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शिव कुमार जटिया बनाम राज्य (2019, सुप्रीम कोर्ट): कंपनी निदेशकों की आपराधिक उत्तरदायित्व

शिव कुमार जटिया बनाम राज्य (2019, सुप्रीम कोर्ट): कंपनी निदेशकों की आपराधिक उत्तरदायित्व पर ऐतिहासिक निर्णय

प्रस्तावना

भारतीय दंड न्यायशास्त्र में यह प्रश्न लंबे समय से विवाद का विषय रहा है कि किसी कंपनी द्वारा किए गए अपराध के लिए उसके प्रबंध निदेशक (MD) या निदेशक मंडल के सदस्यों को किस सीमा तक आपराधिक रूप से उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। क्या केवल पद पर आसीन होना ही अभियोजन के लिए पर्याप्त है? या फिर अभियोजन पक्ष को यह सिद्ध करना आवश्यक है कि संबंधित निदेशक की प्रत्यक्ष संलिप्तता थी?

इन प्रश्नों का महत्वपूर्ण उत्तर सर्वोच्च न्यायालय ने Supreme Court of India के निर्णय Shiv Kumar Jatia v. State of NCT of Delhi (2019) में दिया। यह निर्णय कॉरपोरेट आपराधिक उत्तरदायित्व (Corporate Criminal Liability) के क्षेत्र में एक मील का पत्थर माना जाता है।


वाद की पृष्ठभूमि

इस मामले में दिल्ली स्थित एक होटल में आग लगने की घटना हुई, जिसमें एक विदेशी नागरिक की मृत्यु हो गई। होटल का संचालन एक कंपनी द्वारा किया जा रहा था। घटना के पश्चात पुलिस ने कंपनी के साथ-साथ उसके प्रबंध निदेशक शिव कुमार जटिया के विरुद्ध भी आपराधिक प्रकरण दर्ज किया।

आरोप यह था कि सुरक्षा मानकों के उल्लंघन के कारण यह दुर्घटना हुई। अभियोजन पक्ष ने यह तर्क दिया कि कंपनी के शीर्ष पदाधिकारी होने के नाते एमडी को भी जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

यहीं से यह मूल प्रश्न उत्पन्न हुआ—क्या केवल “एमडी” या “डायरेक्टर” होने के कारण किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ेगा, भले ही उसके विरुद्ध प्रत्यक्ष आरोप न हों?


मुख्य विधिक प्रश्न

  1. क्या कंपनी के एमडी या निदेशक को केवल पद के आधार पर अभियुक्त बनाया जा सकता है?
  2. क्या अभियोजन को यह दिखाना आवश्यक है कि वह व्यक्ति “व्यवसाय के संचालन के लिए उत्तरदायी” था?
  3. क्या प्रत्यक्ष संलिप्तता (Direct Involvement) का स्पष्ट उल्लेख आवश्यक है?

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि—

केवल यह तथ्य कि कोई व्यक्ति कंपनी का एमडी या निदेशक है, उसे स्वतः आपराधिक उत्तरदायित्व के दायरे में नहीं लाता।

न्यायालय ने कहा कि अभियोजन को यह दर्शाना होगा कि:

  • संबंधित निदेशक कंपनी के दैनिक कार्यों के संचालन में सक्रिय रूप से संलग्न था,
  • अपराध के घटित होने में उसकी प्रत्यक्ष भूमिका या लापरवाही थी,
  • शिकायत या चार्जशीट में उसके विरुद्ध विशिष्ट आरोप (Specific Allegations) दर्ज हों।

यदि शिकायत में केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोप हों, तो ऐसे अभियोजन को निरस्त किया जा सकता है।


कॉरपोरेट आपराधिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत

भारतीय विधि में कंपनी को “कृत्रिम विधिक व्यक्ति” (Artificial Legal Person) माना जाता है। कंपनी स्वयं कार्य नहीं करती, बल्कि उसके निदेशक, प्रबंधक और कर्मचारी कार्य करते हैं।

परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि हर निदेशक स्वतः प्रत्येक अपराध के लिए दोषी होगा। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि—

  • कंपनी और उसके निदेशक अलग-अलग विधिक इकाइयाँ हैं।
  • व्यक्तिगत आपराधिक उत्तरदायित्व के लिए व्यक्तिगत दोष (Personal Mens Rea) आवश्यक है।

यह सिद्धांत भारतीय दंड संहिता और अन्य विशेष अधिनियमों की व्याख्या के अनुरूप है।


‘विकेरियस लायबिलिटी’ (Vicarious Liability) की सीमा

विकेरियस लायबिलिटी का अर्थ है—एक व्यक्ति को दूसरे के कार्य के लिए उत्तरदायी ठहराना। आपराधिक कानून में यह सिद्धांत सामान्यतः लागू नहीं होता, जब तक कि कोई विशेष विधि ऐसा प्रावधान न करे।

