बीएनएसएस की धारा 7 : “क्षेत्रीय विभाजन” का विस्तृत अध्ययन – संरचना, उद्देश्य, संवैधानिक आधार एवं व्यावहारिक महत्व
प्रस्तावना
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) ने भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली को आधुनिक और सुव्यवस्थित बनाने के उद्देश्य से अनेक संरचनात्मक और प्रक्रियात्मक परिवर्तन किए हैं। इस संहिता का अध्याय II, जो “आपराधिक न्यायालयों और कार्यालयों का गठन” से संबंधित है, न्यायिक व्यवस्था की प्रशासनिक नींव को स्पष्ट करता है। इसी अध्याय में धारा 7 “क्षेत्रीय विभाजन” से संबंधित प्रावधान प्रस्तुत करती है।
धारा 7 केवल प्रशासनिक सीमाओं का निर्धारण भर नहीं है, बल्कि यह न्यायिक अधिकार-क्षेत्र (Jurisdiction) की आधारशिला है। न्यायालयों की कार्यप्रणाली, मामलों का वितरण, पुलिस प्रशासन, अभियोजन की व्यवस्था तथा अपीलीय संरचना—ये सभी क्षेत्रीय विभाजन से प्रभावित होते हैं। इसलिए इस धारा का महत्व केवल तकनीकी नहीं, बल्कि व्यावहारिक और संवैधानिक भी है।
इस लेख में हम धारा 7 के प्रत्येक उपबंध का विस्तार से विश्लेषण करेंगे, उसके उद्देश्य, पूर्ववर्ती व्यवस्था से तुलना, न्यायिक स्वतंत्रता से संबंध, तथा इसके समालोचनात्मक पहलुओं पर विचार करेंगे।
धारा 7 का मूल स्वरूप
धारा 7 निम्नलिखित मुख्य प्रावधान प्रस्तुत करती है—
- प्रत्येक राज्य सत्र प्रभाग (Sessions Division) होगा या सत्र प्रभागों से मिलकर बनेगा।
- प्रत्येक सत्र प्रभाग, इस संहिता के प्रयोजनों के लिए, जिला होगा या जिलों से मिलकर बनेगा।
- राज्य सरकार, उच्च न्यायालय से परामर्श करने के बाद, सत्र प्रभागों एवं जिलों की सीमाओं या संख्या में परिवर्तन कर सकती है।
- राज्य सरकार, उच्च न्यायालय से परामर्श के पश्चात, किसी जिले को उप-मंडलों में विभाजित कर सकती है तथा उनकी सीमाओं में परिवर्तन कर सकती है।
- पूर्व में विद्यमान सत्र प्रभाग, जिले और उप-मंडल इस धारा के अधीन गठित माने जाएंगे।
इन प्रावधानों से स्पष्ट है कि यह धारा न्यायिक क्षेत्राधिकार की भौगोलिक संरचना को निर्धारित करती है।
सत्र प्रभाग (Sessions Division) का महत्व
1. अवधारणा
सत्र प्रभाग वह क्षेत्रीय इकाई है, जिसके अंतर्गत सत्र न्यायालय कार्य करता है। यह गंभीर आपराधिक मामलों की सुनवाई का केंद्र होता है।
2. जिला और सत्र प्रभाग का संबंध
धारा 7 यह स्पष्ट करती है कि प्रत्येक सत्र प्रभाग जिला होगा या जिलों से मिलकर बनेगा। इसका अर्थ यह है कि सत्र न्यायालय का अधिकार-क्षेत्र जिला स्तर पर निर्धारित होता है।
3. व्यावहारिक प्रभाव
- गंभीर अपराधों का सुनवाई स्थल स्पष्ट होता है।
- अपील की प्रक्रिया सुव्यवस्थित होती है।
- न्यायालयों का कार्यभार संतुलित रहता है।
जिलों का गठन और उनका महत्व
जिला भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की मूल इकाई है। आपराधिक न्याय प्रणाली में जिला वह स्तर है जहाँ अधिकांश न्यायिक और पुलिस गतिविधियाँ केंद्रित होती हैं।
धारा 7 के अनुसार—
- प्रत्येक सत्र प्रभाग जिला होगा या जिलों का समूह होगा।
- इससे यह सुनिश्चित होता है कि न्यायिक अधिकार-क्षेत्र प्रशासनिक सीमाओं के अनुरूप हो।
महत्व
- न्यायिक प्रक्रिया में स्पष्टता।
- पुलिस और न्यायालयों के बीच समन्वय।
- अभियोजन और कारागार व्यवस्था का सुव्यवस्थित संचालन।
उप-मंडल (Sub-Division)
1. अवधारणा
जिले को छोटे प्रशासनिक भागों में विभाजित करने की आवश्यकता होती है, ताकि न्याय और प्रशासन दोनों में दक्षता लाई जा सके।
2. धारा 7(3) का प्रावधान
राज्य सरकार उच्च न्यायालय से परामर्श कर जिले को उप-मंडलों में विभाजित कर सकती है।
3. महत्व
- छोटे मामलों का स्थानीय स्तर पर निस्तारण।
- ग्रामीण क्षेत्रों में न्याय की पहुँच।
- प्रशासनिक कार्यभार का विकेंद्रीकरण।
राज्य सरकार और उच्च न्यायालय की भूमिका
धारा 7 की विशेषता यह है कि क्षेत्रीय सीमाओं में परिवर्तन केवल राज्य सरकार द्वारा नहीं, बल्कि उच्च न्यायालय से परामर्श के बाद ही किया जा सकता है।
1. परामर्श की आवश्यकता
