मानव अधिकारों की अवधारणा का विकास (Growth of the Concept of Human Rights)
मानव अधिकारों की अवधारणा आज विश्व-व्यापी स्तर पर स्वीकृत एक मूलभूत सिद्धांत बन चुकी है, किंतु यह स्थिति किसी एक क्षण में उत्पन्न नहीं हुई। यह विचार सदियों के चिंतन, संघर्ष, सामाजिक आंदोलनों और राजनीतिक परिवर्तनों का परिणाम है। मानव अधिकारों का विकास एक क्रमिक प्रक्रिया रही है, जिसमें नैतिक दर्शन, प्राकृतिक विधि, राजनीतिक क्रांतियाँ, संवैधानिक आंदोलन तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका प्रमुख रही है। इस लेख में मानव अधिकारों की अवधारणा के विकास को ऐतिहासिक दृष्टि से समझने का प्रयास किया गया है।
1. प्राचीन काल में मानव अधिकारों के बीज
प्राचीन सभ्यताओं में मानव अधिकारों को आधुनिक अर्थों में परिभाषित नहीं किया गया था, परंतु न्याय, समानता और मानवीय गरिमा के विचार विद्यमान थे। यूनान और रोम की सभ्यताओं में प्राकृतिक विधि (Natural Law) की अवधारणा विकसित हुई, जिसके अनुसार कुछ अधिकार मनुष्य को प्रकृति से प्राप्त होते हैं और राज्य उन्हें छीन नहीं सकता।
भारत की प्राचीन परंपरा में “धर्म” की अवधारणा सामाजिक न्याय, कर्तव्य और नैतिकता पर आधारित थी। बौद्ध और जैन दर्शन ने अहिंसा, करुणा और समानता पर बल दिया। इन विचारों ने मानव गरिमा के प्रति सम्मान की भावना को सुदृढ़ किया।
2. मध्यकालीन युग और अधिकारों की सीमित मान्यता
मध्यकाल में राजाओं की निरंकुश सत्ता के कारण सामान्य जनता के अधिकार अत्यंत सीमित थे। फिर भी इस काल में कुछ ऐसे दस्तावेज सामने आए, जिन्होंने सत्ता को नियंत्रित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1215 ई. में इंग्लैंड में मैग्ना कार्टा (Magna Carta) ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि राजा भी विधि से ऊपर नहीं है। इसमें कर लगाने और दंड देने के लिए विधिसम्मत प्रक्रिया की आवश्यकता पर बल दिया गया। यद्यपि यह दस्तावेज मुख्यतः सामंत वर्ग के हितों की रक्षा करता था, फिर भी यह नागरिक स्वतंत्रताओं की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
इसके पश्चात Petition of Right (1628) और Bill of Rights (1689) ने संसदीय सर्वोच्चता और नागरिक अधिकारों को मान्यता प्रदान की।
3. प्राकृतिक अधिकार सिद्धांत और दार्शनिक आधार
17वीं और 18वीं शताब्दी में मानव अधिकारों की अवधारणा को दार्शनिक आधार प्राप्त हुआ। इस काल में प्राकृतिक अधिकार सिद्धांत का विकास हुआ।
जॉन लॉक ने जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति को प्राकृतिक अधिकार बताया। उनके अनुसार राज्य का मुख्य उद्देश्य इन अधिकारों की रक्षा करना है। यदि राज्य ऐसा करने में असफल रहता है, तो जनता को उसे बदलने का अधिकार है।
रूसो ने सामाजिक संविदा का सिद्धांत प्रस्तुत किया और कहा कि सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता है। थॉमस पेन ने मानव अधिकारों को सार्वभौमिक और अविच्छिन्न बताया।
इन विचारों ने मानव अधिकारों को नैतिक दर्शन से निकालकर राजनीतिक और कानूनी विमर्श के केंद्र में ला दिया।
4. अमेरिकी और फ्रांसीसी क्रांतियाँ : अवधारणा का व्यावहारिक रूप
1776 की अमेरिकी स्वतंत्रता घोषणा में यह कहा गया कि सभी मनुष्य समान पैदा हुए हैं और उन्हें जीवन, स्वतंत्रता तथा सुख की खोज का अधिकार है। यह मानव अधिकारों की अवधारणा का पहला व्यापक राजनीतिक घोषणापत्र माना जाता है।
1789 की फ्रांसीसी क्रांति ने “मानव और नागरिक अधिकारों की घोषणा” के माध्यम से स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को राज्य की आधारशिला बनाया। इस घोषणा ने मानव अधिकारों को सार्वभौमिक स्वरूप प्रदान किया।
इन क्रांतियों ने यह स्पष्ट कर दिया कि मानव अधिकार केवल दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि राज्य की संरचना का आधार हो सकते हैं।
