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राजद्रोह से ‘राष्ट्र की संप्रभुता, एकता और अखंडता के विरुद्ध अपराध’ तक :

राजद्रोह से ‘राष्ट्र की संप्रभुता, एकता और अखंडता के विरुद्ध अपराध’ तक : भारतीय न्याय संहिता, 2023 का नया दृष्टिकोण

भारत के आपराधिक विधि ढांचे में वर्ष 2023 एक ऐतिहासिक परिवर्तन का वर्ष माना जाएगा। जब औपनिवेशिक काल की पुरानी दंड व्यवस्था को प्रतिस्थापित करते हुए भारतीय न्याय संहिता, 2023 लागू की गई, तब केवल धाराओं का पुनर्संयोजन ही नहीं हुआ, बल्कि दार्शनिक आधार और शब्दावली में भी व्यापक परिवर्तन किया गया। विशेष रूप से “राजद्रोह” (Sedition) जैसे विवादास्पद अपराध को हटाकर उसके स्थान पर “राष्ट्र की संप्रभुता, एकता और अखंडता के विरुद्ध अपराध” की नई संकल्पना प्रस्तुत की गई।

यह परिवर्तन केवल नाम का नहीं है, बल्कि राज्य और नागरिक के संबंधों को नए संदर्भ में परिभाषित करने का प्रयास है। इस लेख में हम इस बदलाव के ऐतिहासिक, संवैधानिक और व्यावहारिक आयामों का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।


1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : औपनिवेशिक विरासत से मुक्ति

राजद्रोह की अवधारणा का मूल स्रोत ब्रिटिश शासनकाल की भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 124A थी। इस प्रावधान का उपयोग अंग्रेज सरकार ने स्वतंत्रता सेनानियों के विरुद्ध किया।

बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गांधी जैसे नेताओं पर राजद्रोह के मुकदमे चलाए गए। गांधीजी ने अपने मुकदमे में इस धारा को “सबसे घृणित प्रावधान” कहा था।

स्वतंत्रता के बाद भी यह धारा बनी रही और समय-समय पर इसके दुरुपयोग के आरोप लगते रहे। आलोचकों का कहना था कि यह प्रावधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करता है।


2. संवैधानिक दृष्टिकोण और न्यायालय की भूमिका

भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। किंतु अनुच्छेद 19(2) राज्य को युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाने का अधिकार भी प्रदान करता है।

राजद्रोह की वैधता पर सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार विचार किया। विशेष रूप से Kedar Nath Singh v. State of Bihar में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल वही वक्तव्य राजद्रोह होगा जो हिंसा को उकसाए या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरे में डाले।

इसके बाद भी विभिन्न मामलों में यह प्रश्न उठता रहा कि क्या सरकार की आलोचना को राजद्रोह माना जा सकता है।


3. भारतीय न्याय संहिता, 2023 में नया प्रावधान

भारतीय न्याय संहिता, 2023 ने “राजद्रोह” शब्द को हटाकर एक व्यापक और पुनर्परिभाषित अपराध को शामिल किया है, जो राष्ट्र की संप्रभुता, एकता और अखंडता के विरुद्ध कृत्यों को दंडनीय बनाता है।

अब केवल सरकार की आलोचना या असहमति व्यक्त करना अपराध नहीं माना जाएगा, जब तक कि वह प्रत्यक्ष रूप से हिंसा, सशस्त्र विद्रोह या अलगाववाद को प्रोत्साहित न करे।

इस बदलाव का उद्देश्य यह बताया गया है कि लोकतांत्रिक असहमति और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के बीच स्पष्ट रेखा खींची जाए।


4. आवश्यक तत्व (Essential Ingredients)

नए प्रावधान के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए निम्न तत्वों का होना आवश्यक है—

  1. राष्ट्र की संप्रभुता, एकता या अखंडता के विरुद्ध स्पष्ट कृत्य।
  2. हिंसा, सशस्त्र विद्रोह या अलगाववादी गतिविधि को उकसाने का उद्देश्य।
  3. कृत्य का प्रत्यक्ष या संभावित प्रभाव राज्य की सुरक्षा पर पड़ना।

इन तत्वों के अभाव में केवल असहमति या आलोचना को अपराध नहीं माना जाएगा।


5. दंड का प्रावधान

नए प्रावधान के तहत कठोर कारावास, आजीवन कारावास और जुर्माने का प्रावधान किया गया है। यदि अपराध के परिणामस्वरूप हिंसा या मृत्यु होती है, तो दंड और भी कठोर हो सकता है।

इस प्रकार विधायिका ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए कठोर दंड व्यवस्था सुनिश्चित की है।


6. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संतुलन

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना नागरिकों का अधिकार है। यदि प्रत्येक आलोचना को राष्ट्र-विरोधी मान लिया जाए, तो लोकतंत्र कमजोर हो जाएगा।

नई संहिता का दावा है कि वह आलोचना और विध्वंसक गतिविधियों के बीच अंतर स्थापित करती है। किंतु व्यवहार में यह संतुलन कैसे कायम रहेगा, यह न्यायपालिका की व्याख्या पर निर्भर करेगा।


7. व्यावहारिक चुनौतियाँ

हालाँकि शब्दावली बदली गई है, परंतु यह आशंका बनी हुई है कि यदि जांच एजेंसियाँ व्यापक व्याख्या करें तो दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

