धूम्रपान से जुड़ी बीमारी को सैन्य सेवा से नहीं जोड़ा जा सकता : सुप्रीम कोर्ट का विस्तृत फैसला और विकलांगता पेंशन दावों की कानूनी कसौटी
भारतीय न्यायपालिका ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि सशस्त्र बलों में सेवा करने मात्र से हर बीमारी को “सेवा-सम्बद्ध” नहीं माना जा सकता। हाल ही में Supreme Court of India ने सेना के एक पूर्व कर्मी की विकलांगता मुआवजा (डिसेबिलिटी पेंशन) संबंधी याचिका खारिज करते हुए कहा कि जिस बीमारी का प्रमुख कारण प्रतिदिन लगभग दस बीड़ी पीने की आदत थी, उसे सैन्य सेवा से उत्पन्न या उससे संबंधित नहीं माना जा सकता।
यह निर्णय केवल एक व्यक्तिगत दावे का निस्तारण नहीं है, बल्कि यह सशस्त्र बलों में विकलांगता पेंशन से जुड़े कानूनों, चिकित्सा साक्ष्यों की भूमिका, और व्यक्तिगत जिम्मेदारी के सिद्धांतों को विस्तार से स्पष्ट करता है।
प्रकरण की पृष्ठभूमि
पूर्व सैनिक ने दावा किया था कि उसे जो बीमारी हुई, वह उसकी सैन्य सेवा के दौरान उत्पन्न हुई और इसलिए उसे विकलांगता पेंशन का लाभ मिलना चाहिए। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में यह उल्लेख किया गया कि संबंधित बीमारी का मुख्य कारण लंबे समय तक धूम्रपान करना था—लगभग प्रतिदिन दस बीड़ी।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि सेना की कठिन तैनाती, सीमावर्ती इलाकों का तनावपूर्ण वातावरण और सेवा की परिस्थितियाँ ऐसी थीं जिनके कारण उसने धूम्रपान की आदत विकसित की या वह बढ़ती गई। इसलिए बीमारी को सेवा से जुड़ा माना जाना चाहिए।
सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि बीमारी और सैन्य कर्तव्यों के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध स्थापित नहीं होता। यह स्पष्ट रूप से जीवनशैली-आधारित रोग था।
अदालत का कानूनी विश्लेषण
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि विकलांगता पेंशन का लाभ तभी दिया जा सकता है जब यह सिद्ध हो कि बीमारी या चोट का सैन्य सेवा से सीधा या पर्याप्त संबंध है।
अदालत ने यह भी दोहराया कि “सेवा के दौरान” और “सेवा के कारण” (during service vs because of service) के बीच महत्वपूर्ण अंतर है। यदि कोई बीमारी सेवा काल में सामने आती है, तो यह पर्याप्त नहीं है; यह भी दिखाना आवश्यक है कि वह सेवा की प्रकृति से उत्पन्न हुई।
इस मामले में मेडिकल साक्ष्य निर्णायक रहे। मेडिकल बोर्ड ने स्पष्ट किया कि बीमारी का प्रमुख कारण तंबाकू सेवन था। अदालत ने कहा कि जब चिकित्सा रिपोर्ट स्पष्ट हो, तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विकलांगता पेंशन के सिद्धांत
सशस्त्र बलों के नियमों के अनुसार विकलांगता पेंशन के लिए तीन प्रमुख पहलू देखे जाते हैं:
- क्या बीमारी सेवा के दौरान हुई?
- क्या बीमारी का कारण सैन्य कर्तव्य था?
- क्या बीमारी स्थायी या गंभीर विकलांगता में परिणत हुई?
यदि इन प्रश्नों में से दूसरे का उत्तर नकारात्मक हो—यानी बीमारी का कारण सेवा न हो—तो पेंशन का दावा अस्वीकार किया जा सकता है।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि संदेह की स्थिति में सैनिक के पक्ष में निर्णय देने का सिद्धांत लागू होता है, परंतु जब कारण स्पष्ट रूप से व्यक्तिगत आदत हो, तब यह उदार दृष्टिकोण सीमित हो जाता है।
व्यक्तिगत आदत और राज्य की जिम्मेदारी
फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि अदालत ने धूम्रपान को एक स्वैच्छिक आदत माना।
याचिकाकर्ता ने यह तर्क दिया कि सेना के तनावपूर्ण वातावरण ने उसकी आदत को बढ़ाया। लेकिन अदालत ने कहा कि ऐसा कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो कि सैन्य अधिकारियों ने उसे धूम्रपान के लिए बाध्य किया या यह सेवा की अनिवार्य शर्त थी।
इस प्रकार, बीमारी के परिणामों की जिम्मेदारी व्यक्तिगत स्तर पर तय की गई।
पूर्व न्यायिक दृष्टिकोण से तुलना
सर्वोच्च न्यायालय ने अतीत में कई मामलों में सैनिकों के पक्ष में उदार व्याख्या की है। यदि बीमारी और सेवा के बीच संभावित संबंध हो, तो संदेह का लाभ सैनिक को दिया जाता है।
किन्तु इस मामले में मेडिकल रिकॉर्ड और विशेषज्ञ राय ने स्पष्ट रूप से धूम्रपान को कारण बताया। इसलिए अदालत ने कहा कि यहां उदारता का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता।
व्यापक प्रभाव और संदेश
यह फैसला भविष्य के विकलांगता पेंशन दावों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।
- मेडिकल बोर्ड की राय को अत्यधिक महत्व मिलेगा।
- जीवनशैली-आधारित बीमारियों में सेवा-सम्बंध सिद्ध करना कठिन होगा।
- “सेवा के दौरान” और “सेवा के कारण” के बीच अंतर और स्पष्ट होगा।
साथ ही, यह निर्णय सशस्त्र बलों में स्वास्थ्य जागरूकता के महत्व को भी उजागर करता है। धूम्रपान और तंबाकू सेवन से जुड़ी बीमारियाँ गंभीर हो सकती हैं, और उनका कानूनी प्रभाव भी पड़ सकता है।
नीति और प्रशासनिक दृष्टिकोण
इस निर्णय के बाद रक्षा मंत्रालय और संबंधित प्राधिकरण संभवतः मेडिकल बोर्ड की प्रक्रिया को और मजबूत करेंगे।
साथ ही, सैनिकों में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता कार्यक्रमों को बढ़ावा देने की आवश्यकता महसूस की जा सकती है, ताकि भविष्य में ऐसे विवाद कम हों।
निष्कर्ष : कानूनी स्पष्टता और संतुलन
सेना के पूर्व जवान की याचिका खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह सिद्धांत स्थापित किया है कि विकलांगता पेंशन के लिए बीमारी और सैन्य सेवा के बीच स्पष्ट कारणात्मक संबंध आवश्यक है।
यह फैसला न केवल कानून की व्याख्या को स्पष्ट करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि व्यक्तिगत आदतों के परिणामों को राज्य पर नहीं डाला जा सकता।
इस निर्णय से भविष्य में विकलांगता दावों की जांच अधिक सख्ती और पारदर्शिता से होने की संभावना है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया संतुलित और सुसंगत बनी रहेगी।