5. उन्नीसवीं शताब्दी : सामाजिक और आर्थिक अधिकारों का विस्तार
औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप श्रमिक वर्ग के शोषण की समस्या सामने आई। लंबे कार्य घंटे, कम मजदूरी और अमानवीय परिस्थितियों ने मानव अधिकारों की अवधारणा को नया आयाम दिया।
अब केवल नागरिक और राजनीतिक अधिकारों को पर्याप्त नहीं माना गया, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, कार्य, उचित मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा जैसे अधिकारों को भी मानव अधिकारों के रूप में मान्यता मिलने लगी।
महिला मताधिकार आंदोलन, दास प्रथा उन्मूलन आंदोलन और शिक्षा के सार्वभौमिक अधिकार की मांग ने मानव अधिकारों के दायरे को व्यापक बनाया।
6. बीसवीं शताब्दी : अंतर्राष्ट्रीयकरण का युग
प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका ने यह स्पष्ट कर दिया कि मानव अधिकारों की रक्षा केवल राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त नहीं है। इस आवश्यकता ने अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को जन्म दिया।
1945 में संयुक्त राष्ट्र संगठन की स्थापना हुई, जिसके उद्देश्यों में मानव अधिकारों के सम्मान और संरक्षण को प्रमुख स्थान दिया गया।
1948 में सार्वभौमिक मानव अधिकार घोषणा (Universal Declaration of Human Rights) को स्वीकार किया गया। इसमें नागरिक, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध किया गया। यद्यपि यह घोषणा विधिक रूप से बाध्यकारी नहीं थी, फिर भी इसने अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार कानून की नींव रखी।
1966 में दो महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय वाचाएँ अस्तित्व में आईं—
- नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय वाचा
- आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय वाचा
इनके माध्यम से मानव अधिकारों को विधिक स्वरूप प्राप्त हुआ।
7. भारत में मानव अधिकारों की अवधारणा का विकास
भारत में स्वतंत्रता आंदोलन मानव अधिकारों की मांग से गहराई से जुड़ा हुआ था। स्वतंत्रता, समानता और न्याय की आकांक्षा ने संविधान निर्माण को दिशा दी।
1950 में लागू भारतीय संविधान ने मौलिक अधिकारों को संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया। समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धर्म की स्वतंत्रता, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार तथा संवैधानिक उपचार का अधिकार भारतीय मानव अधिकार व्यवस्था के स्तंभ हैं।
इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य मानवाधिकार आयोगों की स्थापना ने मानव अधिकारों की रक्षा के लिए संस्थागत तंत्र विकसित किया।
8. आधुनिक युग में मानव अधिकारों का नया विस्तार
आज मानव अधिकारों की अवधारणा निरंतर विकसित हो रही है। पर्यावरण संरक्षण, विकास का अधिकार, शांति का अधिकार और सूचना का अधिकार जैसे नए अधिकार उभर कर सामने आए हैं।
डिजिटल युग में गोपनीयता का अधिकार, डेटा संरक्षण और साइबर सुरक्षा मानव अधिकार विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। जैव-प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास ने भी मानव अधिकारों के समक्ष नई चुनौतियाँ उत्पन्न की हैं।
निष्कर्ष
मानव अधिकारों की अवधारणा का विकास एक दीर्घ और सतत प्रक्रिया है। यह प्राचीन नैतिक विचारों से प्रारंभ होकर आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय कानून तक पहुंची है। समय के साथ मानव अधिकारों का दायरा विस्तृत होता गया और आज यह मानव गरिमा, स्वतंत्रता और समानता की सार्वभौमिक अभिव्यक्ति बन चुका है।
मानव अधिकार केवल कानूनी प्रावधान नहीं हैं, बल्कि वे एक नैतिक प्रतिबद्धता भी हैं, जो प्रत्येक समाज और राज्य पर यह दायित्व डालती है कि वह प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर प्रदान करे।