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भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 10 : दुष्प्रेरण (Abetment) का सिद्धांत, दंड और न्यायिक दृष्टिकोण

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 10 : दुष्प्रेरण (Abetment) का सिद्धांत, दंड और न्यायिक दृष्टिकोण का विस्तृत विश्लेषण

प्रस्तावना

भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था में 1 जुलाई 2024 से एक ऐतिहासिक परिवर्तन आया जब भारतीय न्याय संहिता, 2023 लागू हुई। इसने लगभग डेढ़ शताब्दी से लागू भारतीय दंड संहिता, 1860 का स्थान लिया।

नई संहिता का उद्देश्य केवल भाषा परिवर्तन नहीं, बल्कि अपराध की बदलती प्रकृति—विशेषकर संगठित अपराध, डिजिटल अपराध और अप्रत्यक्ष अपराध—को ध्यान में रखते हुए विधि को अधिक प्रभावी बनाना है।

इसी क्रम में धारा 10 अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उस व्यक्ति को दंडित करने का प्रावधान करती है जो स्वयं अपराध नहीं करता, लेकिन अपराध करवाता है — अर्थात् दुष्प्रेरक (Abettor)।


धारा 10 का विधिक स्वरूप

धारा 10 का सार यह है कि:

यदि कोई व्यक्ति किसी अपराध का दुष्प्रेरण करता है और उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप अपराध वास्तव में किया जाता है, तो दुष्प्रेरक को उसी अपराध के लिए निर्धारित दंड से दंडित किया जाएगा।

यह प्रावधान अपराध के “मास्टरमाइंड” या “पृष्ठभूमि में कार्य करने वाले व्यक्ति” को भी कानून के दायरे में लाता है।


दुष्प्रेरण (Abetment) की संकल्पना

दुष्प्रेरण का अर्थ है — किसी अपराध को करवाने के लिए जानबूझकर प्रेरित करना, सहायता देना या षड्यंत्र करना।

दुष्प्रेरण मुख्यतः तीन प्रकार से होता है:

1. उकसावा (Instigation)

जब कोई व्यक्ति दूसरे को अपराध करने के लिए प्रेरित करता है।

2. षड्यंत्र (Conspiracy)

जब दो या अधिक व्यक्ति अपराध करने की योजना बनाते हैं और उस योजना के अनुसार कार्य होता है।

3. जानबूझकर सहायता (Intentional Aid)

जब कोई व्यक्ति अपराध करने में साधन, संसाधन या सहयोग उपलब्ध कराता है।


धारा 10 लागू होने की शर्तें

धारा 10 के अंतर्गत दोषसिद्धि के लिए निम्न तत्वों का होना आवश्यक है:

  1. दुष्प्रेरण का स्पष्ट प्रमाण
  2. दुष्प्रेरित अपराध का वास्तव में घटित होना
  3. दुष्प्रेरण और अपराध के बीच प्रत्यक्ष संबंध
  4. आपराधिक मंशा (Mens Rea)

यदि अपराध घटित नहीं होता, तो अलग प्रावधान लागू हो सकते हैं; किंतु धारा 10 तभी लागू होगी जब अपराध वास्तव में किया गया हो।


उदाहरण द्वारा समझें

उदाहरण 1 – हत्या का मामला

‘अ’ ने ‘ब’ को अपने दुश्मन की हत्या करने के लिए उकसाया और हथियार उपलब्ध कराया।
‘ब’ ने हत्या कर दी।

→ ‘अ’ को भी हत्या के अपराध के लिए वही दंड मिलेगा जो ‘ब’ को मिलेगा।

उदाहरण 2 – आर्थिक अपराध

किसी कंपनी का निदेशक कर्मचारियों को फर्जी दस्तावेज तैयार करने के लिए निर्देश देता है।
कर्मचारी दस्तावेज तैयार करते हैं और धोखाधड़ी होती है।

→ निदेशक धारा 10 के अंतर्गत दोषी होगा।


IPC और BNS के बीच तुलना

पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता, 1860 में दुष्प्रेरण से संबंधित प्रावधान धारा 107 से 109 तक थे।

नई भारतीय न्याय संहिता, 2023 ने इन सिद्धांतों को आधुनिक रूप में पुनर्गठित किया है।

