“Creditor Can Recover from Either”: धारा 128 के तहत देनदारी का सिद्धांत और केरल हाईकोर्ट का दृष्टिकोण
भारतीय संविदा कानून में गारंटी (Guarantee) का सिद्धांत व्यापार और बैंकिंग व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। जब कोई व्यक्ति ऋण लेता है और उसके साथ कोई अन्य व्यक्ति उस ऋण के भुगतान की गारंटी देता है, तब कानून उस गारंटर (Surety) की जिम्मेदारी को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है। इसी संदर्भ में Indian Contract Act, 1872 की धारा 128 अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह धारा कहती है कि “गारंटर की देनदारी मुख्य देनदार (Principal Debtor) के समान सहविस्तृत (co-extensive) होती है, जब तक कि अनुबंध में अन्यथा न कहा गया हो।”
हाल ही में Kerala High Court ने एक निर्णय में इस सिद्धांत को दोहराते हुए स्पष्ट किया कि लेनदार (Creditor) चाहे तो सीधे गारंटर से भी वसूली कर सकता है; उसे पहले मुख्य देनदार के विरुद्ध कार्यवाही करना अनिवार्य नहीं है। न्यायालय ने यह रेखांकित किया कि कानून का उद्देश्य लेनदार के अधिकारों की रक्षा करना है, न कि उसे अनावश्यक प्रक्रिया में उलझाना।
धारा 128 का मूल सिद्धांत : “Co-Extensive Liability”
धारा 128 का आशय यह है कि गारंटर की जिम्मेदारी उतनी ही है जितनी मुख्य देनदार की। यदि मुख्य देनदार पर 10 लाख रुपये का ऋण बकाया है, तो गारंटर भी उतनी ही राशि के लिए उत्तरदायी होगा।
“Co-extensive” का अर्थ है—दायित्व की समान सीमा। इसका तात्पर्य यह नहीं कि गारंटर की जिम्मेदारी गौण (secondary) है; बल्कि वह समानांतर (parallel) है।
कानून यह नहीं कहता कि लेनदार पहले मुख्य देनदार से वसूली की सभी कोशिशें करे और असफल होने के बाद ही गारंटर के पास जाए। यदि अनुबंध में कोई विशेष शर्त न हो, तो लेनदार को यह स्वतंत्रता है कि वह दोनों में से किसी एक या दोनों के विरुद्ध कार्यवाही कर सकता है।
केरल हाईकोर्ट का दृष्टिकोण
केरल हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि गारंटी अनुबंध का मूल उद्देश्य ही यह है कि यदि मुख्य देनदार भुगतान में विफल हो जाए, तो लेनदार को अतिरिक्त सुरक्षा प्राप्त हो।
न्यायालय ने यह भी कहा कि गारंटर यह तर्क नहीं दे सकता कि पहले मुख्य देनदार की संपत्ति कुर्क की जाए या उससे वसूली का प्रयास किया जाए। धारा 128 का सीधा अर्थ है—लेनदार “either” से वसूली कर सकता है।
इस प्रकार न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि गारंटर की देनदारी किसी भी प्रकार से सीमित या स्थगित नहीं होती, जब तक अनुबंध में स्पष्ट रूप से ऐसा प्रावधान न हो।
सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व दृष्टि
इस सिद्धांत की पुष्टि पूर्व में भी उच्चतम न्यायालय द्वारा की जा चुकी है। उदाहरणस्वरूप, Supreme Court of India ने State Bank of India v. Indexport Registered में कहा था कि लेनदार को पहले मुख्य देनदार के विरुद्ध डिक्री निष्पादित करने की बाध्यता नहीं है; वह सीधे गारंटर के विरुद्ध भी कार्यवाही कर सकता है।
इसी प्रकार Bank of Bihar v. Damodar Prasad में भी न्यायालय ने कहा था कि गारंटर की देनदारी तत्काल और सहविस्तृत है। यह कोई “contingent” दायित्व नहीं है जो केवल मुख्य देनदार की असफलता के बाद सक्रिय हो।
केरल हाईकोर्ट का हालिया निर्णय इसी स्थापित विधिक सिद्धांत की पुनर्पुष्टि है।
गारंटर की स्थिति : जोखिम और अधिकार
