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मुसलमान कौन है? तथा किन विषयों में मुस्लिम विधि (Muslim Law) किसी मुसलमान पर लागू होती है

मुसलमान कौन है? तथा किन विषयों में मुस्लिम विधि (Muslim Law) किसी मुसलमान पर लागू होती है

1. भूमिका (Introduction)

भारत एक बहुधार्मिक एवं बहुसांस्कृतिक देश है, जहाँ विभिन्न समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत विधियाँ (Personal Laws) लागू होती हैं। मुसलमानों के लिए जो व्यक्तिगत विधि लागू होती है, उसे सामान्यतः मुस्लिम विधि (Muslim Law) या मोहम्मडन लॉ (Mohammedan Law) कहा जाता है। यह विधि मुख्यतः इस्लाम धर्म के सिद्धांतों पर आधारित है और जीवन के अनेक पहलुओं—जैसे विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, भरण-पोषण, वसीयत, उपहार आदि—को नियंत्रित करती है।

मुस्लिम विधि को लागू करने से पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि “मुसलमान कौन है?” तथा “किन मामलों में मुस्लिम विधि किसी मुसलमान पर लागू होती है?”। इन दोनों प्रश्नों का उत्तर केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें विधिक (Legal) दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण है।


2. मुसलमान कौन है? (Who is a Muslim?)

सामान्य अर्थ में, वह व्यक्ति जो इस्लाम धर्म में विश्वास करता है और उसकी शिक्षाओं का पालन करता है, मुसलमान कहलाता है। परंतु विधिक दृष्टि से, “मुसलमान” की परिभाषा कुछ अधिक व्यापक और व्यावहारिक है।

(क) धार्मिक दृष्टि से मुसलमान

इस्लाम धर्म के अनुसार, वह व्यक्ति मुसलमान है जो—

  1. एक ईश्वर (अल्लाह) की एकता में विश्वास करता हो,
  2. हज़रत मोहम्मद साहब को अंतिम पैग़म्बर मानता हो, तथा
  3. इस्लाम के मूल सिद्धांतों (Five Pillars of Islam) को स्वीकार करता हो।

इन शर्तों को स्वीकार करने वाला व्यक्ति धार्मिक रूप से मुसलमान माना जाता है।

(ख) जन्म से मुसलमान

यदि किसी व्यक्ति का जन्म ऐसे माता-पिता से हुआ है जो मुसलमान हैं, तो वह व्यक्ति जन्म से मुसलमान माना जाता है, चाहे उसने बाद में धार्मिक आचरण किया हो या नहीं।
विधिक रूप से, यह माना जाता है कि ऐसे व्यक्ति पर मुस्लिम विधि लागू होगी, जब तक वह यह सिद्ध न कर दे कि उसने इस्लाम धर्म त्याग दिया है।

(ग) धर्मांतरण द्वारा मुसलमान

यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेता है, तो वह धर्मांतरण (Conversion) के माध्यम से मुसलमान बन जाता है।
धर्मांतरण की वैधता के लिए सामान्यतः निम्न शर्तें मानी जाती हैं—

  1. धर्मांतरण स्वेच्छा से हुआ हो,
  2. किसी दबाव, धोखे या प्रलोभन से प्रेरित न हो,
  3. व्यक्ति ने इस्लाम के मूल सिद्धांतों को स्वीकार किया हो।

ऐसा व्यक्ति विधिक रूप से मुसलमान माना जाएगा और उस पर मुस्लिम विधि लागू होगी।

(घ) संदेह की स्थिति

यदि किसी व्यक्ति के धर्म को लेकर विवाद हो, तो न्यायालय उसके आचरण, सामाजिक जीवन, विवाह की प्रकृति, तथा धार्मिक व्यवहार को देखकर यह तय करता है कि वह मुसलमान है या नहीं।


3. मुस्लिम विधि का आधार (Sources of Muslim Law)

मुस्लिम विधि के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं—

  1. क़ुरआन
  2. सुन्नत (पैग़म्बर की परंपराएँ)
  3. इज्मा (विद्वानों की सर्वसम्मति)
  4. क़ियास (तर्कसंगत समानता)
  5. न्यायिक निर्णय एवं विधान (Legislation)

इन स्रोतों के आधार पर ही यह तय किया जाता है कि किसी मुसलमान पर किस प्रकार का नियम लागू होगा।


4. मुस्लिम विधि का सामान्य सिद्धांत

सामान्यतः यह कहा जा सकता है कि व्यक्तिगत मामलों (Personal Matters) में मुसलमानों पर मुस्लिम विधि लागू होती है, जबकि सार्वजनिक एवं आपराधिक मामलों में सामान्य भारतीय कानून लागू होते हैं।


