डिजिटल दौर में व्यक्तित्व अधिकार बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता : रामदेव बनाम डीपफेक विवाद की संवैधानिक पड़ताल
डिजिटल युग ने अभिव्यक्ति के नए आयाम खोले हैं, लेकिन साथ ही पहचान, प्रतिष्ठा और निजी अधिकारों के सामने अभूतपूर्व चुनौतियाँ भी खड़ी कर दी हैं। हाल ही में योग गुरु रामदेव द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर याचिका ने इसी जटिल प्रश्न को केंद्र में ला खड़ा किया है—क्या किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व अधिकार (Personality Rights) को कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डीपफेक तकनीक के दुरुपयोग से पूर्ण संरक्षण मिलना चाहिए, या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यंग्य (satire) के नाम पर कुछ सीमा तक इसका उपयोग स्वीकार्य है?
यह विवाद केवल एक व्यक्ति या एक संस्था तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक संवैधानिक विमर्श का हिस्सा है जिसमें तकनीकी प्रगति, निजता, प्रतिष्ठा और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन की खोज की जा रही है।
व्यक्तित्व अधिकार : संवैधानिक आधार और न्यायिक विकास
भारतीय संविधान में “व्यक्तित्व अधिकार” शब्द सीधे तौर पर उल्लिखित नहीं है, परंतु यह अनुच्छेद 21 के अंतर्गत “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” की व्यापक व्याख्या से विकसित हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर जीवन के अधिकार को केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित न मानकर उसमें गरिमा, प्रतिष्ठा और निजता को भी शामिल किया है।
इस संदर्भ में ऐतिहासिक निर्णय के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने निजता को मौलिक अधिकार घोषित किया। इस निर्णय ने स्पष्ट किया कि व्यक्ति की पहचान, छवि, आवाज़ और व्यक्तिगत डेटा पर उसका नियंत्रण एक संवैधानिक मूल्य है।
व्यक्तित्व अधिकार का मूल तत्व है—किसी व्यक्ति की पहचान (नाम, तस्वीर, आवाज़, हस्ताक्षर आदि) का व्यावसायिक या भ्रामक उपयोग उसकी अनुमति के बिना न किया जाए। यह अधिकार विशेष रूप से सार्वजनिक व्यक्तियों (public figures) के संदर्भ में अधिक जटिल हो जाता है, क्योंकि वे समाज में चर्चा और आलोचना का विषय भी होते हैं।
डीपफेक तकनीक : अभिव्यक्ति या धोखा?
डीपफेक तकनीक कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से किसी व्यक्ति की छवि या आवाज़ को इस प्रकार प्रस्तुत करती है मानो वह वास्तविक हो। यह तकनीक मनोरंजन, सिनेमा और व्यंग्य में उपयोगी हो सकती है, परंतु जब इसका प्रयोग भ्रामक या अपमानजनक सामग्री बनाने के लिए किया जाता है, तब यह गंभीर कानूनी और नैतिक प्रश्न खड़े करती है।
रामदेव की याचिका में मुख्य चिंता यह बताई गई है कि उनकी छवि और आवाज़ का प्रयोग ऐसे वीडियो और सामग्री में किया जा रहा है, जो या तो व्यावसायिक लाभ के लिए है या उनकी प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचाने वाला है। प्रश्न यह है कि क्या ऐसे उपयोग को “व्यंग्य” या “फ्री स्पीच” के दायरे में संरक्षित किया जा सकता है?
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम प्रतिष्ठा का अधिकार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। परंतु अनुच्छेद 19(2) इस स्वतंत्रता पर युक्तिसंगत प्रतिबंधों की अनुमति देता है—जैसे मानहानि, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता आदि।
सार्वजनिक व्यक्तियों के संदर्भ में न्यायालयों ने यह माना है कि उन्हें सामान्य नागरिकों की तुलना में अधिक आलोचना सहन करनी पड़ती है। परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि उनकी छवि का पूर्णतः अनियंत्रित उपयोग किया जा सकता है।
इस संदर्भ में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए पूर्ववर्ती निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की छवि का व्यावसायिक शोषण उसकी अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता। उदाहरण के लिए, अनिल कपूर द्वारा दायर याचिका में अदालत ने उनकी आवाज़, छवि और व्यक्तित्व के अनधिकृत उपयोग पर अंतरिम रोक लगाई थी।
यहाँ मुख्य अंतर “व्यंग्य” और “व्यावसायिक शोषण” के बीच है। यदि कोई सामग्री स्पष्ट रूप से पैरोडी या आलोचना के रूप में प्रस्तुत की गई है और वह दर्शकों को भ्रमित नहीं करती, तो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण मिल सकता है। परंतु यदि वही सामग्री किसी उत्पाद के प्रचार या भ्रामक प्रचार के लिए उपयोग की जाती है, तो वह व्यक्तित्व अधिकार का उल्लंघन मानी जा सकती है।
सार्वजनिक व्यक्ति की सीमा : क्या प्रसिद्धि से अधिकार घटते हैं?
