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न्यायालय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दुरुपयोग : फर्जी उद्धरणों वाले एआई-निर्मित याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय की गंभीर चेतावनी

न्यायालय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दुरुपयोग : फर्जी उद्धरणों वाले एआई-निर्मित याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय की गंभीर चेतावनी

भारत की न्यायिक व्यवस्था में तकनीक का प्रवेश अब अपरिहार्य हो चुका है। ई-कोर्ट्स, डिजिटल फाइलिंग और वर्चुअल सुनवाई ने न्याय प्रक्रिया को अधिक सुलभ और तीव्र बनाया है। किंतु तकनीकी सुविधाओं के साथ जोखिम भी आते हैं। हाल ही में Supreme Court of India ने एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान यह गंभीर चिंता व्यक्त की कि कुछ अधिवक्ता कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) से तैयार की गई याचिकाएँ न्यायालय में प्रस्तुत कर रहे हैं, जिनमें ऐसे न्यायिक निर्णयों के उद्धरण दिए गए हैं जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं हैं।

यह टिप्पणी केवल एक प्रक्रियात्मक त्रुटि पर नाराजगी नहीं थी, बल्कि न्यायिक ईमानदारी और पेशेवर नैतिकता से जुड़े एक व्यापक संकट की ओर संकेत थी। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि फर्जी या काल्पनिक निर्णयों का उल्लेख न्यायिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ है और इससे न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।


एआई का उभार और विधि व्यवसाय

पिछले कुछ वर्षों में एआई आधारित उपकरणों ने विधि पेशे में उल्लेखनीय स्थान बना लिया है। शोध, ड्राफ्टिंग, केस लॉ की खोज और तर्क संरचना जैसे कार्य अब कुछ ही मिनटों में संभव हो जाते हैं। इससे अधिवक्ताओं का समय बचता है और कार्यकुशलता बढ़ती है।

लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब अधिवक्ता इन उपकरणों पर अंधविश्वास कर लेते हैं। एआई मॉडल कभी-कभी “हैलुसिनेशन” (hallucination) की स्थिति में ऐसे निर्णयों, उद्धरणों या कानूनी सिद्धांतों का निर्माण कर देते हैं, जो वास्तविक नहीं होते। यदि अधिवक्ता बिना सत्यापन के इन्हें न्यायालय में प्रस्तुत कर दें, तो यह न केवल पेशेवर लापरवाही है, बल्कि न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास भी माना जा सकता है।


न्यायालय की टिप्पणी : अतिरिक्त दायित्व का संकेत

सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि तकनीक का उपयोग करना गलत नहीं है; बल्कि आधुनिक युग में यह स्वाभाविक है। परंतु तकनीक का उपयोग करते समय अधिवक्ताओं की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

न्यायालय ने कहा कि यदि कोई याचिका एआई की सहायता से तैयार की गई है, तो अधिवक्ता का यह कर्तव्य है कि वह उसमें दिए गए प्रत्येक उद्धरण और तथ्य की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करे। फर्जी निर्णयों का उल्लेख न्यायालय के समय की बर्बादी है और न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा के विपरीत है।

यह टिप्पणी भारतीय बार के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है कि एआई सुविधा का विकल्प हो सकता है, लेकिन उत्तरदायित्व का स्थानापन्न नहीं।


पेशेवर नैतिकता और अधिवक्ता का कर्तव्य

भारतीय विधि व्यवस्था में अधिवक्ताओं पर उच्च स्तर की नैतिक अपेक्षाएँ रखी जाती हैं। अधिवक्ता केवल अपने मुवक्किल का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि न्यायालय का अधिकारी (officer of the court) भी होता है।

यदि वह जानबूझकर या लापरवाहीवश गलत उद्धरण प्रस्तुत करता है, तो यह न केवल उसके मुवक्किल के हितों को नुकसान पहुँचा सकता है, बल्कि न्यायालय की निष्पक्षता को भी प्रभावित कर सकता है।

फर्जी केस लॉ का उल्लेख न्यायिक व्यवस्था के लिए गंभीर समस्या है, क्योंकि न्यायाधीश अपने निर्णयों में पूर्ववर्ती निर्णयों पर भरोसा करते हैं। यदि आधार ही गलत हो, तो न्याय का परिणाम भी विकृत हो सकता है।