मुख्य परिवर्तन:

  • भाषा अधिक स्पष्ट
  • दंड का सीधा संबंध मुख्य अपराध से
  • डिजिटल साक्ष्यों को अधिक महत्व
  • संगठित अपराध पर सख्त दृष्टिकोण

दंड का स्वरूप

धारा 10 के अंतर्गत:

  • दुष्प्रेरक को वही दंड मिलेगा जो मुख्य अपराधी को।
  • यदि मुख्य अपराध के लिए आजीवन कारावास है, तो दुष्प्रेरक को भी वही दंड।
  • यदि मुख्य अपराध जुर्माना या साधारण कारावास है, तो वही लागू।

यह सिद्धांत “समान दायित्व” (Equal Liability) पर आधारित है।


न्यायिक व्याख्या

Supreme Court of India ने अनेक मामलों में स्पष्ट किया है कि:

  • केवल उपस्थित रहना पर्याप्त नहीं।
  • मौन समर्थन पर्याप्त नहीं।
  • सक्रिय भागीदारी या उकसावा आवश्यक है।
  • मानसिक तत्व (Mens Rea) सिद्ध होना चाहिए।

न्यायालय यह भी देखता है कि क्या दुष्प्रेरक का इरादा स्पष्ट और ठोस था।


आत्महत्या के मामलों में दुष्प्रेरण

यदि कोई व्यक्ति निरंतर उत्पीड़न, धमकी या मानसिक प्रताड़ना द्वारा किसी को आत्महत्या के लिए मजबूर करता है और वह व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है, तो दुष्प्रेरण सिद्ध होने पर धारा 10 लागू हो सकती है।

ऐसे मामलों में न्यायालय परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को गंभीरता से देखता है।


डिजिटल युग में धारा 10 का महत्व

आज अपराध केवल भौतिक उपस्थिति से नहीं होते। सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप और ऑनलाइन मंचों के माध्यम से भी अपराध प्रेरित किए जाते हैं।

उदाहरण:

  • व्हाट्सएप समूह में हिंसा के लिए उकसाना
  • सोशल मीडिया पर भड़काऊ भाषण
  • साइबर ठगी के लिए तकनीकी सहायता देना

इन सभी में दुष्प्रेरण सिद्ध होने पर धारा 10 लागू हो सकती है।


साक्ष्य और प्रमाण

दुष्प्रेरण सिद्ध करने के लिए:

  • प्रत्यक्ष साक्ष्य
  • परिस्थितिजन्य साक्ष्य
  • इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड
  • कॉल डिटेल रिकॉर्ड
  • चैट और ईमेल

न्यायालय इन सबका समग्र मूल्यांकन करता है।


धारा 10 की सीमाएँ

  • केवल संदेह के आधार पर दोषसिद्धि नहीं।
  • दुष्प्रेरण और अपराध के बीच स्पष्ट संबंध आवश्यक।
  • स्वतंत्र साक्ष्य से पुष्टि आवश्यक।

सामाजिक महत्व

धारा 10 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि:

  • अपराध के पीछे छिपे लोग बच न सकें।
  • संगठित अपराध पर रोक लगे।
  • समाज में दंड का भय बना रहे।

यह प्रावधान न्याय के उस सिद्धांत को पुष्ट करता है कि —

“अपराध करवाने वाला भी उतना ही दोषी है जितना अपराध करने वाला।”


निष्कर्ष

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 10 भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था का एक सशक्त स्तंभ है। यह प्रावधान अपराध की जड़ पर प्रहार करता है और सुनिश्चित करता है कि अपराध का “मास्टरमाइंड” कानून से बच न सके।

आधुनिक युग में जब अपराध संगठित और तकनीकी रूप से जटिल होते जा रहे हैं, धारा 10 का महत्व और भी बढ़ जाता है।

यह केवल दंड का प्रावधान नहीं, बल्कि न्याय और उत्तरदायित्व का सिद्धांत है — जो यह स्पष्ट करता है कि अपराध में प्रत्यक्ष या परोक्ष भागीदारी, दोनों ही समान रूप से दंडनीय हैं।


भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 10 – 10 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर


प्रश्न 1: भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 10 किस विषय से संबंधित है?

