IndianLawNotes.com

“लोकप्रियता और कानून के बीच संतुलन”: साँप के ज़हर प्रकरण में एल्विश यादव पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और वन्यजीव संरक्षण कानून की कसौटी

“लोकप्रियता और कानून के बीच संतुलन”: साँप के ज़हर प्रकरण में एल्विश यादव पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और वन्यजीव संरक्षण कानून की कसौटी

भारत में सोशल मीडिया का प्रभाव अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है। यूट्यूब, इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल मंचों ने कई युवाओं को रातों-रात लोकप्रिय बना दिया है। इन्हीं में से एक नाम है Elvish Yadav, जो अपने वीडियो और सार्वजनिक उपस्थिति के कारण व्यापक चर्चा में रहते हैं। हाल ही में उनसे जुड़ा एक मामला न्यायिक विमर्श का केंद्र बन गया है—साँप के ज़हर (snake venom) से संबंधित कथित प्रकरण, जिसमें Supreme Court of India ने कहा है कि वह यह जांच करेगा कि क्या उनके विरुद्ध पर्याप्त सामग्री (adequate material) उपलब्ध है जिससे उन्हें वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत आरोपी ठहराया जा सके।

सुनवाई के दौरान न्यायालय की यह टिप्पणी विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है कि “यह बहुत बुरा संदेश देता है कि एक लोकप्रिय व्यक्ति ने प्रचार के लिए एक बेजुबान साँप का उपयोग किया।” यह टिप्पणी केवल एक व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज, मीडिया और कानून के त्रिकोणीय संबंधों पर गहरा प्रश्नचिन्ह भी लगाती है।


मामला क्या है?

प्रकरण का मूल आरोप यह है कि एक कार्यक्रम या वीडियो शूट के दौरान साँपों और कथित रूप से उनके ज़हर का उपयोग किया गया। जांच एजेंसियों ने इस संदर्भ में मामला दर्ज किया, और आरोप है कि यह कृत्य Wildlife Protection Act, 1972 के प्रावधानों का उल्लंघन हो सकता है।

यह अधिनियम भारत में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए बनाया गया एक व्यापक कानून है, जो न केवल शिकार पर प्रतिबंध लगाता है बल्कि संरक्षित प्रजातियों के व्यापार, परिवहन, कब्जे और दुरुपयोग को भी अपराध घोषित करता है।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह प्रश्न है कि उपलब्ध साक्ष्य क्या इतने पर्याप्त हैं कि एक लोकप्रिय यूट्यूबर को इस अधिनियम के तहत आरोपी बनाया जा सके।


सुप्रीम कोर्ट की प्राथमिक टिप्पणी का महत्व

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने जो टिप्पणी की, वह केवल तकनीकी कानूनी मुद्दा नहीं है। अदालत ने कहा कि यदि कोई लोकप्रिय व्यक्ति प्रचार के लिए “बेजुबान साँप” का उपयोग करता है, तो यह समाज में गलत संदेश देता है।

यह अवलोकन दो स्तरों पर महत्वपूर्ण है—

  1. नैतिक संदेश – सार्वजनिक जीवन में प्रभावशाली व्यक्तियों की जिम्मेदारी अधिक होती है।
  2. कानूनी जिम्मेदारी – यदि किसी कृत्य से वन्यजीव कानून का उल्लंघन होता है, तो लोकप्रियता ढाल नहीं बन सकती।

हालाँकि, न्यायालय ने अभी अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। उसने केवल यह कहा है कि वह उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करेगा—यानी मामला अभी विचाराधीन है और अंतिम निर्णय शेष है।


वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की संरचना

Wildlife Protection Act, 1972 के तहत कई प्रजातियों को अनुसूचियों (Schedules) में सूचीबद्ध किया गया है। जिन प्रजातियों को उच्चतम स्तर की सुरक्षा दी गई है, उनके साथ किसी भी प्रकार का अवैध व्यवहार गंभीर अपराध है।

यदि आरोपित कृत्य में संरक्षित प्रजाति के साँप का उपयोग या उसके ज़हर का अवैध संग्रहण/व्यापार शामिल है, तो यह दंडनीय हो सकता है। दंड में कारावास और जुर्माना दोनों शामिल हैं।

अधिनियम का उद्देश्य केवल पशुओं की रक्षा नहीं, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन की रक्षा करना है। साँप जैसे जीव, भले ही आम जनता के बीच भय का कारण हों, पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं—वे चूहों और अन्य हानिकारक जीवों की संख्या नियंत्रित करते हैं।


“लोकप्रियता” और “कानूनी जवाबदेही”

डिजिटल युग में “इन्फ्लुएंसर संस्कृति” (Influencer Culture) तेजी से विकसित हुई है। लाखों-करोड़ों फॉलोअर्स रखने वाले लोग समाज पर गहरा प्रभाव डालते हैं।

जब कोई लोकप्रिय व्यक्ति किसी विवाद में फँसता है, तो दो प्रकार की प्रतिक्रियाएँ सामने आती हैं—