वैश्विक परिप्रेक्ष्य

यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका और अन्य देशों में भी ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहाँ अधिवक्ताओं ने एआई द्वारा उत्पन्न काल्पनिक मामलों का हवाला दिया। कुछ मामलों में न्यायालयों ने संबंधित वकीलों पर जुर्माना भी लगाया।

भारत में सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी संकेत देती है कि न्यायपालिका इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है और भविष्य में यदि ऐसी घटनाएँ दोहराई जाती हैं, तो कड़ी कार्रवाई संभव है।


तकनीक बनाम सत्यापन : संतुलन की आवश्यकता

तकनीकी प्रगति को रोका नहीं जा सकता, और न ही ऐसा करना वांछनीय है। एआई शोध और ड्राफ्टिंग को अधिक व्यवस्थित बना सकता है। किंतु हर तकनीकी साधन की अपनी सीमाएँ होती हैं।

अधिवक्ता को चाहिए कि—

  1. हर उद्धरण को आधिकारिक डेटाबेस से सत्यापित करे।
  2. केस लॉ के पैराग्राफ और संदर्भ की पुष्टि करे।
  3. यदि एआई की सहायता ली गई हो, तो भी अंतिम जिम्मेदारी स्वयं स्वीकार करे।

न्यायालय ने मूलतः यही संदेश दिया कि सुविधा और जिम्मेदारी साथ-साथ चलनी चाहिए।


न्यायिक व्यवस्था पर संभावित प्रभाव

यदि एआई-निर्मित फर्जी उद्धरणों की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो न्यायालयों को अतिरिक्त समय शोध और सत्यापन में लगाना पड़ेगा। इससे मामलों के निपटान में देरी हो सकती है।

इसके अतिरिक्त, न्यायालय का विश्वास अधिवक्ताओं की विश्वसनीयता पर आधारित होता है। यदि वह विश्वास कमजोर पड़ता है, तो न्यायिक प्रक्रिया की मूल संरचना प्रभावित हो सकती है।

इसलिए यह मुद्दा केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की आधारभूत विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है।


बार काउंसिल और संस्थागत भूमिका

इस संदर्भ में Bar Council of India की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। पेशेवर आचरण के मानकों को बनाए रखना और अधिवक्ताओं को तकनीकी उपयोग के संबंध में मार्गदर्शन देना आवश्यक है।

संभव है कि भविष्य में बार काउंसिल या न्यायालय एआई उपयोग के लिए आचार संहिता जारी करें, जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि—

  • एआई से प्राप्त सामग्री का सत्यापन अनिवार्य होगा।
  • जानबूझकर फर्जी उद्धरण प्रस्तुत करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।

न्यायपालिका का संतुलित दृष्टिकोण

यह उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय ने एआई के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात नहीं कही। उसने केवल यह रेखांकित किया कि एआई सहायता का अर्थ यह नहीं कि अधिवक्ता अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाए।

न्यायालय का यह दृष्टिकोण तकनीकी प्रगति के प्रति सकारात्मक है, किंतु साथ ही वह नैतिक और पेशेवर मानकों की रक्षा के प्रति सजग भी है।

यह संतुलन भारतीय न्यायिक परंपरा की परिपक्वता को दर्शाता है।


निष्कर्ष : भविष्य की राह

कृत्रिम बुद्धिमत्ता विधि पेशे का भविष्य बदल सकती है। शोध की गति बढ़ेगी, दस्तावेज़ीकरण सरल होगा और विश्लेषण अधिक व्यापक हो सकेगा। किंतु यदि इसका उपयोग लापरवाही से किया गया, तो यह न्याय व्यवस्था के लिए चुनौती भी बन सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। यह अधिवक्ताओं को स्मरण कराती है कि तकनीक सहायक हो सकती है, परंतु सत्यापन और नैतिक उत्तरदायित्व का दायित्व अंततः मनुष्य का ही है।

न्याय व्यवस्था का आधार सत्य, विश्वास और निष्पक्षता है। यदि इन स्तंभों को कमजोर किया गया, तो केवल एक मामला नहीं, बल्कि समूची प्रणाली प्रभावित होगी।

इसलिए आवश्यक है कि विधि समुदाय तकनीकी सुविधा को अपनाते हुए भी पेशेवर ईमानदारी और संवैधानिक मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दे। तभी न्याय और तकनीक का यह संगम भारतीय लोकतंत्र को सशक्त बनाएगा, न कि उसे संकट में डालेगा।