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मानव अधिकारों की उत्पत्ति, विकास और क्रमिक उत्क्रांति :

मानव अधिकारों की उत्पत्ति, विकास और क्रमिक उत्क्रांति : एक ऐतिहासिक एवं वैचारिक विश्लेषण

     मानव अधिकार (Human Rights) आधुनिक विधि-विचार का केंद्रीय तत्व हैं, किंतु उनकी अवधारणा अचानक उत्पन्न नहीं हुई। यह एक दीर्घ ऐतिहासिक, दार्शनिक और राजनीतिक प्रक्रिया का परिणाम है। मानव अधिकारों का मूल विचार इस धारणा पर आधारित है कि प्रत्येक व्यक्ति केवल मानव होने के कारण कुछ मौलिक अधिकारों का अधिकारी है। ये अधिकार राज्य द्वारा प्रदत्त नहीं, बल्कि जन्मसिद्ध माने जाते हैं। समय के साथ इन अधिकारों की प्रकृति, दायरा और प्रवर्तन-प्रणाली विकसित होती गई। इस निबंध में मानव अधिकारों की उत्पत्ति, उनके ऐतिहासिक विकास और समकालीन स्वरूप का क्रमबद्ध विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है।


1. प्राचीन काल में मानव अधिकारों की अवधारणा

मानव अधिकारों की जड़ें प्राचीन सभ्यताओं में मिलती हैं। यद्यपि उस समय “मानव अधिकार” शब्द का प्रयोग नहीं होता था, फिर भी न्याय, समानता और मानवीय गरिमा के सिद्धांत विद्यमान थे।

यूनानी दर्शन में Plato और Aristotle ने न्याय और नैतिकता पर विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने राज्य को नैतिक जीवन की प्राप्ति का साधन माना। यद्यपि दास प्रथा प्रचलित थी, फिर भी ‘न्याय’ को एक सार्वभौमिक मूल्य के रूप में स्वीकार किया गया।

रोमन विधि में ‘जुस नैचुराले’ (Jus Naturale) या प्राकृतिक विधि का सिद्धांत विकसित हुआ, जिसके अनुसार कुछ नियम प्रकृति द्वारा निर्धारित हैं और सभी मनुष्यों पर समान रूप से लागू होते हैं। रोमन विधिवेत्ताओं ने विधि के सार्वभौमिक स्वरूप को रेखांकित किया।

भारत में वैदिक और उपनिषदिक परंपरा में “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना मानव गरिमा और समानता की ओर संकेत करती है। बौद्ध और जैन दर्शन ने अहिंसा, करुणा और समानता का संदेश दिया। मौर्य सम्राट अशोक के शिलालेख धार्मिक सहिष्णुता और प्रजा-कल्याण की नीति का उदाहरण हैं।


2. मध्यकालीन विकास : सीमित राजसत्ता की शुरुआत

मध्यकाल में राजाओं की निरंकुश सत्ता के विरुद्ध कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज सामने आए, जिन्होंने मानव अधिकारों के विकास में मील का पत्थर का कार्य किया।

Magna Carta (1215)

इंग्लैंड के राजा जॉन को सामंतों ने 1215 में मैग्ना कार्टा पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया। इस दस्तावेज ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि राजा भी विधि से ऊपर नहीं है। इसमें विधिसम्मत प्रक्रिया (due process of law) और करारोपण में सहमति जैसे सिद्धांत शामिल थे। यद्यपि यह अधिकार केवल सामंत वर्ग तक सीमित थे, फिर भी यह निरंकुश सत्ता पर नियंत्रण की दिशा में प्रथम कदम था।

इसके बाद 1628 का Petition of Right और 1689 का Bill of Rights इंग्लैंड में संसदीय सर्वोच्चता और नागरिक स्वतंत्रताओं की स्थापना की दिशा में महत्वपूर्ण रहे।


3. प्राकृतिक अधिकार सिद्धांत और प्रबोधन युग

17वीं और 18वीं शताब्दी में यूरोप में प्रबोधन (Enlightenment) का दौर आया। इस काल में प्राकृतिक अधिकार सिद्धांत ने मानव अधिकारों को दार्शनिक आधार प्रदान किया।

John Locke ने जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति को प्राकृतिक अधिकार बताया। उनके अनुसार राज्य का निर्माण इन अधिकारों की रक्षा के लिए हुआ है; यदि राज्य इनकी रक्षा करने में विफल रहता है, तो जनता को विद्रोह का अधिकार है।

Jean-Jacques Rousseau ने सामाजिक संविदा (Social Contract) का सिद्धांत प्रस्तुत किया और जनसत्ता (popular sovereignty) पर बल दिया।

Thomas Paine ने ‘Rights of Man’ में मानव अधिकारों को सार्वभौमिक और अविच्छिन्न बताया।


4. अमेरिकी और फ्रांसीसी क्रांतियाँ : व्यावहारिक रूपांतरण

American Revolution

1776 की अमेरिकी स्वतंत्रता घोषणा में यह घोषित किया गया कि “सभी मनुष्य समान पैदा हुए हैं” और उन्हें जीवन, स्वतंत्रता और सुख की खोज के अधिकार प्राप्त हैं। यह घोषणा प्राकृतिक अधिकार सिद्धांत का राजनीतिक रूपांतरण थी।

