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छह वर्षीय सौतेली बेटी की हत्या के मामले में आरोपी बरी, ‘पुलिस हिरासत’ बनी निर्णायक शर्त

धारा 27 की व्याख्या पर सुप्रीम कोर्ट का विस्तृत निर्णय : छह वर्षीय सौतेली बेटी की हत्या के मामले में आरोपी बरी, ‘पुलिस हिरासत’ बनी निर्णायक शर्त

भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में साक्ष्य की स्वीकार्यता (admissibility) का प्रश्न कई बार पूरे मुकदमे की दिशा तय कर देता है। मंगलवार (17 फरवरी) को Supreme Court of India ने एक अत्यंत संवेदनशील और भावनात्मक मामले में ऐसा ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने अपनी छह साल की सौतेली बेटी की हत्या के आरोप में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 27 के तहत ‘खुलासा बयान’ (disclosure statement) के आधार पर की गई बरामदगी तभी स्वीकार्य होगी, जब वह बयान आरोपी द्वारा पुलिस हिरासत में रहते हुए दिया गया हो। यदि यह मूल शर्त पूरी नहीं होती, तो बरामदगी साक्ष्य के रूप में मान्य नहीं होगी।

यह निर्णय केवल एक अभियुक्त की रिहाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पुलिस जांच, अभियोजन रणनीति और अदालतों में साक्ष्य की स्वीकार्यता से जुड़े बुनियादी सिद्धांतों को पुनः रेखांकित करता है।


प्रकरण की पृष्ठभूमि

मामले में आरोपी पर अपनी छह वर्षीय सौतेली बेटी की हत्या का आरोप था। घटना ने स्थानीय समुदाय को झकझोर दिया था। पुलिस जांच के दौरान आरोपी से पूछताछ की गई और कथित रूप से उसके बयान के आधार पर कुछ वस्तुओं की बरामदगी की गई, जिन्हें अभियोजन ने अपराध से जोड़ने का प्रयास किया।

ट्रायल कोर्ट ने इन बरामदगियों और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया। उच्च न्यायालय ने भी दोषसिद्धि को बरकरार रखा।

हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय में अपील के दौरान साक्ष्य की वैधता, विशेषकर धारा 27 के तहत कथित खुलासा बयान की स्वीकार्यता, मुख्य विवाद का विषय बन गई।


भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 : क्या है प्रावधान?

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 और 26 सामान्य रूप से पुलिस के समक्ष दिए गए स्वीकारोक्ति (confession) को अदालत में स्वीकार्य नहीं मानतीं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पुलिस दबाव या यातना के माध्यम से प्राप्त स्वीकारोक्ति का दुरुपयोग न हो।

धारा 27 इन सामान्य नियमों का एक सीमित अपवाद प्रदान करती है। इसके अनुसार, यदि आरोपी के बयान के आधार पर कोई तथ्य या वस्तु बरामद होती है, तो उस बयान का उतना हिस्सा स्वीकार्य होगा, जो सीधे-सीधे बरामदगी से संबंधित हो—परंतु यह तभी संभव है जब बयान पुलिस हिरासत में दिया गया हो।

यानी, “पुलिस हिरासत” धारा 27 के अनुप्रयोग की अनिवार्य शर्त है।


सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि धारा 27 का उपयोग तभी किया जा सकता है जब आरोपी विधिवत पुलिस हिरासत में हो। हिरासत का अर्थ केवल पूछताछ के लिए बुलाया जाना नहीं है, बल्कि विधिक रूप से नियंत्रित स्थिति (custody) है, जिसमें आरोपी पुलिस के नियंत्रण में हो।

अदालत ने पाया कि जिस समय कथित खुलासा बयान दर्ज किया गया, उस समय आरोपी औपचारिक रूप से पुलिस हिरासत में नहीं था। इसलिए उस बयान के आधार पर हुई बरामदगी को कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं माना जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि अपवाद का विस्तार नहीं किया जा सकता। यदि वैधानिक शर्तें पूरी नहीं हैं, तो साक्ष्य अस्वीकार्य होगा।


परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला

अभियोजन का मुख्य आधार वही बरामदगी थी। जब धारा 27 के तहत वह साक्ष्य अमान्य घोषित हो गया, तो शेष परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला अधूरी मानी गई।

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के मामलों में अभियोजन को ऐसी पूर्ण श्रृंखला प्रस्तुत करनी होती है, जिससे अपराध के अलावा कोई अन्य संभावना न बचे।

यदि साक्ष्य की कड़ी टूट जाती है या संदेह की गुंजाइश रह जाती है, तो आरोपी को लाभ दिया जाना चाहिए।


‘संदेह का लाभ’ सिद्धांत

आपराधिक न्याय प्रणाली का एक मूल सिद्धांत है कि “सौ दोषी छूट जाएं, पर एक निर्दोष को सजा न हो।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब साक्ष्य की वैधता पर गंभीर प्रश्न उठते हैं और अभियोजन संदेह से परे अपराध सिद्ध नहीं कर पाता, तो दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकता।

इस मामले में भी अदालत ने संदेह का लाभ आरोपी को दिया।


पुलिस जांच के लिए संदेश

यह निर्णय जांच एजेंसियों के लिए एक स्पष्ट संदेश है:

  1. गिरफ्तारी और हिरासत की प्रक्रिया का सख्ती से पालन किया जाए।
  2. खुलासा बयान दर्ज करने से पहले आरोपी की कानूनी स्थिति स्पष्ट हो।
  3. दस्तावेजी रिकॉर्ड और पंचनामा पूरी पारदर्शिता से तैयार किए जाएं।

यदि इन औपचारिकताओं में चूक होती है, तो गंभीर अपराधों में भी अभियोजन कमजोर पड़ सकता है।


संवैधानिक अधिकार और आत्म-अपराधीकरण

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20(3) आरोपी को आत्म-अपराधीकरण (self-incrimination) के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है।

धारा 27 इसी संवैधानिक सुरक्षा के बीच एक संकीर्ण अपवाद है। इसलिए इसकी व्याख्या हमेशा सीमित और सावधानीपूर्वक की जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय में यह दोहराया कि आरोपी के अधिकारों की रक्षा सर्वोपरि है।


भावनात्मक बनाम विधिक दृष्टिकोण

मामला एक मासूम बच्ची की हत्या से जुड़ा था, जो स्वाभाविक रूप से भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है।

लेकिन अदालत ने यह स्पष्ट किया कि न्याय भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि कानून और साक्ष्य के आधार पर दिया जाता है।

यदि साक्ष्य विधिसम्मत नहीं है, तो दोषसिद्धि टिक नहीं सकती—चाहे अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो।


व्यापक कानूनी प्रभाव

यह फैसला भविष्य में कई मामलों को प्रभावित कर सकता है:

  • धारा 27 की व्याख्या और अधिक स्पष्ट हो गई है।
  • पुलिस हिरासत की अवधारणा पर बल दिया गया है।
  • साक्ष्य की वैधता को लेकर अदालतों में अधिक सतर्कता बरती जाएगी।

यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और वैधानिक अनुपालन की आवश्यकता को मजबूत करता है।


निष्कर्ष

छह वर्षीय सौतेली बेटी की हत्या के मामले में आरोपी को बरी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत खुलासा बयान की स्वीकार्यता के लिए पुलिस हिरासत अनिवार्य शर्त है।

यह फैसला न्यायिक सिद्धांतों की दृढ़ता, संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और प्रक्रिया की पवित्रता को पुनः स्थापित करता है।

अदालत ने यह संदेश दिया है कि अपराध की गंभीरता चाहे जितनी हो, दोषसिद्धि केवल वैध, विश्वसनीय और विधिसम्मत साक्ष्यों के आधार पर ही टिक सकती है। कानून की प्रक्रिया का सम्मान ही न्याय की विश्वसनीयता की नींव है।