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न्यायिक स्वतंत्रता का संवैधानिक कवच : भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 15 का विस्तृत विश्लेषण llb

न्यायिक स्वतंत्रता का संवैधानिक कवच : भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 15 का विस्तृत विश्लेषण

भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में न्यायाधीश की भूमिका केवल विवादों का निपटारा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह विधि के शासन (Rule of Law) का संरक्षक भी है। इसी उद्देश्य से भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 15 न्यायाधीशों को उनके न्यायिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान एक विशेष कानूनी संरक्षण प्रदान करती है।

यह धारा मूलतः उस सिद्धांत पर आधारित है कि—

“कोई भी कार्य अपराध नहीं है जो न्यायाधीश द्वारा न्यायिक रूप से कार्य करते समय, किसी ऐसी शक्ति का प्रयोग करते हुए किया जाता है जो उसे कानून द्वारा दी गई है, या जिसके बारे में वह सद्भावनापूर्वक मानता है कि उसे कानून द्वारा दी गई है।”

यह प्रावधान पूर्व में भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 77 के समान था और न्यायिक स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से ही इसे BNS में भी यथावत रखा गया है।


1. धारा 15 की पृष्ठभूमि और आवश्यकता

न्यायालयों में प्रतिदिन अनेक प्रकार के आदेश पारित होते हैं—

  • गिरफ्तारी के वारंट
  • जमानत अस्वीकृति
  • संपत्ति की कुर्की
  • दंडादेश (Sentence)

इनमें से कई आदेश ऐसे होते हैं जिनसे किसी पक्ष को गंभीर असुविधा या हानि हो सकती है। यदि प्रत्येक असंतुष्ट व्यक्ति न्यायाधीश के विरुद्ध आपराधिक मुकदमा दर्ज कराने लगे, तो न्यायिक प्रक्रिया बाधित हो जाएगी।

इसलिए विधि-निर्माता ने यह सुनिश्चित किया कि न्यायाधीश अपने कर्तव्यों का निर्वहन निर्भीकता और निष्पक्षता से कर सकें।


2. धारा 15 के आवश्यक तत्व

धारा 15 को लागू करने के लिए निम्न शर्तें आवश्यक हैं—

(1) व्यक्ति न्यायाधीश हो

यह संरक्षण केवल उसी व्यक्ति को मिलेगा जो विधि द्वारा न्यायाधीश के रूप में नियुक्त है और न्यायिक अधिकार का प्रयोग कर रहा है।

(2) कार्य न्यायिक प्रकृति का हो

कृत्य न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत किया गया हो—जैसे आदेश पारित करना, सजा देना, जमानत सुनवाई आदि।

(3) विधि द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग

कार्य उस अधिकार के अंतर्गत होना चाहिए जो कानून ने प्रदान किया है।

(4) सद्भावना (Good Faith)

यदि न्यायाधीश को वास्तव में वह शक्ति प्राप्त न भी हो, लेकिन उसने ईमानदारी से यह विश्वास किया कि उसे वह शक्ति प्राप्त है, तो भी उसे संरक्षण मिलेगा।


3. “न्यायिक कार्य” और “प्रशासनिक कार्य” में अंतर

धारा 15 केवल न्यायिक कार्यों पर लागू होती है, न कि प्रशासनिक या निजी कार्यों पर।

न्यायिक कार्य प्रशासनिक/निजी कार्य
निर्णय देना कार्यालय का प्रबंधन
जमानत आदेश नियुक्ति संबंधी आदेश
वारंट जारी करना निजी लेन-देन

यदि कोई न्यायाधीश निजी विवाद में हिंसा करता है, तो वह धारा 15 का लाभ नहीं ले सकता।


4. सद्भावना की कसौटी

सद्भावना का अर्थ केवल ईमानदारी नहीं, बल्कि उचित सावधानी (Due Care and Attention) भी है।

