“ब्लैक मैजिक” टिप्पणी पर दर्ज साइबर केस निरस्त : Gauhati High Court का अहम फैसला — इन्फ्लुएंसर Abhishek Kar के खिलाफ दंडात्मक धाराएँ लागू करने के तत्व पूरे नहीं पाए गए
असम से सामने आए एक महत्वपूर्ण फैसले में Gauhati High Court ने इन्फ्लुएंसर Abhishek Kar के खिलाफ दर्ज CID साइबर केस को निरस्त (quash) कर दिया। मामला कथित “ब्लैक मैजिक” संबंधी टिप्पणियों से जुड़ा था, जिन्हें लेकर आपराधिक धाराएँ लगाई गई थीं।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि जिन दंडात्मक प्रावधानों का सहारा लेकर मामला दर्ज किया गया, उनके आवश्यक तत्व (ingredients) प्रथम दृष्टया संतुष्ट नहीं होते। इस प्रकार, न्यायालय ने यह माना कि केवल विवादास्पद या असहज टिप्पणी अपने-आप में आपराधिक अपराध का रूप नहीं ले लेती, जब तक कि वह विधिक कसौटी पर खरी न उतरे।
यह निर्णय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, साइबर कानून और आपराधिक प्रक्रिया के दुरुपयोग जैसे प्रश्नों पर व्यापक चर्चा को जन्म देता है।
प्रकरण की पृष्ठभूमि : सोशल मीडिया, टिप्पणी और प्राथमिकी
सूत्रों के अनुसार, इन्फ्लुएंसर द्वारा सोशल मीडिया मंच पर की गई कुछ टिप्पणियों को “ब्लैक मैजिक” या अंधविश्वास से जोड़कर देखा गया। इन टिप्पणियों को लेकर आपत्ति उठी और CID साइबर सेल में प्राथमिकी दर्ज की गई।
एफआईआर में आरोप था कि उक्त टिप्पणियाँ समाज में वैमनस्य फैलाने, अंधविश्वास को बढ़ावा देने या कुछ समूहों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने की श्रेणी में आ सकती हैं।
हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि—
- वक्तव्य सामान्य विमर्श का हिस्सा था,
- उसमें किसी विशिष्ट समुदाय को लक्ष्य नहीं बनाया गया,
- और आपराधिक मंशा (mens rea) का अभाव था।
इन्हीं आधारों पर उच्च न्यायालय के समक्ष धारा 482 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत केस निरस्त करने की मांग की गई।
धारा 482 CrPC : न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियाँ
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में उच्च न्यायालयों को धारा 482 CrPC के अंतर्गत यह शक्ति प्राप्त है कि वे न्याय के हित में या न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए कार्यवाही को निरस्त कर सकें।
सुप्रीम कोर्ट ने कई निर्णयों में स्पष्ट किया है कि यदि आरोपों को उनके पूर्ण रूप में स्वीकार भी कर लिया जाए, फिर भी वे किसी अपराध का गठन नहीं करते, तो ऐसे मामलों को लंबी आपराधिक प्रक्रिया में घसीटना न्याय के हित में नहीं है।
गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने भी इसी सिद्धांत को लागू करते हुए यह परखा कि क्या प्राथमिकी में वर्णित तथ्य वास्तव में लगाए गए दंडात्मक प्रावधानों की आवश्यक शर्तों को पूरा करते हैं।
दंडात्मक धाराओं के “आवश्यक तत्व” (Ingredients) की परीक्षा
किसी भी आपराधिक आरोप को सिद्ध करने के लिए यह आवश्यक है कि—
- कथित कृत्य विधि द्वारा निषिद्ध हो,
- उसमें आवश्यक मानसिक तत्व (mens rea) उपस्थित हो,
- और उसका प्रभाव विधिक रूप से हानिकारक हो।
यदि इन तत्वों में से कोई भी अनुपस्थित है, तो अभियोजन टिक नहीं सकता।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि विवादास्पद टिप्पणियाँ भले ही असहज या असहमति योग्य हों, परंतु वे स्वतः आपराधिक अपराध नहीं बनतीं। जब तक स्पष्ट रूप से वैमनस्य, हिंसा, या विधि-विरुद्ध आचरण को उकसाने का तत्व न हो, दंडात्मक प्रावधानों का सहारा लेना उचित नहीं माना जा सकता।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सीमाएँ
