पुलिस की शक्तियाँ और कर्तव्य : विधिक आधार, संवैधानिक सीमाएँ, मानवाधिकार संरक्षण और न्यायिक व्याख्या का विस्तृत अध्ययन
प्रस्तावना
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। पुलिस केवल अपराधियों को पकड़ने वाली संस्था नहीं है, बल्कि वह राज्य की शांति, सुरक्षा और विधि-व्यवस्था की संरक्षक भी है। समाज में कानून का शासन (Rule of Law) तभी प्रभावी हो सकता है जब पुलिस अपनी शक्तियों का प्रयोग विधि के अनुरूप और अपने कर्तव्यों का पालन निष्पक्षता के साथ करे।
भारत में पुलिस व्यवस्था का ऐतिहासिक विकास औपनिवेशिक काल से जुड़ा है, परंतु स्वतंत्र भारत में इसकी भूमिका और अधिक उत्तरदायित्वपूर्ण और संवैधानिक हो गई है। पुलिस को व्यापक शक्तियाँ दी गई हैं, किन्तु इन शक्तियों पर संविधान और न्यायपालिका द्वारा नियंत्रण भी स्थापित किया गया है। इस लेख में हम पुलिस की शक्तियों और कर्तव्यों का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।
1. पुलिस का विधिक आधार
भारत में पुलिस व्यवस्था का मूल आधार Police Act, 1861 है, जिसे 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजी शासन ने लागू किया था। इसका उद्देश्य प्रशासनिक नियंत्रण और कानून-व्यवस्था बनाए रखना था।
स्वतंत्रता के पश्चात भी यह अधिनियम कई राज्यों में लागू रहा, हालांकि समय-समय पर राज्यों ने अपने-अपने पुलिस अधिनियम बनाए। संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार “पुलिस” राज्य सूची का विषय है, अतः राज्य सरकारें पुलिस के संगठन, नियंत्रण और प्रशासन के लिए उत्तरदायी हैं।
आपराधिक मामलों में पुलिस की कार्यवाही मुख्यतः Code of Criminal Procedure, 1973 (CrPC) द्वारा नियंत्रित होती है।
2. पुलिस की प्रमुख शक्तियाँ
(क) प्राथमिकी दर्ज करने की शक्ति
CrPC की धारा 154 के अंतर्गत पुलिस को संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर FIR दर्ज करने का अधिकार और दायित्व दोनों हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने Lalita Kumari v. Government of Uttar Pradesh में स्पष्ट किया कि संज्ञेय अपराध की सूचना पर FIR दर्ज करना अनिवार्य है।
यह शक्ति नागरिकों के न्याय तक पहुँच के अधिकार से जुड़ी हुई है।
(ख) गिरफ्तारी की शक्ति
CrPC की धारा 41 के अंतर्गत पुलिस को संज्ञेय अपराध में गिरफ्तारी की शक्ति प्राप्त है। किंतु यह शक्ति निरंकुश नहीं है।
सर्वोच्च न्यायालय ने Arnesh Kumar v. State of Bihar में कहा कि गिरफ्तारी आवश्यक और न्यायोचित कारणों पर ही की जानी चाहिए।
इसी प्रकार D.K. Basu v. State of West Bengal में गिरफ्तारी के दौरान मानवाधिकारों की रक्षा हेतु विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए गए।
(ग) तलाशी और जब्ती की शक्ति
पुलिस को अपराध से संबंधित वस्तुओं की तलाशी और जब्ती की शक्ति प्राप्त है। CrPC की धाराओं 93 से 105 तक तलाशी वारंट और जब्ती की प्रक्रिया वर्णित है।
विशेष परिस्थितियों में पुलिस बिना वारंट भी तलाशी ले सकती है, परंतु उसे विधिक प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।
(घ) पूछताछ और जांच की शक्ति
पुलिस को गवाहों के बयान दर्ज करने (धारा 161 CrPC) और साक्ष्य एकत्र करने की शक्ति प्राप्त है।
