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‘वीरा राजा वीरा’ विवाद : Supreme Court of India का ए.आर. रहमान और ‘Ponniyin Selvan II’ के निर्माताओं से सवाल

‘वीरा राजा वीरा’ विवाद : Supreme Court of India का ए.आर. रहमान और ‘Ponniyin Selvan II’ के निर्माताओं से सवाल — क्या ‘शिव स्तुति’ की दागरवाणी परंपरा को मिला उचित श्रेय?

      हाल ही में भारतीय न्यायिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरा, जब Supreme Court of India ने प्रसिद्ध संगीतकार A. R. Rahman और तमिल फिल्म ‘Ponniyin Selvan II’ के निर्माताओं से यह पूछा कि क्या यह स्वीकार किया जा सकता है कि फिल्म का गीत “Veera Raja Veera” दागरवाणी परंपरा में जूनियर डागर ब्रदर्स द्वारा प्रस्तुत ‘Shiva Stuti’ से प्रेरित या आंशिक रूप से लिया गया है।

        यह प्रश्न केवल एक फिल्मी गीत तक सीमित नहीं है; यह भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा, बौद्धिक संपदा अधिकार, और सांस्कृतिक श्रेय (attribution) जैसे गंभीर मुद्दों को सामने लाता है।


दागरवाणी परंपरा और जूनियर डागर ब्रदर्स की विरासत

       भारतीय शास्त्रीय संगीत में ध्रुपद शैली को अत्यंत प्राचीन और गंभीर परंपरा माना जाता है। इसी धारा में “दागरवाणी” (Dagarvani) एक विशिष्ट घराना है, जिसकी पहचान गहन आध्यात्मिकता, आलाप की विस्तारशीलता और ध्वनि की सूक्ष्मता से होती है।

      जूनियर डागर ब्रदर्स—जो दागर परिवार की परंपरा के प्रतिनिधि थे—ने ध्रुपद को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। उनकी प्रस्तुत “शिव स्तुति” केवल एक रचना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना का स्वरूप मानी जाती है।

     ऐसे में यदि किसी समकालीन फिल्मी रचना में इस परंपरा की संरचना, स्वर या आलाप शैली का उपयोग हुआ है, तो उसका विधिक और नैतिक विश्लेषण आवश्यक हो जाता है।


‘वीरा राजा वीरा’ : फिल्मी संदर्भ और संगीत संरचना

‘Ponniyin Selvan II’ का निर्देशन Mani Ratnam ने किया है और इसका संगीत A. R. Rahman द्वारा रचा गया है। फिल्म ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित है और संगीत इसकी आत्मा का महत्वपूर्ण अंग है।

“Veera Raja Veera” गीत में ध्रुपद जैसी गंभीरता और संस्कृत श्लोकात्मक शैली का प्रयोग दिखाई देता है। कुछ संगीत पारखियों और याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस गीत की धुन, स्वर-संरचना या प्रस्तुति शैली ‘Shiva Stuti’ से मिलती-जुलती है।

इसी आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने यह प्रश्न उठाया कि क्या इस प्रेरणा या स्रोत को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया जा सकता है।


बौद्धिक संपदा और ‘एट्रिब्यूशन’ का प्रश्न

भारतीय कॉपीराइट कानून के तहत किसी रचना की मौलिकता (originality) और उसके उपयोग का अधिकार स्पष्ट रूप से संरक्षित है।

यदि कोई रचना पारंपरिक या लोक-आधारित है, तो उसके अधिकार का प्रश्न जटिल हो जाता है। ध्रुपद जैसी परंपराएँ सामूहिक सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं, परंतु विशिष्ट प्रस्तुति—जैसे जूनियर डागर ब्रदर्स द्वारा प्रस्तुत ‘Shiva Stuti’—एक विशिष्ट कलात्मक अभिव्यक्ति मानी जा सकती है।

यहाँ दो महत्वपूर्ण पहलू उभरते हैं—

  1. कानूनी अधिकार (Legal Right) – क्या मूल प्रस्तुति कॉपीराइट के अंतर्गत संरक्षित है?
  2. नैतिक अधिकार (Moral Right) – क्या स्रोत को श्रेय देना आवश्यक है, भले ही कानूनी उल्लंघन न हुआ हो?

