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न्याय की चौखट पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता: सुप्रीम कोर्ट की चिंता, वकालत की नैतिकता और तकनीक की सीमाएँ

न्याय की चौखट पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता: सुप्रीम कोर्ट की चिंता, वकालत की नैतिकता और तकनीक की सीमाएँ

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) ने विधि क्षेत्र में जिस तेजी से प्रवेश किया है, वह अभूतपूर्व है। आज शोध, केस-लॉ की खोज, ड्राफ्टिंग, तर्कों की संरचना और यहाँ तक कि संभावित निर्णयों के विश्लेषण तक में एआई का उपयोग किया जा रहा है। परंतु हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत ने इस तकनीक के अनियंत्रित और असावधान उपयोग पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।

Supreme Court of India में एक सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि कुछ अधिवक्ताओं ने एआई की सहायता से याचिकाएँ तैयार कीं और उनमें ऐसे न्यायिक निर्णयों का उल्लेख कर दिया जो वास्तव में कभी अस्तित्व में ही नहीं थे। यह केवल एक तकनीकी भूल नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाने वाली स्थिति थी।


पीठ की टिप्पणी और न्यायिक असंतोष

यह मुद्दा भारत के चीफ जस्टिस Justice Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष उठा। इस बेंच में Justice Joymalya Bagchi और Justice B. V. Nagarathna भी शामिल थीं।

रिपोर्टों के अनुसार, सीजेआई ने स्पष्ट रूप से कहा कि अदालत इस बात से परेशान है कि कुछ वकील एआई के माध्यम से याचिकाएँ ड्राफ्ट कर रहे हैं और बिना सत्यापन के उन्हें अदालत में प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होंने इसे “बहुत ही गलत” बताया।

जस्टिस नागरत्ना ने एक उदाहरण देते हुए उल्लेख किया कि उन्हें हाल ही में “Mercy vs Mankind” नामक एक कथित निर्णय का संदर्भ मिला, जो वास्तव में कभी दिया ही नहीं गया था। यह उदाहरण इस बात का प्रमाण था कि एआई कभी-कभी “हैलुसिनेशन” के कारण काल्पनिक केस-लॉ भी उत्पन्न कर देता है।


एआई हैलुसिनेशन: तकनीक की एक गंभीर सीमा

एआई आधारित टूल्स विशाल डेटा पर प्रशिक्षित होते हैं, लेकिन वे मानव की तरह सत्यापन या नैतिक विवेक नहीं रखते। जब उन्हें किसी विषय पर उत्तर तैयार करने के लिए कहा जाता है, तो वे संभावित रूप से प्रासंगिक जानकारी “निर्मित” कर सकते हैं, भले ही वह तथ्यात्मक रूप से अस्तित्व में न हो। इसे तकनीकी भाषा में “हैलुसिनेशन” कहा जाता है।

विधिक क्षेत्र में यह समस्या अत्यंत गंभीर है क्योंकि—

  1. न्यायालय में प्रत्येक उद्धरण और संदर्भ की सत्यता आवश्यक है।
  2. फर्जी निर्णय का हवाला न्यायालय को भ्रमित कर सकता है।
  3. इससे न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता प्रभावित हो सकती है।

एआई के इस व्यवहार से यह स्पष्ट है कि तकनीक सहायक हो सकती है, पर अंतिम जिम्मेदारी मनुष्य की ही रहती है।


वकालत का धर्म और पेशेवर नैतिकता

अधिवक्ता का दायित्व केवल अपने मुवक्किल का पक्ष रखना नहीं है, बल्कि न्यायालय के प्रति भी उसकी जिम्मेदारी होती है। वकील को “Officer of the Court” माना जाता है। इसका अर्थ है कि वह न्यायिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अंग है और उस पर सत्यनिष्ठा, ईमानदारी और निष्पक्षता का दायित्व है।

यदि कोई अधिवक्ता बिना सत्यापन के एआई द्वारा तैयार सामग्री को अदालत में प्रस्तुत करता है और उसमें फर्जी संदर्भ पाए जाते हैं, तो यह पेशेवर कदाचार की श्रेणी में आ सकता है।

