छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: पेनिट्रेशन के बिना इजैक्युलेशन ‘रेप’ नहीं, बल्कि ‘रेप की कोशिश’
न्यायपालिका समय-समय पर ऐसे निर्णय देती है, जो आपराधिक कानून की व्याख्या को स्पष्ट करते हैं और समाज में चल रही धारणाओं को कानूनी कसौटी पर परखते हैं। हाल ही में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि यदि किसी मामले में पेनिट्रेशन (प्रवेश) सिद्ध नहीं होता और केवल इजैक्युलेशन (वीर्यपात) हुआ हो, तो उसे दुष्कर्म (रेप) नहीं माना जाएगा। ऐसी स्थिति में अपराध “रेप की कोशिश” (Attempt to Rape) की श्रेणी में आएगा, न कि पूर्ण दुष्कर्म के अपराध में।
यह फैसला न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने वासुदेव गोंड बनाम छत्तीसगढ़ सरकार मामले में सुनाया। इस निर्णय ने दुष्कर्म से संबंधित कानूनी तत्वों, विशेषकर “पेनिट्रेशन” की अनिवार्यता, को विस्तार से स्पष्ट किया।
घटना और ट्रायल कोर्ट का निर्णय
मामला वर्ष 2004 का है और घटना धमतरी जिले की बताई गई। आरोप था कि आरोपी ने पीड़िता की इच्छा के विरुद्ध उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने का प्रयास किया। 2005 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी मानते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत 7 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
ट्रायल कोर्ट ने मुख्य रूप से पीड़िता के प्रारंभिक बयान और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला था कि आरोपी ने बलपूर्वक दुष्कर्म किया। हालांकि, इस निर्णय को आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट में अपील और साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन
अपील की सुनवाई के दौरान पीड़िता के जिरह में दिए गए बयान ने मामले को नया मोड़ दिया। उसने अदालत में कहा कि आरोपी ने अपना निजी अंग उसकी योनि के ऊपर रखा था, परंतु अंदर प्रवेश (penetration) नहीं किया था। उसने यह भी कहा कि आरोपी लगभग 10 मिनट तक उसके ऊपर रहा, लेकिन वास्तविक प्रवेश नहीं हुआ।
हाईकोर्ट ने अपने 16 फरवरी के फैसले में कहा कि दुष्कर्म के अपराध के लिए “पेनिट्रेशन” आवश्यक तत्व है। कानून की दृष्टि में इजैक्युलेशन (वीर्यपात) आवश्यक नहीं है, बल्कि जननांग में किसी भी स्तर का प्रवेश – चाहे वह आंशिक ही क्यों न हो – पर्याप्त हो सकता है। किंतु इस तथ्य को सिद्ध करने के लिए स्पष्ट, ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य अनिवार्य हैं।
मेडिकल साक्ष्य की भूमिका
मेडिकल परीक्षण में पीड़िता की हाइमन (कौमार्य झिल्ली) फटी हुई नहीं पाई गई। डॉक्टर ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि योनि में केवल उंगली का सिरा डाला जा सकता था, जिससे आंशिक पेनिट्रेशन की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता।
लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल संभावना के आधार पर दुष्कर्म सिद्ध नहीं किया जा सकता। आपराधिक न्यायशास्त्र में संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाता है। यदि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाता कि आरोपी के अंग का कोई हिस्सा वास्तव में पीड़िता के जननांग के अंदर गया था, तो दुष्कर्म का अपराध सिद्ध नहीं होगा।
बयान में विरोधाभास और न्यायिक विश्लेषण
अदालत ने पाया कि पीड़िता के बयान में विरोधाभास था। एक चरण में उसने प्रवेश की बात कही, जबकि बाद में स्पष्ट रूप से कहा कि प्रवेश नहीं हुआ। इस प्रकार के विरोधाभासों ने अभियोजन के मामले को कमजोर किया।
न्यायमूर्ति व्यास ने कहा कि दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध में दोषसिद्धि के लिए साक्ष्य निर्विवाद और स्पष्ट होना चाहिए। संदेह या संभावनाओं के आधार पर किसी को कठोर सजा नहीं दी जा सकती।
हालांकि, अदालत ने यह भी माना कि आरोपी का कृत्य गंभीर और आपराधिक था। पीड़िता की इच्छा के विरुद्ध इस प्रकार का यौन आचरण “रेप की कोशिश” की श्रेणी में आता है।
कानून की दृष्टि: पेनिट्रेशन क्यों आवश्यक?
