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मानवाधिकार की परिभाषा तथा उनसे संबंधित प्रमुख सिद्धांतों

मानवाधिकार की परिभाषा तथा उनसे संबंधित प्रमुख सिद्धांतों का विस्तृत विवेचन

प्रस्तावना

मानवाधिकार आधुनिक विधि और राजनीति विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है। यह केवल कानूनी अधिकारों का विषय नहीं है, बल्कि मानव की गरिमा, स्वतंत्रता और समानता से जुड़ा मूलभूत प्रश्न है। इतिहास के विभिन्न चरणों में मनुष्य ने दासता, शोषण, उपनिवेशवाद, नस्लभेद, लैंगिक असमानता और निरंकुश शासन के विरुद्ध संघर्ष किया। इन संघर्षों के परिणामस्वरूप मानवाधिकारों की अवधारणा विकसित हुई और अंततः द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इसे वैश्विक स्तर पर स्वीकृति मिली।

United Nations द्वारा 1945 में स्थापना के पश्चात मानवाधिकारों की रक्षा को वैश्विक प्राथमिकता बनाया गया। 10 दिसंबर 1948 को Universal Declaration of Human Rights (UDHR) को स्वीकार किया गया, जिसने मानवाधिकारों की सार्वभौमिक अवधारणा को स्पष्ट स्वरूप प्रदान किया।


मानवाधिकार की परिभाषा

मानवाधिकार वे अधिकार हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को केवल मानव होने के नाते प्राप्त होते हैं। ये अधिकार जन्मसिद्ध, अविच्छिन्न (inalienable), सार्वभौमिक (universal) और समान (equal) होते हैं। इनका उद्देश्य व्यक्ति की गरिमा (dignity), स्वतंत्रता (liberty), समानता (equality) और न्याय (justice) की रक्षा करना है।

मानवाधिकारों में जीवन का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शिक्षा का अधिकार, समान अवसर का अधिकार, शोषण से मुक्ति, धार्मिक स्वतंत्रता आदि सम्मिलित हैं।

भारत में मानवाधिकारों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। Constitution of India के भाग-III में मूल अधिकारों (Fundamental Rights) का उल्लेख है, जो मानवाधिकारों का ही संवैधानिक रूप हैं।


मानवाधिकारों की विशेषताएँ

  1. सार्वभौमिकता – ये अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के प्राप्त हैं।
  2. अविच्छिन्नता – इन्हें छीना नहीं जा सकता, सिवाय विधिसम्मत प्रक्रिया के।
  3. अखंडता और पारस्परिकता – सभी अधिकार एक-दूसरे से जुड़े हैं।
  4. समानता – सभी व्यक्तियों को समान अधिकार प्राप्त हैं।

मानवाधिकारों से संबंधित प्रमुख सिद्धांत

मानवाधिकारों की उत्पत्ति और औचित्य को स्पष्ट करने के लिए विभिन्न सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं। इनमें प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं:


1. प्राकृतिक अधिकार सिद्धांत (Natural Rights Theory)

यह सिद्धांत मानवाधिकारों का सबसे प्राचीन और प्रभावशाली सिद्धांत है। इसके अनुसार मानवाधिकार प्रकृति द्वारा प्रदत्त हैं और राज्य से पूर्व अस्तित्व में हैं।

इस सिद्धांत के प्रमुख समर्थक John Locke, Jean-Jacques Rousseau और Thomas Hobbes थे।

जॉन लॉक ने जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति को प्राकृतिक अधिकार माना। उनका मत था कि राज्य का गठन इन अधिकारों की रक्षा के लिए हुआ है; यदि राज्य इनकी रक्षा में विफल हो जाए तो जनता को विद्रोह का अधिकार है।

आलोचना

  • यह सिद्धांत अत्यधिक आदर्शवादी माना जाता है।
  • “प्राकृतिक” शब्द की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई।
  • विभिन्न दार्शनिकों ने प्राकृतिक अधिकारों की अलग-अलग सूची प्रस्तुत की।

फिर भी, आधुनिक मानवाधिकारों की नींव इसी सिद्धांत पर आधारित है।


2. वैधानिक या विधिक अधिकार सिद्धांत (Legal Theory of Rights)

इस सिद्धांत के अनुसार अधिकार केवल राज्य द्वारा निर्मित और मान्यता प्राप्त होने पर ही अस्तित्व में आते हैं।

इस सिद्धांत के प्रमुख समर्थक John Austin थे। उनके अनुसार अधिकार राज्य की संप्रभु सत्ता द्वारा प्रदत्त आदेशों से उत्पन्न होते हैं।

इस दृष्टिकोण में मानवाधिकारों को संवैधानिक या विधिक अधिकारों के रूप में देखा जाता है। उदाहरण के लिए, भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार तभी लागू होते हैं जब वे संविधान में लिखित हों।

आलोचना

  • यदि राज्य ही अधिकारों का स्रोत है, तो निरंकुश राज्य नागरिकों को अधिकारों से वंचित कर सकता है।
  • यह सिद्धांत नैतिक आधार की उपेक्षा करता है।

3. ऐतिहासिक सिद्धांत (Historical Theory)