तकनीक का उपयोग तभी स्वीकार्य है जब वह—

  • शोध को तेज करे,
  • ड्राफ्ट को बेहतर बनाए,
  • तथ्यों की प्रस्तुति को व्यवस्थित करे।

लेकिन यदि वह बिना जांच के अदालत में रख दी जाए, तो यह लापरवाही है।


अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: वैश्विक न्यायालयों में भी चिंता

यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका, कनाडा और अन्य देशों में भी ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ वकीलों ने एआई टूल्स का उपयोग करते हुए फर्जी केस-लॉ का हवाला दे दिया। कुछ मामलों में अदालतों ने अधिवक्ताओं पर जुर्माना भी लगाया।

इससे स्पष्ट है कि वैश्विक स्तर पर न्यायपालिका एआई के उपयोग को लेकर सतर्क है। तकनीक को पूर्णतः अस्वीकार नहीं किया जा रहा, परंतु उसके जिम्मेदार उपयोग पर जोर दिया जा रहा है।


न्यायपालिका और तकनीक: टकराव नहीं, संतुलन की आवश्यकता

यह समझना आवश्यक है कि न्यायपालिका तकनीक की विरोधी नहीं है। ई-कोर्ट्स, वर्चुअल हियरिंग, डिजिटल फाइलिंग और ऑनलाइन आदेश जैसी व्यवस्थाएँ तकनीकी प्रगति का ही परिणाम हैं।

परंतु न्याय का मूल आधार सत्य और विश्वसनीयता है। यदि एआई का उपयोग इन मूल्यों को कमजोर करता है, तो न्यायपालिका का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।

संभव है कि भविष्य में—

  • एआई-जनित ड्राफ्ट पर अनिवार्य सत्यापन की शर्त लगे,
  • बार काउंसिल दिशानिर्देश जारी करे,
  • न्यायालय स्पष्ट चेतावनी दे कि फर्जी संदर्भ पर कड़ी कार्रवाई होगी।

तकनीक बनाम मानवीय विवेक

एआई भाषा की नकल कर सकता है, तर्कों को व्यवस्थित कर सकता है, और केस-लॉ खोज सकता है। लेकिन उसमें नैतिकता, विवेक और उत्तरदायित्व की भावना नहीं होती।

मानवीय वकील—

  • तथ्य की सत्यता परख सकता है,
  • संदर्भ की प्रासंगिकता समझ सकता है,
  • न्यायालय की संवेदनशीलता का आकलन कर सकता है।

यही कारण है कि तकनीक सहायक हो सकती है, पर उसका विकल्प नहीं।


भविष्य की चुनौतियाँ और समाधान

आने वाले समय में एआई और अधिक उन्नत होगा। संभव है कि वह ड्राफ्टिंग में और अधिक सटीक हो जाए। लेकिन इसके साथ प्रशिक्षण और जागरूकता की आवश्यकता भी बढ़ेगी।

विधि महाविद्यालयों और बार संस्थाओं को—

  • एआई के उपयोग पर प्रशिक्षण देना चाहिए,
  • उसके जोखिमों से अवगत कराना चाहिए,
  • सत्यापन की संस्कृति विकसित करनी चाहिए।

यदि तकनीक का उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से किया जाए, तो वह न्यायिक प्रक्रिया को सशक्त बना सकती है। लेकिन यदि उसका दुरुपयोग हुआ, तो वह न्याय के लिए खतरा बन सकती है।


निष्कर्ष: न्याय की गरिमा सर्वोपरि

सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी केवल एक घटना पर प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक व्यापक संदेश है। यह संदेश है कि न्यायालय तकनीक से नहीं, बल्कि उसकी गैर-जिम्मेदाराना उपयोग से चिंतित है।

एआई एक उपकरण है—न तो पूर्ण सत्य का स्रोत, न ही अंतिम प्राधिकारी। न्यायालय में प्रस्तुत प्रत्येक शब्द की जिम्मेदारी अधिवक्ता की है।

अंततः, न्याय की गरिमा और विश्वसनीयता को बनाए रखना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। तकनीक का स्वागत किया जा सकता है, परंतु नैतिकता और सत्यनिष्ठा के साथ। यही संतुलन न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखेगा और यही सुप्रीम कोर्ट की चिंता का मूल संदेश है।