आपराधिक षड्यंत्र और सामान्य आशय (Common Intention) : भारतीय न्याय संहिता, 2023 में सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत
भारतीय आपराधिक विधि में यह स्थापित सिद्धांत है कि अपराध केवल व्यक्तिगत कृत्य का परिणाम नहीं होता; कई बार वह सामूहिक योजना और साझा उद्देश्य का परिणाम होता है। जब दो या अधिक व्यक्ति किसी अपराध को करने के लिए मिलकर योजना बनाते हैं या एक समान आशय के साथ कार्य करते हैं, तो उनकी आपराधिक जिम्मेदारी भी साझा होती है।
इसी सिद्धांत को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करते हुए भारतीय न्याय संहिता, 2023 ने आपराधिक षड्यंत्र (Criminal Conspiracy) और सामान्य आशय (Common Intention) की अवधारणाओं को पुनर्संरचित रूप में प्रस्तुत किया है। यह प्रावधान न केवल अपराध की गंभीरता को रेखांकित करता है, बल्कि सामूहिक अपराधों की जटिल प्रकृति को भी समझने का प्रयास करता है।
1. ऐतिहासिक आधार और विधिक विकास
सामूहिक उत्तरदायित्व की अवधारणा पहले भारतीय दंड संहिता, 1860 में निहित थी, विशेषकर धारा 34 (सामान्य आशय) और धारा 120B (आपराधिक षड्यंत्र) के माध्यम से।
इन धाराओं का उद्देश्य यह था कि यदि कई व्यक्तियों ने मिलकर अपराध किया है, तो प्रत्येक को उसके पूरे परिणाम के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सके।
BNS, 2023 ने इन्हीं सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भ में पुनः व्यवस्थित किया है, जिससे भाषा अधिक स्पष्ट और समसामयिक हो सके।
2. सामान्य आशय (Common Intention) का सिद्धांत
सामान्य आशय का अर्थ है – दो या अधिक व्यक्तियों द्वारा पूर्व नियोजित या तत्कालिक रूप से साझा उद्देश्य के साथ किया गया अपराध।
यदि चार व्यक्ति किसी व्यक्ति पर हमला करने का निश्चय करते हैं और उनमें से केवल एक व्यक्ति घातक वार करता है, तो भी अन्य सभी व्यक्तियों को उसी अपराध के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, बशर्ते यह सिद्ध हो कि वे सभी समान उद्देश्य से कार्य कर रहे थे।
सामान्य आशय के लिए निम्न तत्व आवश्यक हैं –
- दो या अधिक व्यक्तियों की सहभागिता।
- साझा उद्देश्य या पूर्व योजना।
- अपराध का उसी उद्देश्य के अनुरूप निष्पादन।
3. आपराधिक षड्यंत्र (Criminal Conspiracy) की अवधारणा
आपराधिक षड्यंत्र तब बनता है जब दो या अधिक व्यक्ति किसी अवैध कार्य को करने या वैध कार्य को अवैध तरीके से करने की सहमति देते हैं।
यहाँ केवल सहमति (Agreement) ही अपराध को जन्म देती है, भले ही अपराध पूर्ण रूप से संपन्न न हुआ हो।
षड्यंत्र का मुख्य तत्व है – “मन की बैठक” (Meeting of Minds)। जब यह सिद्ध हो जाता है कि आरोपियों ने मिलकर योजना बनाई थी, तब षड्यंत्र स्थापित माना जाता है।
4. सामान्य आशय और षड्यंत्र में अंतर
हालाँकि दोनों अवधारणाएँ सामूहिक अपराध से संबंधित हैं, परंतु उनमें अंतर है—
| आधार | सामान्य आशय | आपराधिक षड्यंत्र |
|---|---|---|
| प्रकृति | अपराध के समय साझा उद्देश्य | अपराध से पूर्व सहमति |
| आवश्यक तत्व | संयुक्त कार्यवाही | सहमति ही पर्याप्त |
| साक्ष्य | परिस्थिति जन्य साक्ष्य से सिद्ध | योजना और संचार से सिद्ध |
अतः सामान्य आशय में अपराध का वास्तविक निष्पादन आवश्यक है, जबकि षड्यंत्र में सहमति ही अपराध को जन्म देती है।
