मुस्लिम विधि के स्रोत के रूप में इज्मा और क़ियास : एक विस्तृत अध्ययन
1. भूमिका (Introduction)
मुस्लिम विधि (Muslim Law) केवल धार्मिक आस्था पर आधारित नियमों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक सुव्यवस्थित विधिक प्रणाली है, जो मुसलमानों के व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन को नियंत्रित करती है। इस विधि के स्रोतों में कुछ ऐसे स्रोत हैं जो प्रत्यक्ष रूप से धार्मिक ग्रंथों से उत्पन्न होते हैं, तथा कुछ ऐसे स्रोत हैं जो तर्क, व्याख्या और विद्वानों की सहमति पर आधारित होते हैं।
क़ुरआन और सुन्नत के बाद मुस्लिम विधि के जिन दो महत्वपूर्ण स्रोतों का स्थान है, वे हैं—
- इज्मा (Ijma)
- क़ियास (Qiyas)
इन दोनों स्रोतों ने मुस्लिम विधि को लचीलापन, व्यावहारिकता और समयानुकूलता प्रदान की है। समाज के विकास के साथ उत्पन्न होने वाली नई समस्याओं का समाधान इन्हीं स्रोतों के माध्यम से संभव हुआ है।
2. इज्मा (Ijma) : अर्थ एवं अवधारणा
(क) इज्मा का शाब्दिक अर्थ
“इज्मा” अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है—
सहमति, सर्वसम्मति या एकमत होना।
(ख) विधिक अर्थ
विधिक दृष्टि से इज्मा से आशय है—
किसी विशेष समय में इस्लामी विधि के विद्वानों द्वारा किसी विधिक प्रश्न पर व्यक्त की गई सर्वसम्मत राय।
दूसरे शब्दों में, जब किसी विषय पर क़ुरआन और सुन्नत में स्पष्ट निर्देश न हों, तब विद्वानों की सामूहिक सहमति से जो नियम विकसित किया जाता है, उसे इज्मा कहा जाता है।
3. इज्मा का महत्व (Importance of Ijma)
इज्मा को मुस्लिम विधि का तीसरा महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। इसका महत्व निम्नलिखित कारणों से है—
- यह विधि को स्थिरता और निश्चितता प्रदान करता है।
- यह नए सामाजिक एवं विधिक प्रश्नों का समाधान करता है।
- यह विधि को समयानुकूल और व्यावहारिक बनाता है।
- यह विद्वानों के अनुभव और ज्ञान का सामूहिक परिणाम होता है।
इज्मा के माध्यम से विकसित नियमों को मुसलमानों के लिए बाध्यकारी माना जाता है।
4. इज्मा के प्रकार (Kinds of Ijma)
इज्मा को सामान्यतः दो श्रेणियों में विभाजित किया जाता है—
(क) सहाबा का इज्मा (Ijma of Companions)
यह पैग़म्बर मोहम्मद साहब के साथ रहने वाले सहाबा (Companions) की सर्वसम्मत राय को दर्शाता है।
इस प्रकार का इज्मा सबसे अधिक प्रामाणिक माना जाता है।
महत्व
- यह पैग़म्बर की शिक्षाओं के अत्यंत निकट होता है।
- इसे लगभग सुन्नत के समान महत्व दिया जाता है।
(ख) विद्वानों का इज्मा (Ijma of Jurists)
यह बाद के समय के इस्लामी विद्वानों द्वारा किसी प्रश्न पर व्यक्त सर्वसम्मति है।
महत्व
- समाज की बदलती परिस्थितियों के अनुसार नियम विकसित करता है।
- विधि को गतिशील बनाए रखता है।
5. इज्मा की वैधता की शर्तें
किसी राय को इज्मा के रूप में स्वीकार करने के लिए निम्न शर्तें आवश्यक हैं—
- सभी विद्वानों की सहमति हो।
- सहमति किसी विधिक प्रश्न पर हो।
- इज्मा क़ुरआन और सुन्नत के विरुद्ध न हो।
- सहमति स्पष्ट और निश्चित हो।
यदि इनमें से कोई शर्त पूरी न हो, तो वह राय इज्मा नहीं मानी जाएगी।
6. इज्मा की भूमिका और सीमाएँ
(क) भूमिका
- नई समस्याओं का समाधान
- विधि में लचीलापन
- सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप नियम
