हेमंत बिस्वा सरमा के विरुद्ध कथित ‘हेट स्पीच’ याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी : संवैधानिक नैतिकता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायिक संयम का संतुलन
भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उससे जुड़ी सीमाओं पर बहस कोई नई नहीं है। समय-समय पर न्यायालयों को यह तय करना पड़ता है कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय व्यक्तियों द्वारा दिए गए वक्तव्य कब संविधान द्वारा संरक्षित स्वतंत्रता की सीमा में आते हैं और कब वे दंडनीय “हेट स्पीच” की श्रेणी में चले जाते हैं। हाल ही में Supreme Court of India में Himanta Biswa Sarma (हेमंत बिस्वा सरमा) के कथित ‘हेट स्पीच’ से संबंधित याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायालय की टिप्पणियों ने इस बहस को एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है।
इस मामले में न्यायालय ने याचिकाकर्ता को यह सुझाव दिया कि याचिका को किसी एक व्यक्ति को केंद्र में रखकर नहीं, बल्कि व्यापक सिद्धांत और संवैधानिक दायित्व के संदर्भ में पुनर्गठित (reframe) किया जाए। न्यायालय ने “संवैधानिक नैतिकता” (constitutional morality) के महत्व पर बल देते हुए यह संकेत दिया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में भाषण और राजनीतिक मतभेदों का समाधान केवल दंडात्मक कार्रवाई से नहीं, बल्कि संस्थागत संतुलन और जिम्मेदार सार्वजनिक संवाद से भी जुड़ा है।
पृष्ठभूमि : याचिका का स्वरूप और आरोप
याचिका में आरोप लगाया गया कि असम के मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए कुछ सार्वजनिक वक्तव्य ऐसे थे जो कथित रूप से एक विशेष समुदाय या वर्ग के प्रति घृणा को बढ़ावा देते हैं। याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय से मांग की कि ऐसे भाषणों पर रोक लगाने और आवश्यक दंडात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए जाएं।
हालांकि, सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यदि याचिका का उद्देश्य केवल किसी विशेष राजनीतिक व्यक्ति को निशाना बनाना है, तो वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के लिए उपयुक्त आधार नहीं हो सकता। न्यायालय ने संकेत दिया कि प्रश्न को व्यापक रूप से—“हेट स्पीच की रोकथाम के लिए संस्थागत तंत्र और संवैधानिक मानदंड”—के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
संवैधानिक ढांचा : अनुच्छेद 19 और उसकी सीमाएँ
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। यह लोकतंत्र का प्राणतत्व है। किंतु यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है। अनुच्छेद 19(2) के तहत राज्य सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार, नैतिकता, राज्य की सुरक्षा, मानहानि, न्यायालय की अवमानना आदि आधारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगा सकता है।
हेट स्पीच के संदर्भ में दंड संहिता की विभिन्न धाराएँ लागू हो सकती हैं, जैसे—धर्म, जाति या भाषा के आधार पर वैमनस्य फैलाने से संबंधित प्रावधान। लेकिन न्यायालय ने पूर्व में यह भी कहा है कि हर तीखा या विवादास्पद वक्तव्य स्वतः “हेट स्पीच” नहीं बन जाता।
यही वह बिंदु है जहाँ न्यायिक विवेक और संवैधानिक नैतिकता की कसौटी सामने आती है।
संवैधानिक नैतिकता : एक मार्गदर्शक सिद्धांत
“संवैधानिक नैतिकता” शब्दावली भारतीय न्यायशास्त्र में विशेष महत्व रखती है। इसका अर्थ केवल संविधान के अक्षर का पालन नहीं, बल्कि उसके मूल्यों—समानता, बंधुता, धर्मनिरपेक्षता और गरिमा—का सम्मान भी है।
न्यायालय ने इस मामले में यह संकेत दिया कि राजनीतिक नेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने भाषणों में इन मूल्यों का ध्यान रखें। लोकतांत्रिक विमर्श में असहमति स्वाभाविक है, परंतु वह गरिमा और संयम की सीमा में रहनी चाहिए।
यह टिप्पणी केवल संबंधित मामले तक सीमित नहीं, बल्कि समूचे राजनीतिक वर्ग के लिए एक संदेश के रूप में देखी जा रही है।
व्यक्तिगत लक्ष्य बनाम संस्थागत सुधार
न्यायालय की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी यह थी कि याचिका को किसी एक व्यक्ति के विरुद्ध निर्देश प्राप्त करने के बजाय, व्यापक दिशा-निर्देशों या नीति सुधार के रूप में प्रस्तुत किया जाए।
यह दृष्टिकोण न्यायिक संयम (judicial restraint) की परंपरा से जुड़ा है। न्यायालय आमतौर पर प्रत्यक्ष आपराधिक जांच या अभियोजन की निगरानी तभी करता है जब मौजूदा तंत्र विफल हो चुका हो।