यह तर्क अक्सर दिया जाता है कि जो व्यक्ति स्वयं सार्वजनिक मंचों पर सक्रिय है, उसे आलोचना और डिजिटल पुनरुत्पादन के लिए तैयार रहना चाहिए। परंतु प्रसिद्धि का अर्थ अधिकारों का परित्याग नहीं है।
न्यायिक दृष्टिकोण यह रहा है कि सार्वजनिक व्यक्ति भी अपनी गरिमा और प्रतिष्ठा की रक्षा का अधिकार रखते हैं। हाँ, उनकी आलोचना का दायरा व्यापक हो सकता है, परंतु उनकी पहचान का भ्रामक या धोखाधड़ीपूर्ण उपयोग अस्वीकार्य है।
व्यंग्य और पैरोडी : संवैधानिक सुरक्षा का दायरा
लोकतंत्र में व्यंग्य एक सशक्त माध्यम है। राजनीतिक और सामाजिक व्यक्तियों की आलोचना अक्सर पैरोडी के रूप में की जाती है। प्रश्न यह है कि डीपफेक के माध्यम से निर्मित पैरोडी कहाँ तक स्वीकार्य है?
यदि दर्शक को स्पष्ट रूप से ज्ञात है कि यह एक व्यंग्यात्मक प्रस्तुति है, तो उसे संरक्षित अभिव्यक्ति माना जा सकता है। परंतु जब तकनीक इतनी यथार्थवादी हो जाए कि वास्तविक और नकली में भेद करना कठिन हो, तब यह धोखे की श्रेणी में आ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
अमेरिका और यूरोप में “Right of Publicity” को कानूनी मान्यता प्राप्त है। वहाँ भी यह बहस जारी है कि एआई-जनित सामग्री में किसी की छवि या आवाज़ के उपयोग के लिए पूर्व अनुमति आवश्यक होनी चाहिए या नहीं।
यूरोपीय संघ ने एआई विनियमन के तहत पारदर्शिता और लेबलिंग को अनिवार्य करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, जिससे डीपफेक सामग्री को स्पष्ट रूप से चिह्नित किया जा सके।
संभावित न्यायिक दिशा
रामदेव बनाम डीपफेक विवाद में अदालत को तीन प्रमुख प्रश्नों पर विचार करना होगा—
- क्या व्यक्तित्व अधिकार को एआई और डीपफेक के संदर्भ में विशेष संरक्षण की आवश्यकता है?
- क्या व्यंग्य और आलोचना के नाम पर डीपफेक का उपयोग वैध है?
- क्या प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए?
संभव है कि न्यायालय एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाए—जहाँ स्पष्ट भ्रामक और व्यावसायिक उपयोग पर रोक लगे, परंतु वैध व्यंग्य और आलोचना को संरक्षित रखा जाए।
डिजिटल युग में नई कानूनी आवश्यकता
यह विवाद संकेत देता है कि मौजूदा कानून—मानहानि, कॉपीराइट, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम—शायद डीपफेक जैसी तकनीक के लिए पर्याप्त नहीं हैं। आवश्यकता है एक व्यापक “डिजिटल व्यक्तित्व संरक्षण कानून” की, जो एआई-जनित सामग्री के उपयोग की स्पष्ट सीमाएँ निर्धारित करे।
निष्कर्ष : संतुलन की खोज
रामदेव की याचिका केवल एक व्यक्ति की छवि की रक्षा का प्रश्न नहीं है; यह उस बड़े संवैधानिक संतुलन की परीक्षा है जिसमें व्यक्ति की गरिमा और समाज की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दोनों का सम्मान किया जाना चाहिए।
व्यक्तित्व अधिकार पूर्ण नहीं हैं, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी निरंकुश नहीं है। डिजिटल युग में न्यायालयों के सामने चुनौती है—तकनीक की तीव्र गति के बीच संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना।
अंततः प्रश्न यह नहीं कि व्यक्तित्व अधिकार कहाँ समाप्त होते हैं, बल्कि यह कि लोकतंत्र में तकनीक और स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। यही इस मामले का असली महत्व है—और यही भविष्य के कानून की दिशा भी तय करेगा।