उदाहरण के लिए, कुछ विशेष अधिनियमों—जैसे पर्यावरण संरक्षण कानून, कंपनी अधिनियम आदि—में यह प्रावधान है कि यदि कंपनी अपराध करती है, तो उसके “व्यवसाय के संचालन के लिए उत्तरदायी” व्यक्ति भी दोषी होंगे।

परंतु ऐसे मामलों में भी यह आवश्यक है कि:

  • अभियोजन यह बताए कि कौन व्यक्ति वास्तविक नियंत्रण में था,
  • और अपराध उसकी जानकारी या सहमति से हुआ।

पूर्ववर्ती निर्णयों का संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय में अपने पूर्व के कई फैसलों का हवाला दिया, जिनमें यह स्थापित किया गया था कि:

  • केवल पदनाम के आधार पर अभियोजन नहीं हो सकता,
  • शिकायत में स्पष्ट आरोप होना आवश्यक है,
  • अभियुक्त की भूमिका का विशिष्ट उल्लेख होना चाहिए।

इस प्रकार, शिव कुमार जटिया का निर्णय न्यायिक दृष्टिकोण की निरंतरता को दर्शाता है।


निर्णय के प्रमुख सिद्धांत

1. पद के आधार पर दायित्व नहीं

एमडी या डायरेक्टर होना अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं है।

2. विशिष्ट आरोप आवश्यक

शिकायत में यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति ने क्या भूमिका निभाई।

3. प्रत्यक्ष संलिप्तता का प्रमाण

यदि अभियोजन यह नहीं दिखा पाता कि व्यक्ति की प्रत्यक्ष भागीदारी थी, तो अभियोजन टिक नहीं पाएगा।

4. दुरुपयोग से संरक्षण

यह निर्णय कॉरपोरेट अधिकारियों को अनावश्यक आपराधिक मुकदमों से बचाने का सुरक्षा कवच प्रदान करता है।


व्यावहारिक प्रभाव

इस निर्णय का प्रभाव कॉरपोरेट जगत पर व्यापक पड़ा है:

  • कंपनियों के निदेशक अब केवल पद के कारण अभियुक्त नहीं बनाए जा सकते।
  • पुलिस और अभियोजन एजेंसियों को अधिक सावधानी बरतनी होगी।
  • शिकायतकर्ता को स्पष्ट तथ्यों के साथ आरोप लगाने होंगे।

यह निर्णय व्यापारिक वातावरण को स्थिरता प्रदान करता है और अनावश्यक उत्पीड़न को रोकता है।


आलोचनात्मक विश्लेषण

कुछ विधि विशेषज्ञों का मत है कि यह निर्णय कॉरपोरेट अधिकारियों को अत्यधिक संरक्षण देता है। उनका तर्क है कि शीर्ष प्रबंधन को सुरक्षा मानकों और नीतियों की निगरानी करनी चाहिए।

परंतु न्यायालय का दृष्टिकोण संतुलित है। यदि प्रत्यक्ष लापरवाही या संलिप्तता सिद्ध हो जाए, तो निदेशक पूर्णतः उत्तरदायी होंगे।


भारतीय दंड संहिता और कंपनी अधिनियम का संबंध

भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध सिद्ध करने के लिए ‘अपराध करने का इरादा’ (Mens Rea) और ‘अपराध का कृत्य’ (Actus Reus) दोनों आवश्यक हैं।

कंपनी अधिनियम में निदेशकों की जिम्मेदारी को परिभाषित किया गया है, परंतु आपराधिक उत्तरदायित्व के लिए व्यक्तिगत भूमिका का प्रमाण अनिवार्य है।


निर्णय का व्यापक महत्व

यह निर्णय निम्न कारणों से ऐतिहासिक है—

  1. कॉरपोरेट प्रशासन (Corporate Governance) को स्पष्ट दिशा मिली।
  2. आपराधिक मुकदमों के दुरुपयोग पर अंकुश लगा।
  3. न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्षता और संतुलन स्थापित हुआ।

निष्कर्ष

शिव कुमार जटिया बनाम राज्य (2019) का निर्णय यह स्पष्ट करता है कि—

“किसी कंपनी के एमडी या निदेशक को तभी आपराधिक रूप से उत्तरदायी ठहराया जा सकता है जब उसके विरुद्ध प्रत्यक्ष संलिप्तता या स्पष्ट लापरवाही का ठोस आरोप और प्रमाण हो।”

यह निर्णय भारतीय कॉरपोरेट कानून और आपराधिक न्यायशास्त्र में संतुलन का उत्कृष्ट उदाहरण है। इससे यह सिद्धांत स्थापित हुआ कि न्याय केवल दंड देने का माध्यम नहीं, बल्कि निष्पक्षता और तर्कसंगतता का प्रतीक है।

कॉरपोरेट जगत, विधि व्यवसाय और न्यायपालिका—तीनों के लिए यह निर्णय मार्गदर्शक सिद्ध हुआ है।