इस सिद्धांत के अनुसार अधिकार परंपराओं, रीति-रिवाजों और ऐतिहासिक विकास का परिणाम हैं।

इस सिद्धांत के प्रमुख समर्थक Edmund Burke थे। उनका मानना था कि अधिकार समाज की ऐतिहासिक परंपराओं से विकसित होते हैं, न कि किसी अमूर्त प्राकृतिक सिद्धांत से।

विशेषताएँ

  • अधिकार समाज की सामूहिक चेतना से उत्पन्न होते हैं।
  • यह सिद्धांत परंपरा को महत्व देता है।

आलोचना

  • यदि परंपराएँ अन्यायपूर्ण हों तो?
  • दासता और जातीय भेदभाव भी कभी परंपरा का हिस्सा रहे हैं।

4. सामाजिक अनुबंध सिद्धांत (Social Contract Theory)

यह सिद्धांत बताता है कि मानवाधिकार राज्य और नागरिकों के बीच एक अनुबंध का परिणाम हैं।

Thomas Hobbes, John Locke और Jean-Jacques Rousseau इस सिद्धांत के प्रमुख प्रतिपादक थे।

हॉब्स के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में जीवन “एकाकी, निर्धन, क्रूर और अल्पकालिक” था, इसलिए लोग सुरक्षा हेतु राज्य को अधिकार सौंपते हैं।
लॉक ने कहा कि लोग अपने प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा के लिए राज्य बनाते हैं।
रूसो ने सामान्य इच्छा (General Will) को सर्वोपरि माना।

महत्व

  • आधुनिक लोकतंत्र की आधारशिला।
  • संवैधानिक शासन की वैचारिक पृष्ठभूमि।

5. मार्क्सवादी सिद्धांत (Marxist Theory)

मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार मानवाधिकार पूंजीवादी व्यवस्था का उपकरण हैं।

Karl Marx ने कहा कि तथाकथित “अधिकार” वास्तव में आर्थिक असमानता को बनाए रखने के साधन हैं। उनके अनुसार वास्तविक स्वतंत्रता तभी संभव है जब वर्गहीन समाज की स्थापना हो।

विशेषताएँ

  • आर्थिक और सामाजिक अधिकारों पर बल।
  • समानता को प्राथमिकता।

आलोचना

  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता की उपेक्षा।
  • साम्यवादी शासन में अक्सर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित रही।

6. नैतिक सिद्धांत (Moral Theory)

यह सिद्धांत मानवाधिकारों को नैतिक मूल्यों पर आधारित मानता है।

इस दृष्टिकोण के अनुसार मानवाधिकार मानव की गरिमा (human dignity) से उत्पन्न होते हैं। यह सिद्धांत UDHR की दार्शनिक पृष्ठभूमि प्रदान करता है।

इसमें मानवाधिकारों को केवल कानूनी ही नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व के रूप में भी देखा जाता है।


7. उपयोगितावादी सिद्धांत (Utilitarian Theory)

इस सिद्धांत के अनुसार अधिकारों का मूल्य इस बात से तय होता है कि वे अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम सुख (greatest happiness of greatest number) प्रदान करते हैं।

Jeremy Bentham ने प्राकृतिक अधिकारों को “nonsense upon stilts” कहा था।

विशेषताएँ

  • सामाजिक हित को प्राथमिकता।
  • व्यावहारिक दृष्टिकोण।

आलोचना

  • अल्पसंख्यकों के अधिकारों की अनदेखी हो सकती है।

आधुनिक संदर्भ में मानवाधिकार

आज मानवाधिकार केवल सिविल और राजनीतिक अधिकारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों को भी शामिल करते हैं।

International Covenant on Civil and Political Rights (ICCPR) और International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights (ICESCR) ने मानवाधिकारों को विधिक बाध्यता प्रदान की।

भारत में Protection of Human Rights Act, 1993 के अंतर्गत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की स्थापना की गई।


निष्कर्ष

मानवाधिकार की अवधारणा मानव सभ्यता की दीर्घ ऐतिहासिक यात्रा का परिणाम है। विभिन्न सिद्धांतों ने इसकी उत्पत्ति और औचित्य को अलग-अलग दृष्टिकोण से समझाया है। प्राकृतिक सिद्धांत ने इसकी दार्शनिक नींव रखी, वैधानिक सिद्धांत ने इसे कानूनी रूप दिया, ऐतिहासिक सिद्धांत ने परंपराओं को महत्व दिया, सामाजिक अनुबंध सिद्धांत ने लोकतंत्र की आधारशिला रखी, और मार्क्सवादी सिद्धांत ने आर्थिक समानता पर बल दिया।

आधुनिक युग में मानवाधिकारों का उद्देश्य केवल राज्य की शक्ति को सीमित करना नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा और समग्र विकास सुनिश्चित करना है। एक लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण में मानवाधिकारों की केंद्रीय भूमिका है।

इस प्रकार, मानवाधिकार केवल विधिक अवधारणा नहीं, बल्कि मानवता की सामूहिक चेतना और नैतिक प्रतिबद्धता का प्रतीक हैं।