सुनील भारती मित्तल बनाम सीबीआई (2015): कॉरपोरेट आपराधिक उत्तरदायित्व और ‘पद आधारित अभियोजन’ पर सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक स्पष्टता
प्रस्तावना
भारतीय आपराधिक न्यायशास्त्र में कॉरपोरेट अपराध (Corporate Crime) और निदेशकों/सीईओ की व्यक्तिगत आपराधिक उत्तरदायित्व (Personal Criminal Liability) का प्रश्न लंबे समय से बहस का विषय रहा है। क्या किसी कंपनी के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति—जैसे चेयरमैन, सीईओ या डायरेक्टर—को केवल उनके पद के आधार पर आपराधिक मुकदमे में घसीटा जा सकता है?
इस महत्वपूर्ण प्रश्न का निर्णायक उत्तर Supreme Court of India ने अपने ऐतिहासिक निर्णय Sunil Bharti Mittal v. CBI (2015) में दिया। यह मामला तथाकथित 2G स्पेक्ट्रम आवंटन प्रकरण की पृष्ठभूमि में सामने आया था और इसने कॉरपोरेट प्रशासन तथा आपराधिक कानून की सीमाओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया।
पृष्ठभूमि: 2G स्पेक्ट्रम प्रकरण और अभियोजन
2G स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में आरोप था कि दूरसंचार लाइसेंसों के आवंटन में अनियमितताएँ हुईं, जिससे सरकारी खजाने को भारी क्षति पहुँची। जांच एजेंसी Central Bureau of Investigation (सीबीआई) ने कुछ कंपनियों के साथ-साथ उनके शीर्ष अधिकारियों को भी अभियुक्त बनाया।
इनमें प्रमुख नामों में से एक थे Sunil Bharti Mittal, जो एक प्रमुख दूरसंचार कंपनी के चेयरमैन थे। प्रश्न यह था कि क्या उन्हें केवल इसलिए अभियुक्त बनाया जा सकता है क्योंकि वे कंपनी के शीर्ष पद पर थे, जबकि आरोपित कृत्य में उनकी प्रत्यक्ष भूमिका का स्पष्ट उल्लेख नहीं था?
मुख्य विधिक प्रश्न
- क्या कंपनी के सीईओ/चेयरमैन/डायरेक्टर को केवल पद के आधार पर अभियुक्त बनाया जा सकता है?
- क्या आपराधिक दायित्व के लिए ‘विकेरियस लायबिलिटी’ स्वतः लागू हो जाती है?
- क्या मजिस्ट्रेट बिना पर्याप्त साक्ष्य के शीर्ष प्रबंधन को समन जारी कर सकता है?
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सर्वोच्च न्यायालय ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा:
आपराधिक कानून में ‘विकेरियस लायबिलिटी’ (Vicarious Liability) सामान्य सिद्धांत नहीं है। इसे तभी लागू किया जा सकता है जब कोई विशेष विधि ऐसा स्पष्ट रूप से प्रावधान करे।
न्यायालय ने यह भी कहा कि:
- कंपनी एक अलग विधिक इकाई (Separate Legal Entity) है।
- कंपनी के प्रत्येक निदेशक या अधिकारी को कंपनी के प्रत्येक अपराध के लिए स्वतः जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
- अभियोजन को यह दिखाना होगा कि संबंधित अधिकारी की अपराध में प्रत्यक्ष भूमिका (Active Role) या ‘Mens Rea’ थी।
‘कॉरपोरेट वील’ और व्यक्तिगत दायित्व
न्यायालय ने ‘लिफ्टिंग द कॉरपोरेट वील’ (Lifting the Corporate Veil) के सिद्धांत पर भी प्रकाश डाला। सामान्यतः कंपनी और उसके निदेशक अलग-अलग विधिक इकाइयाँ माने जाते हैं।
यदि यह सिद्ध हो जाए कि निदेशक ने कंपनी को अपराध के साधन के रूप में उपयोग किया, तो व्यक्तिगत दायित्व तय किया जा सकता है।
परंतु बिना किसी ठोस आरोप या साक्ष्य के केवल पद के आधार पर अभियोजन करना विधि के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
मजिस्ट्रेट की शक्ति और सीमाएँ
इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि मजिस्ट्रेट द्वारा समन जारी करने की प्रक्रिया पर भी न्यायालय ने टिप्पणी की।
न्यायालय ने कहा:
- समन जारी करना एक गंभीर न्यायिक कृत्य है।
- मजिस्ट्रेट को यह देखना चाहिए कि रिकॉर्ड में ऐसा पर्याप्त सामग्री (Sufficient Material) है जिससे प्रथम दृष्टया अपराध बनता हो।
- केवल जांच एजेंसी की रिपोर्ट पर निर्भर होकर बिना विश्लेषण के समन जारी करना न्यायोचित नहीं है।