हालांकि, Indian Evidence Act, 1872 की धारा 25 के अनुसार पुलिस के समक्ष दिया गया स्वीकारोक्ति कथन सामान्यतः न्यायालय में स्वीकार्य नहीं होता।
इससे यह सिद्ध होता है कि जांच की शक्ति भी विधिक नियंत्रण के अधीन है।
3. पुलिस के कर्तव्य
पुलिस की शक्तियाँ तभी सार्थक हैं जब वे अपने कर्तव्यों का ईमानदारी और निष्पक्षता से पालन करें। पुलिस के प्रमुख कर्तव्य निम्नलिखित हैं—
(1) विधि-व्यवस्था बनाए रखना
पुलिस का प्राथमिक कर्तव्य शांति और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना है। दंगे, प्रदर्शन या आपात स्थिति में पुलिस को संतुलित और संयमित भूमिका निभानी चाहिए।
(2) अपराध की रोकथाम
केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई करना ही पर्याप्त नहीं है; अपराध की रोकथाम भी पुलिस का कर्तव्य है। गश्त, खुफिया सूचना और सामुदायिक पुलिसिंग इसके साधन हैं।
(3) निष्पक्ष जांच
जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और पूर्वाग्रह-रहित होनी चाहिए। निर्दोष को फंसाना या दोषी को बचाना दोनों ही विधि के विरुद्ध हैं।
(4) मानवाधिकारों की रक्षा
संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। पुलिस को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसकी कार्रवाई किसी भी व्यक्ति की गरिमा का उल्लंघन न करे।
(5) न्यायालय के प्रति उत्तरदायित्व
पुलिस न्यायालय के प्रति जवाबदेह है। आरोप-पत्र प्रस्तुत करना, साक्ष्य देना और न्यायिक आदेशों का पालन करना उसका कर्तव्य है।
4. संवैधानिक सीमाएँ और न्यायिक नियंत्रण
भारतीय संविधान पुलिस की शक्तियों पर नियंत्रण स्थापित करता है।
अनुच्छेद 20 अभियुक्त को आत्म-अभियोग (Self-incrimination) से संरक्षण देता है।
अनुच्छेद 21 जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है।
अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी के समय अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने Prakash Singh v. Union of India में पुलिस सुधारों के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए, जिनका उद्देश्य पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त कर पेशेवर और उत्तरदायी बनाना था।
5. आधुनिक संदर्भ में पुलिस की भूमिका
आज के समय में साइबर अपराध, संगठित अपराध, मादक पदार्थों की तस्करी और आतंकवाद जैसी चुनौतियाँ सामने हैं। इनसे निपटने के लिए तकनीकी दक्षता, डिजिटल फॉरेंसिक और अंतरराज्यीय समन्वय आवश्यक हो गया है।
साथ ही, पुलिस को सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैलने वाली अफवाहों से भी निपटना पड़ता है।
इन परिस्थितियों में पुलिस की भूमिका और अधिक जिम्मेदार और संवेदनशील हो जाती है।
निष्कर्ष
पुलिस की शक्तियाँ व्यापक हैं, परंतु वे संविधान और विधि की सीमाओं में बंधी हुई हैं। एक लोकतांत्रिक समाज में पुलिस का उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना भी है।
यदि पुलिस अपनी शक्तियों का प्रयोग संयम, निष्पक्षता और विधिक प्रक्रिया के अनुरूप करती है, तो वह न्याय प्रणाली की आधारशिला बनती है। परंतु यदि शक्तियों का दुरुपयोग होता है, तो वही संस्था नागरिक स्वतंत्रता के लिए खतरा बन सकती है।
अतः आवश्यक है कि पुलिस सशक्त भी हो और उत्तरदायी भी—यही विधि के शासन और लोकतंत्र की वास्तविक पहचान है।