5. किन मामलों में मुस्लिम विधि लागू होती है

(क) विवाह (Marriage / Nikah)

मुस्लिम विधि के अंतर्गत विवाह को एक नागरिक अनुबंध (Civil Contract) माना गया है।

मुस्लिम विधि विवाह से संबंधित निम्न पहलुओं को नियंत्रित करती है—

  1. विवाह की शर्तें
  2. मेहर (Dower)
  3. बहुविवाह (Polygamy)
  4. विवाह की वैधता एवं अवैधता
  5. विवाह विच्छेद के आधार

यदि दोनों पक्ष मुसलमान हैं, तो विवाह संबंधी सभी विवाद मुस्लिम विधि के अनुसार तय किए जाते हैं।


(ख) तलाक (Divorce)

मुस्लिम विधि में तलाक के कई प्रकार हैं—

  1. तलाक-ए-हसन
  2. तलाक-ए-अहसन
  3. तलाक-ए-बिद्दत (तीन तलाक)

तलाक की प्रक्रिया, उसकी वैधता तथा उसके परिणाम मुस्लिम विधि द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।


(ग) भरण-पोषण (Maintenance)

मुस्लिम विधि पति पर पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण का दायित्व निर्धारित करती है।
हालाँकि, कुछ मामलों में आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) या संबंधित अधिनियम भी लागू हो सकते हैं, परंतु मूल अधिकार मुस्लिम विधि से ही उत्पन्न होते हैं।


(घ) मेहर (Dower)

मेहर वह धन या संपत्ति है जो पति विवाह के समय पत्नी को देने का वचन देता है।
मेहर का प्रकार, भुगतान का समय और उसकी वसूली मुस्लिम विधि द्वारा नियंत्रित होती है।


(ङ) उत्तराधिकार (Inheritance)

मुस्लिम विधि उत्तराधिकार के मामलों में अत्यंत विस्तृत नियम प्रदान करती है।
इसमें—

  1. वारिसों की श्रेणियाँ
  2. उनका हिस्सा
  3. पुरुष और महिला वारिसों का अनुपात

सब कुछ मुस्लिम विधि के अनुसार तय होता है।


(च) वसीयत (Will)

मुस्लिम विधि के अनुसार—

  1. कोई मुसलमान अपनी संपत्ति का अधिकतम एक-तिहाई (1/3) भाग वसीयत कर सकता है।
  2. वारिस के पक्ष में वसीयत तभी वैध होगी जब अन्य वारिस सहमत हों।

(छ) उपहार (Gift / Hiba)

मुस्लिम विधि उपहार को एक स्वतंत्र लेन-देन के रूप में मान्यता देती है।
इसके लिए तीन आवश्यक तत्व हैं—

  1. घोषणा (Declaration)
  2. स्वीकृति (Acceptance)
  3. कब्ज़ा (Delivery of Possession)

(ज) संरक्षकता (Guardianship)

नाबालिग बच्चों की संरक्षकता, उनकी संपत्ति का प्रबंधन आदि मुस्लिम विधि के अनुसार तय होता है।


(झ) दत्तक ग्रहण (Adoption)

परंपरागत मुस्लिम विधि में दत्तक ग्रहण की अवधारणा नहीं है, हालाँकि देखरेख (Kafala) की अनुमति है।


6. किन मामलों में मुस्लिम विधि लागू नहीं होती

मुस्लिम विधि सामान्यतः निम्न मामलों में लागू नहीं होती—

  1. आपराधिक कानून
  2. संविदा कानून
  3. संपत्ति हस्तांतरण के सामान्य नियम
  4. कर कानून
  5. संविधानिक अधिकारों से संबंधित मामले

इन क्षेत्रों में सभी नागरिकों पर समान भारतीय कानून लागू होते हैं।


7. मुस्लिम विधि और भारतीय संविधान

भारतीय संविधान सभी नागरिकों को—

  1. धर्म की स्वतंत्रता
  2. समानता का अधिकार
  3. विधि के समक्ष समानता

प्रदान करता है।
मुस्लिम विधि व्यक्तिगत मामलों में लागू होते हुए भी संविधान के अधीन है।


8. निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में कहा जा सकता है कि—

  • मुसलमान वह व्यक्ति है जो जन्म से या धर्मांतरण द्वारा इस्लाम धर्म को मानता है।
  • मुस्लिम विधि मुख्यतः व्यक्तिगत एवं पारिवारिक मामलों में लागू होती है।
  • सार्वजनिक एवं सामान्य कानूनों में सभी नागरिकों पर समान विधि लागू होती है।

इस प्रकार, मुस्लिम विधि भारतीय विधिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो धार्मिक स्वतंत्रता और विधिक समानता के बीच संतुलन स्थापित करती है।