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निकाह की परिभाषा तथा मुस्लिम विधि के अंतर्गत उसकी प्रकृति

निकाह की परिभाषा तथा मुस्लिम विधि के अंतर्गत उसकी प्रकृति


1. भूमिका (Introduction)

विवाह मानव समाज की एक मूलभूत संस्था है, जिसके माध्यम से स्त्री और पुरुष के बीच वैध, सामाजिक एवं विधिक संबंध स्थापित होता है। प्रत्येक धर्म और विधिक प्रणाली में विवाह की अवधारणा तथा प्रकृति भिन्न-भिन्न रूपों में पाई जाती है। कहीं विवाह को धार्मिक संस्कार माना गया है, तो कहीं उसे एक सामाजिक अनुबंध के रूप में स्वीकार किया गया है।

मुस्लिम विधि (Muslim Law) में विवाह को निकाह (Nikah) कहा जाता है। निकाह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि एक ऐसा विधिक समझौता है, जिसके द्वारा पति और पत्नी के बीच अधिकारों और कर्तव्यों का निर्धारण किया जाता है। मुस्लिम विधि की यह विशेषता उसे अन्य व्यक्तिगत विधियों से अलग पहचान देती है।

इस प्रश्न का उद्देश्य यह समझना है कि—

  1. निकाह की परिभाषा क्या है?
  2. मुस्लिम विधि में निकाह की प्रकृति कैसी है?
  3. क्या निकाह केवल धार्मिक कार्य है या एक नागरिक अनुबंध?

इन सभी पहलुओं का विस्तार से अध्ययन करना आवश्यक है।


2. निकाह की परिभाषा (Definition of Nikah)

(क) शाब्दिक अर्थ

“निकाह” अरबी भाषा का शब्द है, जिसका सामान्य अर्थ है—
संबंध स्थापित करना या जोड़ना।

(ख) विधिक अर्थ

मुस्लिम विद्वानों के अनुसार—

निकाह एक ऐसा अनुबंध है, जिसका उद्देश्य स्त्री और पुरुष के बीच वैध यौन संबंध स्थापित करना तथा पारस्परिक अधिकारों और दायित्वों को निर्धारित करना है।

कुछ विद्वानों ने निकाह को इस प्रकार परिभाषित किया है—

“निकाह वह समझौता है, जिसके द्वारा पति को पत्नी के साथ वैध रूप से सहवास का अधिकार प्राप्त होता है और जिसके परिणामस्वरूप पति पर पत्नी के भरण-पोषण तथा मेहर का दायित्व उत्पन्न होता है।”

इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि निकाह का स्वरूप मुख्यतः विधिक और व्यावहारिक है।


3. निकाह के उद्देश्य (Objects of Nikah)

निकाह के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—

  1. स्त्री और पुरुष के बीच वैध संबंध स्थापित करना
  2. परिवार की स्थापना
  3. संतानोत्पत्ति और वंश की निरंतरता
  4. सामाजिक नैतिकता बनाए रखना
  5. पति-पत्नी के अधिकारों और कर्तव्यों को निर्धारित करना

इससे स्पष्ट है कि निकाह केवल धार्मिक कृत्य नहीं, बल्कि सामाजिक और विधिक व्यवस्था का आधार भी है।


4. निकाह की प्रकृति (Nature of Nikah under Muslim Law)

मुस्लिम विधि के अंतर्गत निकाह की प्रकृति को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि उसमें अनुबंध (Contract) के कौन-कौन से तत्व पाए जाते हैं।


(क) निकाह एक नागरिक अनुबंध है (Nikah as a Civil Contract)

मुस्लिम विधि के अनुसार निकाह को एक नागरिक अनुबंध (Civil Contract) माना गया है। इसके समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं—

(1) प्रस्ताव और स्वीकृति (Offer and Acceptance)

निकाह तभी वैध होता है जब—

  • एक पक्ष विवाह का प्रस्ताव करे, और
  • दूसरा पक्ष उसी बैठक में उसे स्वीकार करे।

यह किसी भी वैध अनुबंध की मूलभूत शर्त है।

(2) पक्षकारों की क्षमता (Capacity of Parties)

निकाह के लिए आवश्यक है कि—

  • पक्षकार बालिग हों,
  • मानसिक रूप से स्वस्थ हों,
  • स्वतंत्र सहमति दें।

यदि सहमति बल, धोखे या दबाव से प्राप्त की गई हो, तो निकाह वैध नहीं माना जाएगा।

(3) मेहर (Dower) का प्रावधान

मेहर वह धन या संपत्ति है, जिसे पति विवाह के समय पत्नी को देने का वचन देता है।
मेहर को निकाह का अनिवार्य तत्व माना जाता है और इसे अनुबंध का प्रतिफल (Consideration) कहा जा सकता है।