इस प्रकार, यह निर्णय न्यायिक विवेक (Judicial Application of Mind) की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
विकेरियस लायबिलिटी की सीमाएँ
भारतीय दंड संहिता (IPC) के अंतर्गत सामान्यतः किसी व्यक्ति को दूसरे के कार्य के लिए आपराधिक रूप से उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।
कुछ विशेष अधिनियम—जैसे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, खाद्य सुरक्षा अधिनियम, कंपनी अधिनियम—में स्पष्ट प्रावधान है कि “जो व्यक्ति व्यवसाय के संचालन के लिए उत्तरदायी है” उसे भी दोषी माना जाएगा।
परंतु इन मामलों में भी अभियोजन को यह साबित करना पड़ता है कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में नियंत्रण और संचालन में था।
निर्णय के प्रमुख सिद्धांत
1. पद के आधार पर अभियोजन अस्वीकार्य
सीईओ या डायरेक्टर होने मात्र से व्यक्ति को आरोपी नहीं बनाया जा सकता।
2. प्रत्यक्ष भूमिका आवश्यक
अभियोजन को स्पष्ट रूप से बताना होगा कि अपराध में उसकी क्या भूमिका थी।
3. न्यायिक विवेक का प्रयोग
मजिस्ट्रेट को समन जारी करते समय स्वतंत्र रूप से सामग्री का परीक्षण करना होगा।
4. कॉरपोरेट और व्यक्तिगत दायित्व में भेद
कंपनी और उसके अधिकारियों के दायित्व को अलग-अलग समझा जाएगा।
कॉरपोरेट गवर्नेंस पर प्रभाव
इस निर्णय का कॉरपोरेट जगत पर गहरा प्रभाव पड़ा।
- शीर्ष प्रबंधन को अनावश्यक आपराधिक मुकदमों से राहत मिली।
- कंपनियों में निर्णय लेने की स्वतंत्रता को मजबूती मिली।
- निवेशकों के बीच विश्वास बढ़ा कि केवल पद के कारण आपराधिक जोखिम नहीं उठाना पड़ेगा।
आलोचनात्मक दृष्टिकोण
कुछ आलोचकों का मत है कि यह निर्णय कॉरपोरेट अधिकारियों को अत्यधिक संरक्षण देता है। उनका तर्क है कि शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों को नीतिगत और प्रशासनिक जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए।
परंतु न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि साक्ष्य उपलब्ध हो तो ऐसे अधिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई संभव है। निर्णय केवल “पद आधारित अभियोजन” को अस्वीकार करता है, अपराधियों को संरक्षण नहीं देता।
अन्य प्रासंगिक निर्णयों से संबंध
यह निर्णय बाद के मामलों में भी उद्धृत किया गया और यह सिद्धांत स्थापित किया गया कि:
- शिकायत में विशिष्ट आरोप आवश्यक हैं।
- केवल सामान्य या अस्पष्ट आरोप पर्याप्त नहीं हैं।
- व्यक्तिगत भूमिका का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।
इस प्रकार, यह निर्णय भारतीय आपराधिक न्यायशास्त्र में एक मानक (Precedent) बन गया।
व्यापक विधिक महत्व
- आपराधिक कानून में व्यक्तिगत दोष सिद्ध करने के सिद्धांत को सुदृढ़ किया।
- कॉरपोरेट संरचना और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित किया।
- न्यायिक प्रक्रिया में सावधानी और विवेक को अनिवार्य बनाया।
निष्कर्ष
सुनील भारती मित्तल बनाम सीबीआई (2015) का निर्णय भारतीय कॉरपोरेट कानून और आपराधिक न्यायशास्त्र में मील का पत्थर है।
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि—
“केवल पद के आधार पर किसी सीईओ या निदेशक को आपराधिक कार्यवाही में शामिल नहीं किया जा सकता। अभियोजन को उसकी प्रत्यक्ष संलिप्तता या अपराध में सक्रिय भूमिका सिद्ध करनी होगी।”
यह निर्णय न केवल कॉरपोरेट अधिकारियों को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता और निष्पक्षता को भी सुदृढ़ करता है।
भारतीय विधि प्रणाली में यह फैसला आज भी कॉरपोरेट आपराधिक उत्तरदायित्व के मामलों में मार्गदर्शक के रूप में उद्धृत किया जाता है और यह सिद्ध करता है कि न्याय केवल शक्ति का प्रयोग नहीं, बल्कि विधिक सिद्धांतों की रक्षा का माध्यम है।