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“सजा बनाम मुआवजा” : जघन्य अपराधों में कारावास घटाकर क्षतिपूर्ति बढ़ाने की प्रवृत्ति पर सर्वोच्च न्यायालय की कड़ी टिप्पणी

“सजा बनाम मुआवजा” : जघन्य अपराधों में कारावास घटाकर क्षतिपूर्ति बढ़ाने की प्रवृत्ति पर सर्वोच्च न्यायालय की कड़ी टिप्पणी

भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल उद्देश्य केवल अपराधी को दंडित करना नहीं, बल्कि समाज में विधि के शासन (Rule of Law) की स्थापना, पीड़ित के अधिकारों की रक्षा और भविष्य में अपराध की रोकथाम सुनिश्चित करना भी है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने कुछ उच्च न्यायालयों द्वारा अपनाई जा रही उस प्रवृत्ति पर गंभीर आपत्ति जताई है, जिसमें जघन्य अपराधों (heinous offences) में कारावास की अवधि कम करके पीड़ित को दिए जाने वाले मुआवजे (compensation) की राशि बढ़ा दी जाती है।

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दंड और क्षतिपूर्ति एक-दूसरे के विकल्प (substitutes) नहीं हैं। गंभीर अपराधों में कारावास को केवल आर्थिक भुगतान के माध्यम से संतुलित नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी भारतीय दंड दर्शन (penal philosophy) के मूलभूत सिद्धांतों को पुनः रेखांकित करती है।


दंड का उद्देश्य : प्रतिशोध नहीं, न्याय

आपराधिक न्यायशास्त्र में दंड के कई सिद्धांत माने जाते हैं—प्रतिशोधात्मक (retributive), निवारक (deterrent), सुधारात्मक (reformative) और प्रतिरोधात्मक (preventive)। जघन्य अपराध—जैसे हत्या, बलात्कार, सामूहिक हिंसा, अमानवीय आक्रमण—के संदर्भ में दंड का निवारक और प्रतिरोधात्मक पहलू अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

यदि न्यायालय कारावास की अवधि कम कर केवल मुआवजा बढ़ा देते हैं, तो यह संदेश जा सकता है कि आर्थिक संसाधन रखने वाला अपराधी दंड की गंभीरता से बच सकता है। यह न केवल पीड़ित के साथ अन्याय होगा, बल्कि समाज में दंड की समानता के सिद्धांत (equality before law) को भी कमजोर करेगा।


क्षतिपूर्ति की अवधारणा : संवेदनशीलता या प्रतिस्थापन?

भारतीय विधि में पीड़ितों को मुआवजा देने की व्यवस्था मौजूद है। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 और 357A के तहत न्यायालय पीड़ित को क्षतिपूर्ति देने का आदेश दे सकता है। इसके अतिरिक्त विभिन्न राज्यों में पीड़ित क्षतिपूर्ति योजनाएँ भी संचालित हैं।

परंतु क्षतिपूर्ति का उद्देश्य पीड़ित को आंशिक राहत देना है—न कि अपराधी की सजा को प्रतिस्थापित करना। सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि जघन्य अपराधों में कारावास कम करना और बदले में अधिक मुआवजा देना दंड के सिद्धांतों के विपरीत है।


उच्च न्यायालयों की प्रवृत्ति : मानवीय दृष्टिकोण या न्यायिक अतिक्रमण?

कुछ मामलों में उच्च न्यायालयों ने यह तर्क दिया कि लंबी कारावास की अवधि के बजाय अधिक मुआवजा देना पीड़ित के लिए अधिक उपयोगी हो सकता है। विशेषकर तब, जब अपराधी आर्थिक रूप से सक्षम हो और पीड़ित को त्वरित आर्थिक सहायता की आवश्यकता हो।

किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने इस दृष्टिकोण को सीमित माना। अदालत ने कहा कि जघन्य अपराधों में दंड की गंभीरता समाज के प्रति न्याय का प्रतीक है। यदि सजा कम कर दी जाए, तो यह न्यायिक संतुलन को बिगाड़ सकता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 पीड़ित और समाज—दोनों को न्याय की गारंटी देता है। अतः केवल आर्थिक मुआवजा देकर कारावास कम करना अनुच्छेद 21 की व्यापक भावना के अनुरूप नहीं है।