(ख) सीमाएँ
- इज्मा क़ुरआन या सुन्नत के विरुद्ध नहीं हो सकता।
- सभी विद्वानों की सहमति प्राप्त करना कठिन होता है।
7. क़ियास (Qiyas) : अर्थ एवं अवधारणा
(क) क़ियास का शाब्दिक अर्थ
“क़ियास” का अर्थ है—
माप, तुलना या समानता।
(ख) विधिक अर्थ
क़ियास का अर्थ है—
क़ुरआन या सुन्नत में दिए गए किसी नियम को समान परिस्थितियों वाले नए मामले पर तर्कसंगत समानता के आधार पर लागू करना।
अर्थात्, यदि किसी मामले में प्रत्यक्ष नियम उपलब्ध नहीं है, तो समान प्रकृति वाले किसी अन्य मामले के नियम को उस पर लागू किया जाता है।
8. क़ियास का उद्देश्य
- विधि में रिक्त स्थानों को भरना
- नई परिस्थितियों के लिए समाधान देना
- विधि को समयानुकूल बनाना
9. क़ियास के तत्व (Elements of Qiyas)
क़ियास के चार मुख्य तत्व होते हैं—
- असल (Original Case) – वह मामला जिस पर स्पष्ट नियम मौजूद हो
- फ़रअ (New Case) – वह नया मामला जिस पर नियम लागू करना है
- हुक्म (Rule) – मूल मामले का नियम
- इल्लत (Reason) – वह कारण जिसके आधार पर नियम लागू किया जाता है
यदि इन चारों तत्वों का सही संबंध स्थापित हो जाए, तो क़ियास मान्य होता है।
10. क़ियास का उदाहरण
यदि क़ुरआन में शराब को नशीला होने के कारण निषिद्ध किया गया है, तो उसी तर्क के आधार पर अन्य नशीले पदार्थों को भी निषिद्ध माना जाएगा।
यह निषेध क़ियास के सिद्धांत पर आधारित होगा।
11. क़ियास का महत्व (Importance of Qiyas)
- विधि को लचीला बनाता है
- नई समस्याओं का समाधान करता है
- तर्क और न्याय पर आधारित है
- समाज की बदलती आवश्यकताओं को ध्यान में रखता है
12. क़ियास की सीमाएँ
- यह क़ुरआन और सुन्नत के विरुद्ध नहीं हो सकता।
- यह केवल समानता पर आधारित होना चाहिए, कल्पना पर नहीं।
- सभी विद्वान क़ियास को समान रूप से स्वीकार नहीं करते।
13. इज्मा और क़ियास में अंतर
| आधार | इज्मा | क़ियास |
|---|---|---|
| प्रकृति | सर्वसम्मति | तर्कसंगत समानता |
| आधार | विद्वानों की राय | तर्क एवं तुलना |
| उद्देश्य | निश्चित नियम बनाना | नया नियम निकालना |
| महत्व | अधिक स्थिर | अधिक लचीला |
14. आधुनिक युग में इज्मा और क़ियास का महत्व
आज के समय में समाज अत्यंत जटिल हो गया है। तकनीक, चिकित्सा, व्यापार और पारिवारिक संरचना में बड़े परिवर्तन आए हैं। ऐसे में—
- इज्मा सामूहिक बुद्धिमत्ता से समाधान देता है।
- क़ियास तर्क के माध्यम से नए नियम विकसित करता है।
दोनों मिलकर मुस्लिम विधि को समय-संगत बनाते हैं।
15. आलोचनात्मक दृष्टिकोण
कुछ विद्वानों का मत है कि इज्मा और क़ियास का उपयोग सीमित होना चाहिए, ताकि मूल धार्मिक सिद्धांतों से विचलन न हो।
अन्य विद्वान मानते हैं कि इन्हीं स्रोतों के माध्यम से मुस्लिम विधि का विकास संभव है।
- 16. निष्कर्ष (Conclusion)
इज्मा और क़ियास मुस्लिम विधि के ऐसे स्रोत हैं, जो इस विधि को स्थिरता और गतिशीलता दोनों प्रदान करते हैं।
इज्मा विद्वानों की सर्वसम्मति के माध्यम से निश्चितता लाता है, जबकि क़ियास तर्कसंगत समानता के आधार पर नए समाधान प्रस्तुत करता है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि यदि क़ुरआन और सुन्नत मुस्लिम विधि की आत्मा हैं, तो इज्मा और क़ियास उसकी बौद्धिक शक्ति हैं, जो इस विधि को हर युग में प्रासंगिक बनाए रखते हैं।