डिजिटल युग में सोशल मीडिया पोस्ट, भाषण और ऑनलाइन अभियान की निगरानी एक जटिल प्रश्न बन चुका है। अतः जांच और अभियोजन में सावधानी अपेक्षित है।


8. अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य

विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों में राजद्रोह संबंधी कानूनों को या तो समाप्त कर दिया गया है या सीमित कर दिया गया है। भारत में भी यह परिवर्तन उसी दिशा में एक कदम माना जा सकता है, बशर्ते इसका उपयोग संयम और न्यायसंगत ढंग से किया जाए।


9. आलोचना और समर्थन

सरकार का तर्क है कि नया प्रावधान राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करेगा।
वहीं आलोचकों का मत है कि जब तक स्पष्ट दिशा-निर्देश और न्यायिक नियंत्रण नहीं होगा, तब तक दुरुपयोग की संभावना बनी रहेगी।

इसलिए आवश्यक है कि न्यायालय संतुलित व्याख्या करें और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित करें।


10. निष्कर्ष

“राजद्रोह” से “राष्ट्र की संप्रभुता, एकता और अखंडता के विरुद्ध अपराध” तक की यात्रा केवल कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि वैचारिक परिवर्तन भी है।

भारतीय न्याय संहिता, 2023 ने औपनिवेशिक विरासत से अलग हटकर एक नई शब्दावली और संरचना प्रस्तुत की है।

अब यह न्यायपालिका, अभियोजन और नागरिक समाज की जिम्मेदारी है कि इस प्रावधान का उपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करते हुए किया जाए।

यदि इसका क्रियान्वयन संतुलित और न्यायसंगत ढंग से हुआ, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करेगा; अन्यथा यह वही विवाद दोहरा सकता है जो राजद्रोह कानून के साथ वर्षों तक जुड़ा रहा।


प्रश्न 1. भारतीय न्याय संहिता, 2023 में राजद्रोह के स्थान पर कौन-सा नया प्रावधान लाया गया है?

उत्तर:
भारतीय न्याय संहिता, 2023 में पारंपरिक “राजद्रोह” शब्द को हटाकर “राष्ट्र की संप्रभुता, एकता और अखंडता के विरुद्ध अपराध” का नया प्रावधान शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य केवल सरकार की आलोचना को दंडित करना नहीं, बल्कि उन कृत्यों को रोकना है जो सशस्त्र विद्रोह, अलगाववाद या राज्य की सुरक्षा को प्रत्यक्ष खतरा उत्पन्न करें। यह बदलाव औपनिवेशिक सोच से हटकर लोकतांत्रिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।


प्रश्न 2. पुराने राजद्रोह कानून और नए प्रावधान में मुख्य अंतर क्या है?

उत्तर:
पुराना राजद्रोह कानून भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 124A के अंतर्गत था, जिसमें “सरकार के प्रति घृणा या अवमानना” उत्पन्न करना भी अपराध की श्रेणी में आ सकता था। नए प्रावधान में केवल वही कृत्य अपराध होंगे जो राष्ट्र की संप्रभुता, एकता या अखंडता को वास्तविक और प्रत्यक्ष खतरा पहुँचाते हों। इस प्रकार, असहमति और राष्ट्र-विरोधी गतिविधि के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करने का प्रयास किया गया है।


प्रश्न 3. क्या सरकार की आलोचना अब भी अपराध मानी जाएगी?

उत्तर:
नहीं। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। यदि आलोचना शांतिपूर्ण है और वह हिंसा या विद्रोह को उकसाने का उद्देश्य नहीं रखती, तो उसे अपराध नहीं माना जाएगा। यह सिद्धांत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Kedar Nath Singh v. State of Bihar में भी प्रतिपादित किया गया था, जहाँ कहा गया कि केवल हिंसा को उकसाने वाले वक्तव्य ही दंडनीय होंगे।


प्रश्न 4. इस नए अपराध के आवश्यक तत्व क्या हैं?

उत्तर:
नए प्रावधान के तहत निम्न तत्व आवश्यक हैं—

  1. राष्ट्र की संप्रभुता, एकता या अखंडता के विरुद्ध कृत्य।
  2. हिंसा, सशस्त्र विद्रोह या अलगाववादी गतिविधि को प्रोत्साहित करने का उद्देश्य।
  3. कृत्य का सार्वजनिक व्यवस्था या राज्य की सुरक्षा पर प्रत्यक्ष प्रभाव।

इन तत्वों के अभाव में सामान्य असहमति या राजनीतिक विरोध अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा।


प्रश्न 5. इस प्रावधान के दुरुपयोग की संभावना को कैसे रोका जा सकता है?

उत्तर:
दुरुपयोग रोकने के लिए न्यायिक निगरानी, स्पष्ट अभियोजन दिशानिर्देश और सख्त साक्ष्य मानक आवश्यक हैं। पुलिस एवं जांच एजेंसियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि केवल गंभीर और प्रमाणित मामलों में ही आरोप लगाए जाएँ। न्यायालयों की संतुलित व्याख्या और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा इस प्रावधान के न्यायसंगत प्रयोग की कुंजी होगी।