दंड और सामाजिक संदेश

जघन्य अपराध केवल व्यक्तिगत क्षति नहीं, बल्कि सामाजिक नैतिकता पर भी आघात होते हैं। हत्या, बलात्कार या बाल यौन शोषण जैसे अपराधों में कठोर दंड समाज को यह संदेश देता है कि कानून ऐसे कृत्यों को गंभीरता से लेता है।

यदि ऐसे मामलों में कारावास घटाकर मुआवजा बढ़ाया जाए, तो यह संदेश कमजोर पड़ सकता है। इससे संभावित अपराधियों को यह संकेत मिल सकता है कि आर्थिक भुगतान के माध्यम से सजा को कम किया जा सकता है।


पीड़ित के अधिकार : न्याय का केंद्र

हाल के वर्षों में न्यायपालिका ने “victim-centric justice” की अवधारणा को बल दिया है। पीड़ित को केवल गवाह या शिकायतकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि न्याय प्रक्रिया के केंद्र में रखने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

परंतु पीड़ित के अधिकारों का अर्थ केवल आर्थिक सहायता नहीं है। न्याय, सम्मान, सुरक्षा और अपराधी को उचित दंड मिलना भी पीड़ित की अपेक्षा का हिस्सा है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह रेखांकित किया कि दंड की गंभीरता पीड़ित के प्रति न्याय का एक महत्वपूर्ण घटक है।


दंड का विवेकाधिकार और उसकी सीमाएँ

न्यायालयों को सजा निर्धारित करने में विवेकाधिकार (judicial discretion) प्राप्त है। परंतु यह विवेकाधिकार असीमित नहीं है। दंड का निर्धारण अपराध की प्रकृति, परिस्थितियों और सामाजिक प्रभाव को ध्यान में रखकर किया जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने संकेत दिया कि जघन्य अपराधों में अत्यधिक उदारता (undue leniency) न्यायिक विवेक का दुरुपयोग हो सकता है। दंड में संतुलन आवश्यक है—न अत्यधिक कठोरता, न अनुचित उदारता।


समानता और आर्थिक असमानता का प्रश्न

यदि मुआवजा बढ़ाकर सजा कम करने की प्रवृत्ति को मान्यता मिलती है, तो यह आर्थिक असमानता को बढ़ावा दे सकती है। आर्थिक रूप से संपन्न अपराधी भारी मुआवजा देकर कम कारावास प्राप्त कर सकता है, जबकि निर्धन अपराधी ऐसा नहीं कर पाएगा।

यह स्थिति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के सिद्धांत के विपरीत होगी। न्याय केवल संपन्न लोगों के लिए अलग और निर्धनों के लिए अलग नहीं हो सकता।


अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जघन्य अपराधों में कारावास को प्राथमिक दंड माना जाता है। क्षतिपूर्ति को सहायक उपाय (ancillary measure) के रूप में देखा जाता है। अधिकांश विधि व्यवस्थाओं में मुआवजा सजा का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक उपाय है।


संभावित प्रभाव

सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी भविष्य में उच्च न्यायालयों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत का कार्य करेगी। इससे दंड निर्धारण में अधिक सावधानी बरती जाएगी और जघन्य अपराधों में अनुचित उदारता पर अंकुश लगेगा।

यह निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि पीड़ित को न्याय दिलाने का अर्थ केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि विधिक संतुलन बनाए रखना है।


निष्कर्ष : संतुलित न्याय की आवश्यकता

जघन्य अपराधों में कारावास कम कर मुआवजा बढ़ाने की प्रवृत्ति को सर्वोच्च न्यायालय ने अस्वीकार्य बताया है। यह दृष्टिकोण भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली के मूल सिद्धांतों—निवारण, समानता, और सामाजिक न्याय—के अनुरूप है।

दंड और क्षतिपूर्ति दोनों आवश्यक हैं, परंतु दोनों की भूमिकाएँ अलग-अलग हैं। कारावास अपराध की गंभीरता का उत्तर है, जबकि मुआवजा पीड़ित की आंशिक राहत का साधन।

अंततः न्याय का उद्देश्य केवल आर्थिक संतुलन नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक संतुलन भी है। सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी इसी व्यापक न्यायिक दर्शन की पुनः पुष्टि करती है—कि गंभीर अपराधों में दंड का स्थान धन से नहीं लिया जा सकता।