  • समर्थक इसे साजिश बताते हैं।
  • आलोचक इसे कानून से ऊपर समझने की प्रवृत्ति का उदाहरण मानते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी यह संकेत देती है कि लोकप्रियता किसी को अतिरिक्त छूट नहीं देती। कानून के समक्ष सभी समान हैं—यह भारतीय संविधान का मूल सिद्धांत है।


साक्ष्य की कसौटी : “Adequate Material” का अर्थ

न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि वह यह जांच करेगा कि क्या आरोपों को समर्थन देने के लिए पर्याप्त सामग्री है। आपराधिक कानून में यह अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है।

केवल मीडिया रिपोर्ट या प्रारंभिक आरोप पर्याप्त नहीं होते। अभियोजन को यह दिखाना होगा कि—

  • संरक्षित प्रजाति का वास्तविक उपयोग हुआ,
  • उसका ज़हर अवैध रूप से प्राप्त या उपयोग किया गया,
  • और आरोपी की इसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संलिप्तता है।

यदि यह सामग्री प्रथम दृष्टया (prima facie) पर्याप्त पाई जाती है, तो मुकदमा आगे बढ़ सकता है। अन्यथा, आरोपी को राहत मिल सकती है।


पर्यावरणीय न्यायशास्त्र और न्यायालय की भूमिका

भारत में पर्यावरण संरक्षण को न्यायपालिका ने कई ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से सुदृढ़ किया है। पर्यावरणीय न्यायशास्त्र (Environmental Jurisprudence) के विकास में सुप्रीम कोर्ट की सक्रिय भूमिका रही है।

वन्यजीवों की सुरक्षा केवल कानून का प्रश्न नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व भी है। अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण की रक्षा का निर्देश देता है, और अनुच्छेद 51A(g) नागरिकों को भी यह कर्तव्य सौंपता है कि वे प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करें।

इस पृष्ठभूमि में न्यायालय की टिप्पणी को देखा जाए, तो यह केवल एक व्यक्ति के विरुद्ध टिप्पणी नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक जिम्मेदारी का स्मरण है।


सोशल मीडिया, स्टंट और कानूनी सीमाएँ

आजकल “वायरल” होने की दौड़ में कई बार लोग जोखिम भरे स्टंट करते हैं। वन्यजीवों के साथ फोटोशूट, वीडियो या प्रदर्शन करना आकर्षक लग सकता है, लेकिन यह कानून की सीमा को पार कर सकता है।

यदि किसी वीडियो में संरक्षित वन्यजीव का उपयोग किया जाता है, तो यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संभावित अपराध भी हो सकता है।

इस मामले ने यह बहस भी छेड़ दी है कि क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को ऐसे कंटेंट के प्रति अधिक सतर्क रहना चाहिए? क्या इन्फ्लुएंसर्स को विशेष दिशानिर्देशों का पालन करना चाहिए?


नैतिकता बनाम विधिक दोषसिद्धि

यह समझना आवश्यक है कि न्यायालय की प्रारंभिक टिप्पणी और अंतिम दोषसिद्धि (conviction) अलग-अलग बातें हैं।

कोर्ट ने केवल यह कहा है कि यदि लोकप्रिय व्यक्ति प्रचार के लिए बेजुबान जीव का उपयोग करता है, तो यह गलत संदेश देता है। परंतु यह तभी अपराध सिद्ध होगा जब कानून के तत्व (ingredients of offence) सिद्ध हों।

अतः अंतिम निर्णय तथ्यों और साक्ष्यों पर निर्भर करेगा, न कि केवल नैतिक आकलन पर।


व्यापक सामाजिक संदेश

इस प्रकरण ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है—
लोकप्रियता जिम्मेदारी के साथ आती है।

वन्यजीव केवल “प्रॉप” नहीं हैं जिन्हें मनोरंजन के लिए उपयोग किया जा सके। वे संवेदनशील प्राणी हैं जिनकी रक्षा कानून और नैतिकता दोनों की मांग है।

यदि अदालत पाती है कि पर्याप्त साक्ष्य हैं, तो यह मामला डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स के लिए एक मिसाल बन सकता है। यदि पर्याप्त सामग्री नहीं पाई जाती, तो यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि कानून केवल ठोस साक्ष्य पर ही चलता है।


निष्कर्ष

साँप के ज़हर प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का रुख यह दर्शाता है कि न्यायपालिका लोकप्रियता से प्रभावित हुए बिना विधिक कसौटियों पर ही निर्णय लेना चाहती है।

एक ओर, अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वन्यजीवों का उपयोग प्रचार के लिए करना गंभीर नैतिक प्रश्न खड़े करता है। दूसरी ओर, उसने यह भी कहा है कि वह उपलब्ध सामग्री की पर्याप्तता का परीक्षण करेगी—यानी विधिक प्रक्रिया का पूरा सम्मान किया जाएगा।

अंततः, यह मामला केवल एक यूट्यूबर या एक साँप तक सीमित नहीं है। यह प्रश्न है—क्या डिजिटल युग में प्रसिद्धि कानून से ऊपर हो सकती है?

भारतीय न्याय प्रणाली का उत्तर स्पष्ट है—नहीं। कानून की नजर में सभी समान हैं, और वन्यजीवों की सुरक्षा किसी भी प्रकार की लोकप्रियता से अधिक महत्वपूर्ण है।