अक्सर लोग मित्रता, पारिवारिक संबंध या व्यावसायिक भरोसे के कारण गारंटर बन जाते हैं, बिना यह समझे कि उनकी कानूनी जिम्मेदारी कितनी गंभीर है।
धारा 128 के तहत—
- गारंटर की जिम्मेदारी मुख्य देनदार के बराबर है।
- लेनदार सीधे गारंटर पर मुकदमा दायर कर सकता है।
- गारंटर की संपत्ति भी कुर्क की जा सकती है।
हालाँकि, गारंटर के पास कुछ अधिकार भी होते हैं—
- भुगतान करने के बाद वह मुख्य देनदार से प्रतिपूर्ति (indemnity) मांग सकता है।
- उसे सब्रोगेशन (Subrogation) का अधिकार प्राप्त होता है, अर्थात वह लेनदार के अधिकारों में प्रवेश कर सकता है।
ये अधिकार Indian Contract Act, 1872 की अन्य धाराओं (विशेषकर 140 और 145) में निहित हैं।
बैंकिंग और वसूली के मामलों में प्रभाव
बैंकिंग क्षेत्र में यह सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब कोई ऋण NPA (Non-Performing Asset) हो जाता है, तो बैंक अक्सर मुख्य देनदार और गारंटर दोनों के विरुद्ध कार्रवाई शुरू करते हैं।
Kerala High Court के इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि गारंटर यह दलील देकर राहत नहीं पा सकता कि बैंक ने पहले मुख्य देनदार से वसूली का प्रयास नहीं किया।
यह दृष्टिकोण ऋणदाताओं के लिए राहतकारी है, क्योंकि इससे वसूली प्रक्रिया अधिक प्रभावी और त्वरित हो जाती है।
संविदात्मक स्वतंत्रता का महत्व
धारा 128 यह भी कहती है कि यदि अनुबंध में अन्यथा प्रावधान हो, तो वही लागू होगा। अर्थात, यदि गारंटी अनुबंध में स्पष्ट रूप से लिखा है कि लेनदार पहले मुख्य देनदार से वसूली करेगा और उसके बाद ही गारंटर से, तो वही शर्त प्रभावी होगी।
इससे यह सिद्ध होता है कि भारतीय संविदा कानून “freedom of contract” के सिद्धांत को महत्व देता है।
न्यायिक तर्क का विश्लेषण
केरल हाईकोर्ट का निर्णय तीन प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है—
- कानूनी स्पष्टता (Statutory Clarity) – धारा 128 की भाषा स्पष्ट और अनambiguous है।
- वाणिज्यिक व्यवहार्यता (Commercial Practicality) – लेनदार को अनावश्यक विलंब में नहीं डाला जा सकता।
- न्यायिक पूर्वनिदर्शन (Judicial Precedent) – सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का पालन।
इस प्रकार यह निर्णय किसी नए सिद्धांत की स्थापना नहीं करता, बल्कि स्थापित विधि की पुनर्पुष्टि करता है।
सामाजिक और नैतिक आयाम
भारतीय समाज में अक्सर गारंटी “संबंधों” के आधार पर दी जाती है। लोग बिना विधिक परामर्श के गारंटर बन जाते हैं।
यह निर्णय एक चेतावनी भी है—
गारंटर बनना मात्र औपचारिकता नहीं, बल्कि पूर्ण वित्तीय जिम्मेदारी है।
व्यक्ति को चाहिए कि वह गारंटी अनुबंध की शर्तों को भली-भांति समझे और संभावित जोखिमों का मूल्यांकन करे।
निष्कर्ष
धारा 128 के तहत सिद्धांत स्पष्ट है—गारंटर की देनदारी मुख्य देनदार के समान है। Kerala High Court ने अपने हालिया निर्णय में इस स्थापित सिद्धांत को पुनः रेखांकित किया है कि लेनदार “either” से वसूली कर सकता है।
यह निर्णय वाणिज्यिक कानून में स्थिरता और स्पष्टता प्रदान करता है। साथ ही यह उन व्यक्तियों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश है जो गारंटर बनने जा रहे हैं—कानूनी दायित्वों को समझे बिना हस्ताक्षर करना भविष्य में गंभीर वित्तीय परिणाम ला सकता है।
अंततः, धारा 128 भारतीय संविदा कानून की उस व्यावहारिक दृष्टि को दर्शाती है जो व्यापारिक विश्वास और कानूनी सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करती है। गारंटी अनुबंध एक शक्तिशाली कानूनी उपकरण है—और इसके परिणाम उतने ही गंभीर।