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। हालांकि यह अधिकार पूर्ण नहीं है और अनुच्छेद 19(2) के तहत युक्तिसंगत प्रतिबंधों के अधीन है।
न्यायालयों ने बार-बार कहा है कि असहमति, आलोचना या विवादास्पद अभिव्यक्ति लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा है।
यदि हर अप्रिय या उत्तेजक टिप्पणी को आपराधिक मुकदमे का आधार बना दिया जाए, तो इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
गुवाहाटी उच्च न्यायालय का यह निर्णय इसी संतुलन को रेखांकित करता है—जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच न्यायिक संतुलन आवश्यक है।
साइबर स्पेस और आपराधिक दायित्व
डिजिटल युग में सोशल मीडिया वक्तव्य तुरंत व्यापक प्रसार पा लेते हैं। इससे कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के सामने चुनौती बढ़ जाती है।
परंतु न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि साइबर स्पेस में व्यक्त विचारों पर भी वही विधिक कसौटी लागू होगी जो भौतिक मंचों पर लागू होती है।
सिर्फ इस कारण कि बयान इंटरनेट पर दिया गया, उसे अधिक कठोर आपराधिक दृष्टि से नहीं देखा जा सकता।
इस मामले में अदालत ने यह संकेत दिया कि साइबर कानून का प्रयोग सोच-समझकर होना चाहिए, ताकि वह वैध आलोचना या विमर्श को दबाने का माध्यम न बन जाए।
प्रक्रिया का दुरुपयोग : न्यायालय की चेतावनी
उच्च न्यायालयों ने पूर्व में भी कहा है कि आपराधिक कानून का प्रयोग किसी व्यक्ति को डराने, चुप कराने या प्रताड़ित करने के लिए नहीं होना चाहिए।
यदि प्राथमिकी में अपराध के आवश्यक तत्व अनुपस्थित हों, तो लंबी जांच और मुकदमेबाजी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनुचित भार डालती है।
इस आदेश के माध्यम से गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि दंडात्मक प्रावधानों को केवल तभी लागू किया जाना चाहिए, जब तथ्य और कानून वास्तव में उसका समर्थन करें।
व्यापक प्रभाव
यह निर्णय कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है—
- इन्फ्लुएंसर और कंटेंट क्रिएटर समुदाय के लिए यह आश्वासन कि केवल विवादास्पद अभिव्यक्ति के आधार पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
- कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के लिए यह संकेत कि प्राथमिकी दर्ज करते समय विधिक तत्वों की सावधानीपूर्वक जांच आवश्यक है।
- न्यायिक प्रणाली के लिए यह उदाहरण कि अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग न्याय के हित में किया जा सकता है।
निष्कर्ष : विधिक कसौटी सर्वोपरि
Gauhati High Court द्वारा केस निरस्त करने का यह निर्णय इस सिद्धांत को पुनः पुष्ट करता है कि आपराधिक दायित्व केवल तभी उत्पन्न होता है, जब विधि द्वारा निर्धारित सभी आवश्यक तत्व पूर्ण हों।
विवादास्पद वक्तव्य और आपराधिक अपराध के बीच स्पष्ट अंतर है। लोकतांत्रिक समाज में असहमति, आलोचना और बहस का स्थान सुरक्षित रहना चाहिए—जब तक कि वे कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन न करें।
इस प्रकार, इन्फ्लुएंसर Abhishek Kar के मामले में उच्च न्यायालय का आदेश न केवल एक व्यक्ति को राहत प्रदान करता है, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आपराधिक कानून के संतुलित प्रयोग के सिद्धांत को भी सुदृढ़ करता है।