(4) शर्तें जोड़ने की स्वतंत्रता

मुस्लिम विधि में पक्षकार निकाह के समय कुछ शर्तें जोड़ सकते हैं, जैसे—

  • पति दूसरी शादी नहीं करेगा,
  • पत्नी को तलाक का अधिकार होगा,
  • पति पत्नी के साथ किसी विशेष स्थान पर रहेगा।

यह अनुबंध की स्वतंत्रता को दर्शाता है।


(ख) निकाह केवल अनुबंध नहीं, बल्कि धार्मिक महत्व भी रखता है

यद्यपि निकाह को नागरिक अनुबंध माना गया है, फिर भी इसका धार्मिक महत्व भी है।

इस्लाम विवाह को एक पवित्र कार्य मानता है और इसे सामाजिक नैतिकता का आधार बताता है।
अतः निकाह में धार्मिक और विधिक तत्वों का समन्वय पाया जाता है।


(ग) निकाह संस्कार नहीं है (Nikah is not a Sacrament)

संस्कार का अर्थ होता है ऐसा धार्मिक बंधन, जिसे तोड़ना कठिन या असंभव हो।
मुस्लिम विधि में निकाह को विभिन्न तरीकों से समाप्त किया जा सकता है—

  • तलाक द्वारा
  • खुला
  • मुबारत
  • न्यायालय के आदेश से

इससे स्पष्ट है कि निकाह संस्कार नहीं, बल्कि एक ऐसा अनुबंध है, जिसे समाप्त किया जा सकता है।


(घ) निकाह स्थायी तथा अस्थायी दोनों हो सकता है

सुन्नी विधि में निकाह सामान्यतः स्थायी होता है।
शिया विधि में मुतआ विवाह (अस्थायी विवाह) की अवधारणा भी है, जिसमें विवाह एक निश्चित अवधि के लिए किया जाता है।

यदि विवाह संस्कार होता, तो अस्थायी विवाह की अवधारणा संभव नहीं होती।


(ङ) निकाह से अधिकार और दायित्व उत्पन्न होते हैं

निकाह के परिणामस्वरूप—

पति के अधिकार और दायित्व

  • पत्नी का भरण-पोषण
  • मेहर का भुगतान
  • पत्नी के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार

पत्नी के अधिकार और दायित्व

  • पति के साथ सहवास
  • परिवार की देखभाल
  • वैध आदेशों का पालन

अधिकारों और दायित्वों का यह निर्धारण अनुबंधात्मक प्रकृति को दर्शाता है।


5. निकाह और अन्य अनुबंधों में अंतर

यद्यपि निकाह को अनुबंध कहा जाता है, फिर भी यह साधारण अनुबंध से कुछ मामलों में भिन्न है—

  1. निकाह का उद्देश्य नैतिक और सामाजिक भी है।
  2. इसमें व्यक्तिगत संबंधों की स्थापना होती है।
  3. कुछ नियम सार्वजनिक नीति से जुड़े होते हैं।

6. निकाह की वैधता की आवश्यक शर्तें

  1. प्रस्ताव और स्वीकृति
  2. स्वतंत्र सहमति
  3. पक्षकारों की क्षमता
  4. गवाहों की उपस्थिति (सुन्नी विधि में)
  5. मेहर का निर्धारण

7. निकाह की प्रकृति का व्यावहारिक महत्व

  1. विवाह संबंधी विवादों का समाधान विधिक रूप से संभव
  2. महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा
  3. विवाह को यथार्थवादी दृष्टिकोण

8. आलोचनात्मक दृष्टिकोण

कुछ विद्वान मानते हैं कि निकाह को केवल अनुबंध कहना उसके पवित्र स्वरूप को कम करता है।
अन्य विद्वान मानते हैं कि यह दृष्टिकोण विवाह को अधिक न्यायसंगत और व्यावहारिक बनाता है।


9. आधुनिक संदर्भ में निकाह की प्रकृति

आज के समय में जब व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों पर बल दिया जा रहा है, निकाह की अनुबंधात्मक प्रकृति अत्यंत प्रासंगिक है।
यह विवाह को अधिकारों और दायित्वों के संतुलन के रूप में प्रस्तुत करता है।


10. निष्कर्ष (Conclusion)

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि—

  • निकाह मुस्लिम विधि के अनुसार एक नागरिक अनुबंध है।
  • इसमें अनुबंध के सभी आवश्यक तत्व पाए जाते हैं।
  • साथ ही, इसका धार्मिक महत्व भी स्वीकार किया गया है।

अतः कहा जा सकता है कि निकाह की प्रकृति द्वैतात्मक (Dual Nature) है—
यह एक ओर नागरिक अनुबंध है और दूसरी ओर एक पवित्र सामाजिक संस्था।