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फॉरेंसिक साक्ष्य और जांच प्रक्रिया : वैज्ञानिक प्रमाण, विधिक मान्यता,

फॉरेंसिक साक्ष्य और जांच प्रक्रिया : वैज्ञानिक प्रमाण, विधिक मान्यता, साक्ष्य की शृंखला और न्यायिक परीक्षण का समग्र विश्लेषण

प्रस्तावना

आधुनिक आपराधिक न्याय प्रणाली में फॉरेंसिक विज्ञान (Forensic Science) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है। पहले जहाँ अपराध की जांच मुख्यतः गवाहों के बयान और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित होती थी, वहीं आज डीएनए प्रोफाइलिंग, फिंगरप्रिंट विश्लेषण, साइबर फॉरेंसिक, नार्को-एनालिसिस (सीमित विधिक मान्यता के साथ) और डिजिटल डेटा परीक्षण जैसी तकनीकों ने जांच की दिशा बदल दी है।

फॉरेंसिक साक्ष्य न केवल अपराधी की पहचान स्थापित करने में सहायक होते हैं, बल्कि निर्दोष व्यक्ति को भी बचाने का माध्यम बनते हैं। परंतु वैज्ञानिक साक्ष्य भी विधिक प्रक्रिया और न्यायिक परीक्षण के अधीन होते हैं। इस लेख में फॉरेंसिक साक्ष्य की प्रकृति, जांच प्रक्रिया, विधिक मान्यता और न्यायालयीन दृष्टिकोण का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया जा रहा है।


1. फॉरेंसिक साक्ष्य का अर्थ और प्रकार

“फॉरेंसिक” शब्द लैटिन शब्द Forensis से आया है, जिसका अर्थ है “न्यायालय से संबंधित”। अतः फॉरेंसिक साक्ष्य वे वैज्ञानिक प्रमाण हैं जो न्यायालय में प्रस्तुत किए जाते हैं।

फॉरेंसिक साक्ष्य के प्रमुख प्रकार—

  1. डीएनए साक्ष्य (DNA Evidence)
  2. फिंगरप्रिंट (अंगुलीचिह्न)
  3. बैलिस्टिक साक्ष्य (Ballistics)
  4. रक्त और जैविक नमूने
  5. डिजिटल/साइबर साक्ष्य
  6. हस्तलेखन और दस्तावेज विश्लेषण

इन साक्ष्यों का विश्लेषण विशेषज्ञों द्वारा प्रयोगशाला में किया जाता है और उनकी रिपोर्ट जांच अधिकारी को सौंपी जाती है।


2. विधिक आधार और मान्यता

भारत में फॉरेंसिक साक्ष्य की ग्राह्यता मुख्यतः Indian Evidence Act, 1872 द्वारा निर्धारित होती है।

धारा 45 के अंतर्गत विशेषज्ञ की राय (Expert Opinion) को न्यायालय साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर सकता है। फॉरेंसिक विशेषज्ञ की रिपोर्ट इसी श्रेणी में आती है।

आपराधिक जांच की प्रक्रिया Code of Criminal Procedure, 1973 (CrPC) द्वारा नियंत्रित होती है। धारा 53 और 54 के अंतर्गत अभियुक्त का चिकित्सीय परीक्षण कराया जा सकता है, जिससे डीएनए या अन्य जैविक नमूने लिए जा सकें।

इन प्रावधानों से स्पष्ट है कि वैज्ञानिक जांच को विधिक मान्यता प्राप्त है, परंतु यह संवैधानिक सीमाओं के अधीन है।


3. अपराध स्थल से साक्ष्य संग्रहण की प्रक्रिया

फॉरेंसिक जांच की सफलता काफी हद तक अपराध स्थल (Crime Scene) के संरक्षण पर निर्भर करती है।

जांच की सामान्य प्रक्रिया—

  • स्थल को सुरक्षित करना
  • फोटो और वीडियो रिकॉर्डिंग
  • जैविक नमूनों का सावधानीपूर्वक संग्रह
  • साक्ष्य को सील और लेबल करना
  • जब्ती सूची (Seizure Memo) तैयार करना

इस प्रक्रिया में छोटी सी त्रुटि भी साक्ष्य की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा सकती है।


4. साक्ष्य की शृंखला (Chain of Custody)