सर्वोच्च न्यायालय का प्रश्न मुख्यतः दूसरे पहलू—नैतिक श्रेय—पर केंद्रित प्रतीत होता है।


न्यायालय की टिप्पणी का महत्व

Supreme Court of India का यह प्रश्न स्वयं में एक निर्णय नहीं है, बल्कि एक संभावित सहमति (acknowledgment) की दिशा में संकेत है।

यदि न्यायालय यह स्वीकार करवाता है कि गीत की प्रेरणा ‘Shiva Stuti’ से ली गई है, तो यह एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है, जहाँ अदालत सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और पारदर्शिता को प्राथमिकता देती है।

यह भी संभव है कि न्यायालय इस मामले को सुलह या औपचारिक स्वीकारोक्ति के माध्यम से समाप्त करने का सुझाव दे।


कला, प्रेरणा और मौलिकता की सीमा

संगीत की दुनिया में प्रेरणा (inspiration) और अनुकरण (imitation) के बीच की रेखा बहुत पतली होती है।

A. R. Rahman जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संगीतकार ने अपने करियर में भारतीय शास्त्रीय, लोक और पश्चिमी संगीत का समन्वय किया है। उनके कार्यों में परंपरा और आधुनिकता का संगम दिखाई देता है।

परंतु जब किसी विशिष्ट परंपरा या प्रस्तुति से समानता का आरोप लगता है, तो प्रश्न उठता है—
क्या यह केवल शैलीगत समानता है?
या संरचनात्मक स्तर पर भी समानता है?

इन प्रश्नों का उत्तर संगीत विशेषज्ञों की राय और न्यायिक परीक्षण पर निर्भर करेगा।


सांस्कृतिक विरासत की रक्षा बनाम सृजनात्मक स्वतंत्रता

यह विवाद भारतीय कला-जगत के लिए एक व्यापक बहस को जन्म देता है।

एक ओर, परंपरागत घरानों और कलाकारों की विरासत को संरक्षित करना आवश्यक है।
दूसरी ओर, कला में नवाचार और पुनर्सृजन (reinterpretation) की स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

यदि हर शैलीगत समानता को उल्लंघन माना जाए, तो रचनात्मक स्वतंत्रता सीमित हो सकती है। परंतु यदि श्रेय देना ही उद्देश्य हो, तो इससे पारदर्शिता और सम्मान की भावना बढ़ सकती है।


संभावित परिणाम और प्रभाव

इस मामले का परिणाम कई स्तरों पर प्रभाव डाल सकता है—

  1. फिल्म उद्योग – भविष्य में शास्त्रीय रचनाओं के उपयोग में अधिक सावधानी।
  2. शास्त्रीय संगीत समुदाय – अपनी विरासत के संरक्षण को लेकर सजगता।
  3. कानूनी परिदृश्य – पारंपरिक कलाओं के कॉपीराइट संरक्षण पर नई व्याख्या।

यदि अदालत की पहल से किसी प्रकार का औपचारिक श्रेय जोड़ा जाता है, तो यह भारतीय फिल्म संगीत और शास्त्रीय परंपराओं के बीच संतुलन का उदाहरण बन सकता है।


निष्कर्ष : संवाद और संतुलन की आवश्यकता

       ‘वीरा राजा वीरा’ और ‘Shiva Stuti’ का यह विवाद केवल एक गीत का मामला नहीं है; यह भारतीय सांस्कृतिक पहचान, विधिक सिद्धांतों और सृजनात्मक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का प्रश्न है।

        Supreme Court of India द्वारा उठाया गया प्रश्न इस दिशा में एक रचनात्मक पहल के रूप में देखा जा सकता है—जहाँ उद्देश्य दंड देना नहीं, बल्कि सत्यापन और उचित श्रेय सुनिश्चित करना है।

       अंततः कला और कानून का यह संगम हमें यह याद दिलाता है कि परंपरा और नवाचार परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सांस्कृतिक धारा के दो प्रवाह हैं। उचित संवाद और सम्मान के साथ दोनों का समन्वय संभव है—और शायद यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।