकों के मौलिक अधिकार सुरक्षित रहें

धारा 8 न्यायिक निरंतरता, त्वरित न्याय और प्रशासनिक लचीलापन—इन तीनों सिद्धांतों का समन्वय है।

इस प्रकार, यह प्रावधान केवल तकनीकी व्यवस्था नहीं, बल्कि न्याय के व्यापक दर्शन का व्यावहारिक रूप है।