French Revolution

1789 की फ्रांसीसी क्रांति ने ‘Declaration of the Rights of Man and of the Citizen’ के माध्यम से स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों को स्थापित किया। यह घोषणा सार्वभौमिकता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम थी, यद्यपि व्यवहार में महिलाओं और उपनिवेशों के लोगों को तत्काल समान अधिकार नहीं मिले।


5. उन्नीसवीं शताब्दी : सामाजिक अधिकारों का उदय

औद्योगिक क्रांति के बाद श्रमिकों के शोषण ने मानव अधिकारों की अवधारणा को नई दिशा दी। अब केवल नागरिक और राजनीतिक अधिकार पर्याप्त नहीं माने गए।

Karl Marx ने आर्थिक असमानता की आलोचना की और सामाजिक-आर्थिक अधिकारों पर बल दिया। श्रम कानूनों, न्यूनतम मजदूरी, कार्य-घंटों की सीमा और ट्रेड यूनियन अधिकारों का विकास इसी काल में हुआ।

दास प्रथा उन्मूलन आंदोलन, महिला मताधिकार आंदोलन और शिक्षा के अधिकार की मांग ने मानव अधिकारों को व्यापक स्वरूप दिया।


6. बीसवीं शताब्दी : अंतर्राष्ट्रीयकरण और संस्थागत विकास

दो विश्व युद्धों की त्रासदी ने मानव अधिकारों को वैश्विक विमर्श का विषय बना दिया।

United Nations की स्थापना (1945)

संयुक्त राष्ट्र चार्टर में मानव अधिकारों के सम्मान और संरक्षण का उद्देश्य स्पष्ट रूप से उल्लेखित है।

Universal Declaration of Human Rights (1948)

10 दिसंबर 1948 को महासभा ने सार्वभौमिक मानव अधिकार घोषणा को स्वीकार किया। इसमें 30 अनुच्छेदों के माध्यम से नागरिक, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों को मान्यता दी गई। यह विधिक रूप से बाध्यकारी नहीं था, किंतु इसने अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार कानून की नींव रखी।

इसके पश्चात 1966 में दो महत्वपूर्ण वाचाएँ अस्तित्व में आईं—

  1. नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय वाचा (ICCPR)
  2. आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय वाचा (ICESCR)

इनके साथ मानव अधिकारों का विधिक रूप सुदृढ़ हुआ।


7. भारत में मानव अधिकारों का विकास

भारत में स्वतंत्रता आंदोलन स्वयं मानव अधिकारों की मांग पर आधारित था। महात्मा गांधी ने सत्य, अहिंसा और समानता का संदेश दिया।

1950 में लागू Constitution of India ने मौलिक अधिकारों (भाग III) को संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया। समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धर्म की स्वतंत्रता, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार और संवैधानिक उपचार का अधिकार भारतीय मानव अधिकार ढांचे की आधारशिला हैं।

इसके अतिरिक्त 1993 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की स्थापना ने संस्थागत तंत्र को मजबूत किया।


8. समकालीन विकास : तीसरी और चौथी पीढ़ी के अधिकार

मानव अधिकारों का विकास “पीढ़ियों” में भी समझा जाता है—

  1. प्रथम पीढ़ी – नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार (स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति, मतदान)
  2. द्वितीय पीढ़ी – सामाजिक एवं आर्थिक अधिकार (शिक्षा, स्वास्थ्य, कार्य)
  3. तृतीय पीढ़ी – सामूहिक अधिकार (विकास का अधिकार, पर्यावरण का अधिकार, शांति का अधिकार)
  4. चतुर्थ पीढ़ी – डिजिटल अधिकार, गोपनीयता, जैव-नैतिक अधिकार

आज के युग में डेटा संरक्षण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव-प्रौद्योगिकी और पर्यावरणीय संकट ने मानव अधिकारों की अवधारणा को और जटिल बना दिया है।


निष्कर्ष

मानव अधिकारों का विकास एक सतत ऐतिहासिक प्रक्रिया है, जो प्राचीन नैतिक विचारों से प्रारंभ होकर आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय विधि तक पहुंची है। यह विकास निरंतर संघर्ष, क्रांति, दार्शनिक चिंतन और वैश्विक सहयोग का परिणाम है। प्रारंभ में यह अवधारणा सीमित वर्गों तक थी, किंतु समय के साथ यह सार्वभौमिक और अविच्छिन्न अधिकारों में परिवर्तित हुई। आज मानव अधिकार न केवल राज्य के आंतरिक विधि-व्यवस्था का हिस्सा हैं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय शांति और न्याय की आधारशिला भी हैं।

फिर भी चुनौतियाँ बनी हुई हैं—आतंकवाद, युद्ध, असमानता, जलवायु परिवर्तन और तकनीकी दुरुपयोग जैसे मुद्दे मानव अधिकारों की रक्षा के लिए नई रणनीतियों की मांग करते हैं। अतः मानव अधिकारों का विकास केवल ऐतिहासिक अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की नैतिक तथा विधिक प्रतिबद्धता का प्रश्न है।