यह प्रावधान न्यायिक स्वतंत्रता को सुदृढ़ करता है। यदि केवल कार्यपालिका को यह अधिकार दिया जाता, तो न्यायिक संरचना राजनीतिक प्रभाव में आ सकती थी।
2. संतुलन का सिद्धांत
- राज्य सरकार प्रशासनिक सुविधा को ध्यान में रखती है।
- उच्च न्यायालय न्यायिक कार्यक्षमता और निष्पक्षता को।
इस प्रकार यह प्रावधान शक्ति-विभाजन (Separation of Powers) के सिद्धांत को व्यावहारिक रूप देता है।
पूर्ववर्ती व्यवस्था से तुलना
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 में भी इसी प्रकार का प्रावधान था। नई संहिता ने मूल ढांचे को बनाए रखते हुए प्रशासनिक स्पष्टता और आधुनिकता पर बल दिया है।
मुख्य अंतर यह है कि अब डिजिटल प्रशासन और ई-कोर्ट प्रणाली के संदर्भ में क्षेत्रीय विभाजन अधिक लचीला और व्यावहारिक बनाया जा सकता है।
संवैधानिक आधार
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 233 से 237 तक जिला न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों की नियुक्ति और नियंत्रण संबंधी प्रावधान दिए गए हैं।
धारा 7 इन संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप न्यायिक संरचना को भौगोलिक आधार प्रदान करती है।
व्यावहारिक चुनौतियाँ
यद्यपि धारा 7 न्यायिक ढांचे को स्पष्ट करती है, परंतु कुछ समस्याएँ सामने आती हैं—
- नए जिलों के गठन के बाद न्यायालयों की स्थापना में विलंब।
- संसाधनों और न्यायिक अधिकारियों की कमी।
- ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में अवसंरचना की समस्या।
यदि क्षेत्रीय विभाजन केवल कागजों तक सीमित रहे और आवश्यक संसाधन उपलब्ध न हों, तो इसका उद्देश्य पूर्ण नहीं हो पाएगा।
न्याय तक पहुँच (Access to Justice)
धारा 7 का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है—न्याय को नागरिकों के निकट लाना।
जब जिले और उप-मंडल स्तर पर न्यायालय स्थापित होते हैं, तो—
- वादकारियों को लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ती।
- खर्च कम होता है।
- न्याय में विलंब घटता है।
यह सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
समालोचनात्मक विश्लेषण
सकारात्मक पक्ष
- न्यायिक अधिकार-क्षेत्र की स्पष्टता।
- कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन।
- विकेंद्रीकरण और दक्षता।
नकारात्मक पक्ष
- राजनीतिक कारणों से जिलों का गठन।
- न्यायिक संसाधनों की असमान उपलब्धता।
- सीमाओं में बार-बार परिवर्तन से प्रशासनिक भ्रम।
इसलिए यह आवश्यक है कि क्षेत्रीय विभाजन व्यावहारिक आवश्यकताओं और न्यायिक दक्षता के आधार पर हो।
डिजिटल युग में क्षेत्रीय विभाजन
ई-कोर्ट, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और ऑनलाइन सुनवाई की व्यवस्था ने भौगोलिक सीमाओं की पारंपरिक अवधारणा को आंशिक रूप से परिवर्तित कर दिया है।
फिर भी, भौतिक न्यायालयों की आवश्यकता बनी रहती है, विशेषकर साक्ष्य, गवाह और स्थानीय जांच के मामलों में।
धारा 7 का महत्व इसलिए बना रहेगा, क्योंकि क्षेत्रीय अधिकार-क्षेत्र न्यायिक व्यवस्था की संरचनात्मक आवश्यकता है।
निष्कर्ष
बीएनएसएस की धारा 7 “क्षेत्रीय विभाजन” भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की प्रशासनिक और न्यायिक संरचना का आधार है। यह सुनिश्चित करती है कि प्रत्येक राज्य सत्र प्रभागों, जिलों और उप-मंडलों में व्यवस्थित रूप से विभाजित हो।
राज्य सरकार और उच्च न्यायालय के बीच परामर्श की व्यवस्था न्यायिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक संतुलन को सुदृढ़ करती है।
यद्यपि व्यावहारिक चुनौतियाँ मौजूद हैं—जैसे संसाधनों की कमी और अवसंरचना की समस्या—फिर भी यह धारा न्यायिक अधिकार-क्षेत्र की स्पष्टता और न्याय तक पहुँच सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
अंततः कहा जा सकता है कि धारा 7 केवल सीमाओं का निर्धारण नहीं करती, बल्कि यह न्यायिक व्यवस्था को संगठित, संतुलित और उत्तरदायी बनाने की आधारभूत संरचना प्रदान करती है। यह प्रावधान न्याय के विकेंद्रीकरण और नागरिकों तक उसकी पहुँच को सुदृढ़ करता है, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल आवश्यकता है।