फॉरेंसिक साक्ष्य की विश्वसनीयता का सबसे महत्वपूर्ण तत्व “Chain of Custody” है। इसका अर्थ है कि साक्ष्य कब, किसने, कहाँ और कैसे संभाला—इसका पूरा रिकॉर्ड होना चाहिए।

यदि साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ की संभावना हो या रिकॉर्ड में अंतर हो, तो न्यायालय उसकी प्रामाणिकता पर संदेह कर सकता है।

अतः जांच अधिकारी के लिए आवश्यक है कि वह प्रत्येक चरण का विधिवत दस्तावेजीकरण करे।


5. डीएनए और वैज्ञानिक परीक्षण की संवैधानिक सीमा

डीएनए परीक्षण अत्यंत प्रभावी वैज्ञानिक साधन है, परंतु यह व्यक्ति की निजता (Privacy) से भी जुड़ा है।

सर्वोच्च न्यायालय ने Selvi v. State of Karnataka में यह स्पष्ट किया कि नार्को-एनालिसिस, ब्रेन-मैपिंग और पॉलीग्राफ टेस्ट बिना सहमति के नहीं किए जा सकते, क्योंकि यह अनुच्छेद 20(3) के विरुद्ध है।

इसी प्रकार, डीएनए परीक्षण के मामले में भी न्यायालय संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल देता है—अपराध की जांच और व्यक्ति की गरिमा के बीच संतुलन।


6. डिजिटल और साइबर फॉरेंसिक

डिजिटल युग में मोबाइल फोन, लैपटॉप, ईमेल, सीसीटीवी फुटेज और सोशल मीडिया डेटा महत्वपूर्ण साक्ष्य बन चुके हैं।

डिजिटल साक्ष्य की जब्ती और विश्लेषण में तकनीकी विशेषज्ञता आवश्यक है। डेटा की अखंडता (Integrity) बनाए रखने के लिए विशेष सॉफ्टवेयर और प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाता है।

डिजिटल साक्ष्य को न्यायालय में प्रस्तुत करने के लिए प्रमाणपत्र (जैसे धारा 65B, साक्ष्य अधिनियम) आवश्यक होता है।


7. न्यायालय में फॉरेंसिक साक्ष्य का परीक्षण

फॉरेंसिक रिपोर्ट अंतिम सत्य नहीं होती; न्यायालय उसका परीक्षण करता है।

  • विशेषज्ञ से जिरह (Cross-examination) की जा सकती है।
  • रिपोर्ट की वैज्ञानिक विश्वसनीयता जांची जाती है।
  • यदि साक्ष्य की शृंखला में त्रुटि हो, तो न्यायालय उसे अस्वीकार कर सकता है।

न्यायालय इस बात पर भी विचार करता है कि क्या वैज्ञानिक साक्ष्य अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से मेल खाता है।


8. चुनौतियाँ और सुधार की आवश्यकता

भारत में फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं की संख्या सीमित है और लंबित मामलों का बोझ अधिक है। कई बार रिपोर्ट में देरी के कारण न्याय में विलंब होता है।

विशेषज्ञों की कमी, आधुनिक उपकरणों का अभाव और प्रशिक्षण की आवश्यकता भी प्रमुख चुनौतियाँ हैं।

पुलिस और फॉरेंसिक विभाग के बीच बेहतर समन्वय तथा आधुनिक तकनीक का उपयोग आवश्यक है।


निष्कर्ष

फॉरेंसिक साक्ष्य आधुनिक आपराधिक जांच की रीढ़ बन चुके हैं। ये साक्ष्य अपराध की सच्चाई उजागर करने और न्याय सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

किन्तु वैज्ञानिक साक्ष्य भी विधिक और संवैधानिक सीमाओं के अधीन हैं। साक्ष्य का संग्रह, संरक्षण और प्रस्तुतीकरण पूरी पारदर्शिता और सावधानी से होना चाहिए।

जब वैज्ञानिक तकनीक और विधिक प्रक्रिया का संतुलित समन्वय होता है, तभी न्याय प्रणाली प्रभावी और विश्वसनीय बनती है। फॉरेंसिक साक्ष्य केवल तकनीक नहीं, बल्कि न्याय की खोज का आधुनिक साधन हैं।