5. न्यायिक व्याख्या
सर्वोच्च न्यायालय ने सामान्य आशय और षड्यंत्र की व्याख्या अनेक मामलों में की है।
उदाहरणार्थ, Mahbub Shah v. King Emperor में यह कहा गया कि सामान्य आशय का अर्थ पूर्व नियोजित योजना होना चाहिए।
इसी प्रकार State v. Nalini (राजीव गांधी हत्या मामला) में षड्यंत्र की व्यापक व्याख्या की गई, जहाँ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर षड्यंत्र सिद्ध किया गया।
इन निर्णयों ने यह स्पष्ट किया कि सामूहिक अपराध में प्रत्येक सहभागी की भूमिका का विश्लेषण अत्यंत आवश्यक है।
6. BNS, 2023 का दृष्टिकोण
भारतीय न्याय संहिता, 2023 ने इन अवधारणाओं को अधिक स्पष्ट शब्दों में पुनर्संगठित किया है।
नए प्रावधानों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संगठित अपराध, आतंकवादी गतिविधि या सामूहिक हिंसा जैसे मामलों में प्रत्येक सहभागी की जिम्मेदारी तय की जा सके।
विशेष रूप से डिजिटल युग में षड्यंत्र की प्रकृति बदल गई है— अब योजना ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बनाई जा सकती है, एन्क्रिप्टेड संदेशों के माध्यम से निर्देश दिए जा सकते हैं, और अपराध दूरस्थ स्थान से संचालित हो सकता है।
7. साक्ष्य संबंधी चुनौतियाँ
षड्यंत्र और सामान्य आशय सिद्ध करना सरल नहीं है। प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रायः उपलब्ध नहीं होते; इसलिए परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) का महत्व बढ़ जाता है।
फोन कॉल रिकॉर्ड, ईमेल, चैट संदेश, सीसीटीवी फुटेज और गवाहों के बयान महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यदि अभियोजन यह सिद्ध कर दे कि आरोपियों के बीच निरंतर संपर्क था और उनका उद्देश्य एक ही था, तो सामूहिक उत्तरदायित्व स्थापित किया जा सकता है।
8. दंड का प्रावधान
BNS के अंतर्गत यदि अपराध गंभीर प्रकृति का है— जैसे हत्या, आतंकवाद या राष्ट्र-विरोधी गतिविधि— तो षड्यंत्र में शामिल प्रत्येक व्यक्ति को वही दंड मिल सकता है जो मुख्य अपराधी को मिलता है।
इस प्रकार कानून यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी व्यक्ति केवल यह कहकर बच न सके कि उसने अंतिम कृत्य नहीं किया।
9. आलोचना और सावधानियाँ
हालाँकि सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत अपराध नियंत्रण के लिए आवश्यक है, परंतु इसका दुरुपयोग भी संभव है।
यदि बिना पर्याप्त साक्ष्य के केवल संगति (Association) के आधार पर किसी को षड्यंत्र में शामिल कर लिया जाए, तो यह न्याय के विरुद्ध होगा।
इसलिए न्यायालयों ने बार-बार कहा है कि षड्यंत्र सिद्ध करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं।
10. निष्कर्ष
आपराधिक षड्यंत्र और सामान्य आशय, दोनों ही सामूहिक अपराधों से निपटने के महत्वपूर्ण उपकरण हैं। भारतीय न्याय संहिता, 2023 ने इन सिद्धांतों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में पुनर्स्थापित किया है।
डिजिटल युग में अपराध की प्रकृति बदलने के साथ-साथ कानून को भी लचीला और सुसंगत होना पड़ा है।
अंततः न्यायालयों की भूमिका ही यह सुनिश्चित करेगी कि सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत न्याय और स्वतंत्रता के संतुलन को बनाए रखते हुए लागू किया जाए।