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‘वनशक्ति’ प्रकरण में पर्यावरणीय मंजूरी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ji की नाराज़गी

‘वनशक्ति’ प्रकरण में पर्यावरणीय मंजूरी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की नाराज़गी : विकास, पर्यावरण और न्यायिक संतुलन पर उठे प्रश्न

सोमवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने ‘वनशक्ति’ मामले में मई 2025 में दिए गए Supreme Court of India के निर्णय पर असंतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस फैसले ने “अनावश्यक रूप से अनिश्चितता” (uncertainty) पैदा कर दी है, क्योंकि इसमें वास्तविकता के बाद (post-facto) पर्यावरणीय मंजूरी पर रोक लगा दी गई थी।

यह टिप्पणी केवल एक मामले की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह पर्यावरणीय नियमन, औद्योगिक विकास और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं को लेकर व्यापक बहस को जन्म देती है।


‘वनशक्ति’ मामला क्या था?

‘वनशक्ति’ प्रकरण उन मामलों में से एक था, जिसमें यह प्रश्न उठा कि यदि किसी परियोजना ने बिना पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति के कार्य प्रारंभ कर दिया हो, तो क्या बाद में दी गई मंजूरी को वैध माना जा सकता है?

मई 2025 में सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने निर्णय दिया कि पर्यावरण संरक्षण कानूनों के तहत पूर्व अनुमति अनिवार्य है और बाद में दी गई स्वीकृति को सामान्य नियम के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह माना कि यदि परियोजनाओं को बाद में मंजूरी देकर नियमित कर दिया जाएगा, तो यह पर्यावरणीय कानूनों की भावना को कमजोर करेगा।


मुख्य न्यायाधीश की आपत्ति : अनिश्चितता का प्रश्न

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने संकेत दिया कि इस प्रकार का पूर्ण प्रतिबंध व्यावहारिक कठिनाइयाँ उत्पन्न कर सकता है।

उनके अनुसार, भारत जैसे विकासशील देश में अनेक परियोजनाएँ जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरती हैं। यदि हर तकनीकी चूक या विलंब को कठोर रूप से देखा जाए, तो इससे निवेश, अधोसंरचना और रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि न्यायिक निर्णयों का उद्देश्य संतुलन स्थापित करना होना चाहिए—न कि ऐसी स्थिति उत्पन्न करना जिससे व्यापक स्तर पर नीति-निर्माण और प्रशासनिक कार्य बाधित हो जाएँ।


पर्यावरणीय कानूनों की मूल भावना

भारत में पर्यावरण संरक्षण का ढाँचा मुख्यतः Environment (Protection) Act, 1986 और संबंधित अधिसूचनाओं पर आधारित है। इन नियमों के तहत किसी भी बड़ी औद्योगिक या आधारभूत संरचना परियोजना को शुरू करने से पहले पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) और मंजूरी आवश्यक होती है।

पूर्व स्वीकृति का सिद्धांत “precautionary principle” और “sustainable development” की अवधारणाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि परियोजना शुरू होने से पहले उसके संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का मूल्यांकन हो जाए।

मई 2025 के निर्णय में अदालत ने इसी सिद्धांत को प्राथमिकता दी थी।


विकास बनाम पर्यावरण : पुरानी बहस

यह विवाद भारत की न्यायिक और नीतिगत व्यवस्था में लंबे समय से चल रही बहस को फिर से सामने लाता है—क्या विकास परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाए या पर्यावरणीय संरक्षण को?

सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न मामलों में यह कहा है कि सतत विकास (sustainable development) का अर्थ है कि आर्थिक प्रगति और पर्यावरणीय सुरक्षा दोनों साथ-साथ चलें।

किन्तु जब पूर्व अनुमति के बिना शुरू हुई परियोजनाओं को बाद में मंजूरी देने का प्रश्न आता है, तो न्यायालय को यह तय करना होता है कि क्या इसे एक अपवाद के रूप में स्वीकार किया जाए या इसे पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया जाए।


प्रशासनिक व्यवहार्यता का प्रश्न

मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी इस ओर संकेत करती है कि न्यायालय को व्यावहारिक प्रशासनिक पहलुओं पर भी विचार करना चाहिए।

कई बार परियोजनाएँ ऐसे क्षेत्रों में प्रारंभ होती हैं जहाँ अनुमति प्रक्रिया लंबित रहती है या विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की कमी होती है। यदि बाद की मंजूरी को पूरी तरह अमान्य घोषित कर दिया जाए, तो इससे भारी आर्थिक नुकसान और कानूनी विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।

इसलिए न्यायिक दृष्टिकोण में लचीलापन (flexibility) और तथ्यों के आधार पर विवेकपूर्ण निर्णय आवश्यक हो सकता है।


न्यायिक अनुशासन और आंतरिक विमर्श

मुख्य न्यायाधीश की सार्वजनिक टिप्पणी यह भी दर्शाती है कि न्यायपालिका के भीतर भी विधिक व्याख्या को लेकर मतभेद संभव हैं।

भारतीय न्यायिक प्रणाली में विभिन्न पीठों द्वारा दिए गए निर्णय कभी-कभी अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। ऐसी स्थिति में बड़ी पीठ (larger bench) द्वारा स्पष्टता प्रदान की जाती है।

यदि ‘वनशक्ति’ मामले में उत्पन्न अनिश्चितता को दूर करने की आवश्यकता महसूस होती है, तो संभव है कि भविष्य में इस विषय पर व्यापक पीठ पुनर्विचार करे।


उद्योग और निवेश पर प्रभाव

पर्यावरणीय स्वीकृति से जुड़ी अनिश्चितता का सीधा प्रभाव निवेश वातावरण पर पड़ता है।

यदि कंपनियों को यह आशंका रहे कि किसी प्रशासनिक त्रुटि के कारण उनकी परियोजना पूरी तरह अवैध घोषित हो सकती है, तो वे निवेश के प्रति सतर्क रुख अपना सकती हैं।

दूसरी ओर, यदि नियमों में ढील दी जाए, तो पर्यावरणीय क्षति और सामाजिक विरोध की संभावना बढ़ सकती है।

इसलिए नीति-निर्माताओं और न्यायपालिका दोनों के लिए संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण कार्य है।


संभावित आगे की राह

मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी के बाद यह संभावना बनती है कि—

  • भविष्य में इस विषय पर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए जाएँ।
  • पोस्ट-फैक्टो मंजूरी को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के बजाय, विशेष परिस्थितियों में सशर्त अनुमति दी जाए।
  • प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से पूर्व स्वीकृति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और समयबद्ध बनाया जाए।

यदि अनुमति प्रक्रिया तेज और स्पष्ट हो, तो बाद की मंजूरी की आवश्यकता स्वतः कम हो जाएगी।


निष्कर्ष : संतुलन की खोज

‘वनशक्ति’ मामले में मई 2025 के निर्णय और उस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि पर्यावरणीय कानूनों की व्याख्या केवल विधिक प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक नीति का भी विषय है।

सर्वोच्च न्यायालय का मूल दायित्व संविधान और कानून की रक्षा करना है, परंतु उसे यह भी सुनिश्चित करना होता है कि उसके निर्णय व्यावहारिक और संतुलित हों।

इस प्रकरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पर्यावरणीय स्वीकृति जैसे संवेदनशील विषयों पर स्पष्टता और स्थिरता अत्यंत आवश्यक है। आने वाले समय में न्यायपालिका और सरकार दोनों से यह अपेक्षा रहेगी कि वे ऐसा ढाँचा विकसित करें, जो विकास और पर्यावरण—दोनों के हितों की समान रूप से रक्षा कर सके।