यदि याचिकाकर्ता यह दिखा सकें कि हेट स्पीच के मामलों में कानून का क्रियान्वयन प्रणालीगत रूप से कमजोर है, तो न्यायालय नीति-स्तर पर दिशानिर्देश जारी कर सकता है। किंतु किसी विशिष्ट नेता के विरुद्ध सीधी कार्रवाई का आदेश देना सामान्यतः कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।
पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांत
भारत में हेट स्पीच से संबंधित कई मामलों में न्यायालय ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है।
एक ओर न्यायालय ने यह माना है कि घृणा फैलाने वाले भाषण सामाजिक सद्भाव को क्षति पहुँचाते हैं और संविधान के मूल ढांचे के विपरीत हैं। दूसरी ओर, उसने यह भी दोहराया है कि राजनीतिक भाषणों को व्यापक संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए और केवल चयनित अंशों के आधार पर दंडात्मक निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए।
इस संतुलन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनावश्यक अंकुश न लगे, परंतु समाज में वैमनस्य फैलाने वाली गतिविधियों को भी प्रोत्साहन न मिले।
लोकतांत्रिक विमर्श और राजनीतिक उत्तरदायित्व
लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च है। राजनीतिक नेताओं के वक्तव्यों का अंतिम मूल्यांकन मतदाता करते हैं। परंतु जब भाषण सामाजिक शांति को प्रभावित करते हैं, तब राज्य और न्यायपालिका की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
इस संदर्भ में न्यायालय की टिप्पणी—कि याचिका को व्यापक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया जाए—यह संकेत देती है कि समस्या केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति और सार्वजनिक संवाद की गुणवत्ता से जुड़ी है।
यदि न्यायालय इस विषय पर व्यापक दिशानिर्देश जारी करता है, तो उसका प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर दिखाई दे सकता है।
न्यायपालिका की सीमाएँ और जिम्मेदारियाँ
यह भी ध्यान देने योग्य है कि न्यायपालिका नीति-निर्माता नहीं है। उसका दायित्व संविधान की व्याख्या और संरक्षण करना है।
यदि हर राजनीतिक बयान पर सर्वोच्च न्यायालय से प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की अपेक्षा की जाए, तो यह लोकतांत्रिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है। इसलिए न्यायालय ने याचिकाकर्ता को यह संकेत दिया कि समस्या का समाधान संस्थागत ढांचे के माध्यम से खोजा जाए।
यह दृष्टिकोण न्यायिक सक्रियता और न्यायिक संयम के बीच संतुलन का उदाहरण है।
संभावित परिणाम और आगे की दिशा
यदि याचिका पुनर्गठित होकर व्यापक सिद्धांतों के रूप में प्रस्तुत की जाती है, तो न्यायालय निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार कर सकता है—
- हेट स्पीच की परिभाषा को अधिक स्पष्ट करना।
- कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए दिशानिर्देश तय करना।
- राजनीतिक दलों की आचार संहिता को मजबूत करने पर विचार।
- चुनावी संदर्भ में भाषणों के नियमन के लिए निर्वाचन आयोग की भूमिका।
इस प्रकार, मामला केवल एक राजनीतिक विवाद न रहकर संवैधानिक सिद्धांतों की व्याख्या का अवसर बन सकता है।
निष्कर्ष : संविधान की आत्मा का प्रश्न
हेमंत बिस्वा सरमा से संबंधित कथित हेट स्पीच याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी केवल एक प्रक्रियात्मक निर्देश नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की पुनर्स्मृति है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का मूल है, किंतु वह जिम्मेदारी के साथ जुड़ी है। जब सार्वजनिक पद पर आसीन व्यक्ति वक्तव्य देते हैं, तो उनके शब्दों का प्रभाव व्यापक होता है।
न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि किसी एक व्यक्ति को लक्ष्य बनाकर दंडात्मक आदेश की अपेक्षा करने के बजाय, संवैधानिक नैतिकता और संस्थागत सुधार की दिशा में सोचने की आवश्यकता है।
इस प्रकरण ने एक बार फिर यह रेखांकित किया है कि भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका केवल विवाद निपटाने वाली संस्था नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा की संरक्षक भी है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि याचिकाकर्ता अपने तर्कों को किस रूप में प्रस्तुत करते हैं और न्यायालय इस संवेदनशील विषय पर किस प्रकार का अंतिम दृष्टिकोण अपनाता है। परंतु इतना स्पष्ट है कि यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक उत्तरदायित्व और संवैधानिक नैतिकता के त्रिकोण में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज होगा।