यदि न्यायाधीश ने उपलब्ध अभिलेखों, तथ्यों और कानून का उचित परीक्षण कर निर्णय दिया है, तो भले ही वह निर्णय बाद में गलत सिद्ध हो जाए, वह अपराध नहीं माना जाएगा।

परंतु यदि निर्णय दुर्भावना (Malafide), भ्रष्टाचार या निजी शत्रुता के आधार पर दिया गया है, तो धारा 15 का संरक्षण समाप्त हो जाता है।


5. उदाहरणों के माध्यम से समझना

उदाहरण 1:

एक सत्र न्यायाधीश किसी अभियुक्त को दोषी ठहराकर 10 वर्ष की सजा सुनाता है। बाद में उच्च न्यायालय साक्ष्यों की कमी के आधार पर उसे बरी कर देता है।
➡️ सत्र न्यायाधीश पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलेगा।

उदाहरण 2:

मजिस्ट्रेट अपने अधिकार क्षेत्र के संबंध में भ्रमित होकर एक आदेश पारित करता है, जबकि वास्तविक अधिकार किसी अन्य न्यायालय के पास था।
➡️ यदि भ्रम सद्भावना में था, तो संरक्षण मिलेगा।

उदाहरण 3 (संरक्षण नहीं):

यदि न्यायाधीश रिश्वत लेकर जानबूझकर निर्दोष व्यक्ति को दोषी ठहराता है।
➡️ यह अपराध होगा और धारा 15 लागू नहीं होगी।


6. न्यायिक स्वतंत्रता और संवैधानिक दर्शन

भारत का संविधान न्यायपालिका को स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्था के रूप में स्थापित करता है।

यदि न्यायाधीशों को हर निर्णय के लिए व्यक्तिगत आपराधिक दायित्व का भय रहेगा, तो वे निष्पक्षता से निर्णय नहीं दे पाएंगे।

धारा 15 इस संवैधानिक दर्शन को व्यवहारिक रूप प्रदान करती है।


7. सीमाएँ और उत्तरदायित्व

धारा 15 न्यायाधीश को पूर्ण छूट (Absolute Immunity) नहीं देती।

  • यह केवल आपराधिक उत्तरदायित्व से संरक्षण देती है।
  • अनुशासनात्मक कार्रवाई संभव है।
  • भ्रष्टाचार के मामलों में अन्य कानून लागू हो सकते हैं।
  • संविधान के तहत महाभियोग की प्रक्रिया भी उपलब्ध है।

8. धारा 15 का व्यावहारिक महत्व

✔ न्यायिक निर्णयों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है।
✔ अनावश्यक मुकदमों से न्यायपालिका को बचाती है।
✔ न्यायिक प्रक्रिया में स्थिरता लाती है।
✔ न्यायाधीशों को निर्भीकता से निर्णय लेने में सक्षम बनाती है।


9. आलोचनात्मक दृष्टिकोण

कुछ आलोचक यह तर्क देते हैं कि इस प्रकार का संरक्षण कभी-कभी न्यायिक दुरुपयोग को बढ़ावा दे सकता है।

परंतु न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि—

  • संरक्षण केवल सद्भावना में किए गए कार्यों तक सीमित है।
  • दुर्भावनापूर्ण कार्यों पर यह लागू नहीं होता।

इस प्रकार यह प्रावधान स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करता है।


10. निष्कर्ष

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 15 न्यायिक स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण आधार है। यह सुनिश्चित करती है कि न्यायाधीश कानून द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते समय भयमुक्त रहें, बशर्ते उनका आचरण सद्भावनापूर्ण हो।

संक्षेप में—

  • विधि द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग → अपराध नहीं।
  • सद्भावना में शक्ति होने का विश्वास → अपराध नहीं।
  • दुर्भावना, भ्रष्टाचार या जानबूझकर किया गया अन्याय → संरक्षण नहीं।

अतः धारा 15 भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में न्यायिक गरिमा, स्वतंत्रता और विधि के शासन की रक्षा करने वाला एक सशक्त प्रावधान है।