भारतीय दंड संहिता की धारा 375 (घटना के समय लागू प्रावधान) में दुष्कर्म की परिभाषा दी गई थी। न्यायालयों ने समय-समय पर यह व्याख्या की है कि “हल्का पेनिट्रेशन” भी पर्याप्त है। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने कहा है कि पूर्ण संभोग सिद्ध करना आवश्यक नहीं, बल्कि जननांग में प्रवेश का कोई भी स्तर पर्याप्त है।
परंतु यदि प्रवेश सिद्ध नहीं होता, तो अपराध धारा 376 के तहत नहीं आएगा। ऐसी स्थिति में इसे धारा 511 (अपराध का प्रयास) के साथ पढ़ा जाता है और “रेप की कोशिश” माना जाता है।
सजा में परिवर्तन
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का निर्णय संशोधित करते हुए आरोपी को दुष्कर्म के बजाय “रेप की कोशिश” का दोषी ठहराया। इसके साथ ही सजा 7 वर्ष से घटाकर 3 वर्ष 6 महीने कर दी गई।
अदालत ने निर्देश दिया कि आरोपी दो महीने के भीतर आत्मसमर्पण (सरेंडर) कर शेष सजा पूरी करे।
पूर्व कारावास का लाभ
अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी ट्रायल के दौरान 3 जून 2004 से 6 अप्रैल 2005 तक जेल में रहा था। बाद में 6 जुलाई 2005 को उसे जमानत मिली।
उसे पहले से काटी गई अवधि का लाभ दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 428 अथवा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 468 के तहत दिया जाएगा। इसका अर्थ है कि पूर्व में बिताई गई जेल अवधि अंतिम सजा में समायोजित होगी।
अधिवक्ताओं की भूमिका
दोषी की ओर से अधिवक्ता राहिल अरुण कोचर और लीकेश कुमार ने पैरवी की, जबकि राज्य की ओर से अधिवक्ता मनीष कश्यप ने तर्क प्रस्तुत किए। बचाव पक्ष ने मुख्य रूप से साक्ष्यों में विरोधाभास और मेडिकल रिपोर्ट की कमजोरी पर जोर दिया, जबकि अभियोजन ने पीड़िता के प्रारंभिक बयान को विश्वसनीय बताया।
निर्णय का व्यापक प्रभाव
यह फैसला कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है—
- कानूनी स्पष्टता: यह निर्णय पुनः स्थापित करता है कि दुष्कर्म के अपराध में “पेनिट्रेशन” केंद्रीय तत्व है।
- साक्ष्य का महत्व: केवल आरोप या संभावना पर्याप्त नहीं; स्पष्ट प्रमाण आवश्यक हैं।
- न्यायिक संतुलन: अदालत ने एक ओर आरोपी को संदेह का लाभ दिया, तो दूसरी ओर पीड़िता के साथ हुए आपराधिक कृत्य को नजरअंदाज नहीं किया।
- दंड में संतुलन: सजा घटाई गई, लेकिन अपराध को पूरी तरह समाप्त नहीं किया गया।
सामाजिक और कानूनी विमर्श
ऐसे फैसले अक्सर समाज में बहस का विषय बनते हैं। कुछ लोग इसे तकनीकी आधार पर राहत मानते हैं, तो कुछ इसे कानून की सख्त व्याख्या कहते हैं। परंतु आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल सिद्धांत है—“सौ दोषी छूट जाएं, पर एक निर्दोष को सजा न हो।”
दुष्कर्म जैसे संवेदनशील अपराधों में अदालतों को अत्यंत सावधानी से साक्ष्यों का परीक्षण करना पड़ता है। भावनाओं के बजाय कानून और प्रमाण के आधार पर निर्णय देना न्यायपालिका की जिम्मेदारी है।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह निर्णय दुष्कर्म कानून की व्याख्या में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इसने स्पष्ट किया कि पेनिट्रेशन के बिना केवल इजैक्युलेशन को दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। हालांकि, ऐसा कृत्य गंभीर अपराध है और “रेप की कोशिश” के रूप में दंडनीय है।
यह फैसला न केवल अभियोजन और बचाव पक्ष के लिए मार्गदर्शक है, बल्कि ट्रायल कोर्टों को भी साक्ष्य के मूल्यांकन में अधिक सावधानी बरतने का संकेत देता है। न्यायालय ने कानून के सिद्धांतों, साक्ष्यों की गुणवत्ता और न्यायिक संतुलन—तीनों का समुचित समन्वय करते हुए अपना निर्णय सुनाया, जो आने वाले समय में समान मामलों में संदर्भ बिंदु के रूप में देखा जाएगा।