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“विवाह से पहले लड़का-लड़की अजनबी होते हैं” : प्री-मैरिटल संबंधों पर सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणी और कानूनी-सामाजिक विमर्श

“विवाह से पहले लड़का-लड़की अजनबी होते हैं” : प्री-मैरिटल संबंधों पर सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणी और कानूनी-सामाजिक विमर्श

सोमवार को Supreme Court of India ने एक मामले की सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से टिप्पणी की कि विवाह से पहले एक लड़का और लड़की कानूनी रूप से “अजनबी” (strangers) होते हैं, इसलिए विवाह से पूर्व शारीरिक संबंध स्थापित करने से पहले “सावधानी” (circumspection) बरतनी चाहिए।

हालाँकि यह टिप्पणी किसी अंतिम निर्णय का हिस्सा नहीं थी, फिर भी इसने व्यापक सामाजिक और कानूनी बहस को जन्म दिया है—विशेषकर सहमति (consent), वैवाहिक वचन (promise of marriage), और आपराधिक मुकदमों में उभरते विवादों के संदर्भ में।


किस संदर्भ में आई यह टिप्पणी?

अदालत के समक्ष एक ऐसा आपराधिक मामला था, जिसमें आरोप था कि विवाह का वादा कर शारीरिक संबंध बनाए गए और बाद में विवाह नहीं हुआ। ऐसे मामलों में अक्सर भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार) या 417 (धोखाधड़ी) के तहत कार्यवाही की जाती है, यदि यह आरोप हो कि सहमति “भ्रामक वादे” (false promise of marriage) के आधार पर प्राप्त की गई।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह रेखांकित किया कि विवाह से पूर्व दोनों पक्ष कानूनी रूप से स्वतंत्र और असंबद्ध व्यक्ति होते हैं। इसलिए संबंध स्थापित करने से पहले विवेक और सावधानी अपेक्षित है।

अदालत की यह टिप्पणी सामाजिक आचरण पर नैतिक उपदेश देने के बजाय, कानूनी जटिलताओं की ओर संकेत करती है—विशेषकर तब, जब निजी संबंध आपराधिक मुकदमों का रूप ले लेते हैं।


“सहमति” की कानूनी परिभाषा

भारतीय आपराधिक कानून में सहमति एक केंद्रीय अवधारणा है। यदि कोई संबंध पूर्णतः स्वैच्छिक और परिपक्व सहमति से स्थापित हुआ हो, तो वह अपराध की श्रेणी में नहीं आता।

किन्तु यदि यह सिद्ध हो जाए कि सहमति धोखे या झूठे वादे के आधार पर प्राप्त की गई, तो न्यायालय इसे वैध सहमति नहीं मान सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व के कई फैसलों में स्पष्ट किया है कि हर असफल प्रेम संबंध को आपराधिक मुकदमे में नहीं बदला जा सकता। यह देखना आवश्यक है कि क्या शुरू से ही विवाह का इरादा नहीं था, या बाद में परिस्थितियाँ बदल गईं।


विवाह से पूर्व संबंध और कानूनी जोखिम

अदालत की टिप्पणी का एक प्रमुख संदेश यह है कि निजी संबंधों में कानूनी परिणामों की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

आज के समय में प्री-मैरिटल संबंध सामाजिक रूप से अधिक स्वीकार्य हो रहे हैं, लेकिन कानूनी दृष्टि से यदि विवाद उत्पन्न होता है, तो यह गंभीर आपराधिक आरोपों में बदल सकता है।

इसलिए न्यायालय ने सावधानी बरतने की बात कही—ताकि बाद में किसी पक्ष को यह महसूस न हो कि उसके साथ छल हुआ है।


सामाजिक परिवर्तन और न्यायिक दृष्टिकोण

भारत में सामाजिक मान्यताएँ तेजी से बदल रही हैं। शहरी क्षेत्रों में विवाह से पूर्व संबंधों को लेकर दृष्टिकोण अपेक्षाकृत उदार हुआ है।

हालाँकि, न्यायालय का कार्य सामाजिक आचरण को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि कानून की व्याख्या करना है। जब ऐसे संबंध विवाद में बदलते हैं और आपराधिक मुकदमे दर्ज होते हैं, तब अदालत को यह तय करना पड़ता है कि सहमति वास्तविक थी या नहीं।

इसी संदर्भ में यह टिप्पणी महत्वपूर्ण हो जाती है।


क्या यह नैतिक टिप्पणी है?

कई कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि अदालत की टिप्पणी को नैतिक उपदेश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

यह अधिकतर एक व्यावहारिक चेतावनी है कि निजी संबंधों में स्पष्टता और पारदर्शिता आवश्यक है। यदि कोई पक्ष विवाह का वादा करता है, तो उसे गंभीरता से लेना चाहिए, क्योंकि बाद में वही वादा कानूनी विवाद का आधार बन सकता है।


पूर्व न्यायिक निर्णयों की पृष्ठभूमि

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में कहा है कि यदि संबंध लंबे समय तक सहमति से चला और दोनों वयस्क थे, तो केवल विवाह न होने से अपराध सिद्ध नहीं होता।

लेकिन यदि यह साबित हो जाए कि आरोपी ने शुरू से ही विवाह का कोई इरादा नहीं रखा और केवल शारीरिक संबंध स्थापित करने के लिए वादा किया, तो यह धोखाधड़ी या बलात्कार की श्रेणी में आ सकता है।

इसलिए हर मामला तथ्यों पर निर्भर करता है।


व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम कानूनी जिम्मेदारी

भारतीय संविधान वयस्कों को निजी जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। दो वयस्क यदि सहमति से संबंध स्थापित करते हैं, तो राज्य सामान्यतः उसमें हस्तक्षेप नहीं करता।

लेकिन जब मामला आपराधिक आरोपों तक पहुँचता है, तब न्यायालय को तथ्यों की सूक्ष्म जांच करनी पड़ती है।

अदालत की टिप्पणी इसी संतुलन को रेखांकित करती है—स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है।


युवाओं के लिए संदेश

यह टिप्पणी युवाओं के लिए एक संकेत भी है कि भावनात्मक या निजी निर्णयों के कानूनी परिणाम हो सकते हैं।

  • संबंध में पारदर्शिता रखें।
  • विवाह के वादे को हल्के में न लें।
  • किसी भी प्रकार के दबाव या धोखे से बचें।

ऐसे कदम भविष्य में कानूनी विवादों को कम कर सकते हैं।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट की यह मौखिक टिप्पणी किसी कठोर प्रतिबंध या नैतिक निर्देश के रूप में नहीं, बल्कि कानूनी विवेक की सलाह के रूप में देखी जानी चाहिए।

विवाह से पूर्व संबंधों पर समाज का दृष्टिकोण बदल रहा है, परंतु कानून अब भी सहमति, धोखाधड़ी और वादों की गंभीरता को ध्यान में रखता है।

अंततः यह स्पष्ट है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। न्यायालय की टिप्पणी इसी संतुलन की याद दिलाती है—कि निजी संबंधों में सावधानी और स्पष्टता भविष्य के विवादों से बचा सकती है।