उत्तर:
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 10 दुष्प्रेरण (Abetment) से संबंधित है। यह प्रावधान उस स्थिति को नियंत्रित करता है जब कोई व्यक्ति स्वयं अपराध नहीं करता, बल्कि किसी अन्य को अपराध करने के लिए उकसाता, सहायता करता या षड्यंत्र करता है। यदि उसके दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप अपराध वास्तव में घटित हो जाता है, तो वह व्यक्ति उसी अपराध के लिए निर्धारित दंड से दंडित होगा।


प्रश्न 2: दुष्प्रेरण (Abetment) का अर्थ क्या है?

उत्तर:
दुष्प्रेरण का अर्थ है किसी व्यक्ति को अपराध करने के लिए प्रेरित करना, सहयोग देना या योजना बनाना। यह तीन रूपों में हो सकता है— (1) उकसावा, (2) षड्यंत्र, (3) जानबूझकर सहायता। यदि इन कार्यों के कारण अपराध घटित हो जाता है, तो दुष्प्रेरण सिद्ध माना जाता है।


प्रश्न 3: धारा 10 के अंतर्गत दंड का स्वरूप क्या है?

उत्तर:
धारा 10 के अनुसार दुष्प्रेरक को वही दंड मिलेगा जो मुख्य अपराधी को मिलता है। यदि अपराध के लिए आजीवन कारावास निर्धारित है, तो दुष्प्रेरक को भी वही दंड मिल सकता है। इसका आधार “समान दायित्व” का सिद्धांत है।


प्रश्न 4: धारा 10 लागू होने की आवश्यक शर्तें क्या हैं?

उत्तर:
धारा 10 के लिए आवश्यक है—

  1. दुष्प्रेरण का अस्तित्व
  2. अपराध का वास्तव में होना
  3. दुष्प्रेरण और अपराध के बीच प्रत्यक्ष संबंध
  4. आपराधिक मंशा (Mens Rea)

इन तत्वों के बिना दोषसिद्धि संभव नहीं।


प्रश्न 5: क्या केवल उपस्थिति दुष्प्रेरण मानी जाएगी?

उत्तर:
नहीं। केवल घटनास्थल पर उपस्थित रहना पर्याप्त नहीं है। सक्रिय उकसावा, सहायता या षड्यंत्र का प्रमाण होना चाहिए। इस संबंध में Supreme Court of India ने स्पष्ट किया है कि दुष्प्रेरण के लिए स्पष्ट और ठोस साक्ष्य आवश्यक हैं।


प्रश्न 6: क्या डिजिटल माध्यम से दुष्प्रेरण संभव है?

उत्तर:
हाँ। सोशल मीडिया, व्हाट्सएप, ईमेल या अन्य डिजिटल माध्यम से अपराध के लिए उकसाना भी दुष्प्रेरण माना जा सकता है। आधुनिक अपराधों को ध्यान में रखते हुए धारा 10 का दायरा व्यापक है।


प्रश्न 7: यदि अपराध नहीं होता तो क्या धारा 10 लागू होगी?

उत्तर:
यदि दुष्प्रेरित अपराध घटित नहीं होता, तो धारा 10 सीधे लागू नहीं होगी। ऐसी स्थिति में अन्य संबंधित प्रावधान लागू हो सकते हैं। धारा 10 तब लागू होती है जब अपराध वास्तव में किया गया हो।


प्रश्न 8: धारा 10 और भारतीय दंड संहिता, 1860 में क्या अंतर है?

उत्तर:
पूर्व में दुष्प्रेरण से संबंधित प्रावधान भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 107 से 109 तक थे। नई संहिता में भाषा अधिक स्पष्ट और आधुनिक है तथा दंड का सीधा संबंध मुख्य अपराध से जोड़ा गया है।


प्रश्न 9: आत्महत्या के मामलों में धारा 10 कैसे लागू हो सकती है?

उत्तर:
यदि कोई व्यक्ति किसी को आत्महत्या के लिए उकसाता है और उसके परिणामस्वरूप आत्महत्या हो जाती है, तो दुष्प्रेरण सिद्ध होने पर संबंधित धारा के साथ धारा 10 लागू हो सकती है। न्यायालय परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का मूल्यांकन करता है।


प्रश्न 10: धारा 10 का सामाजिक महत्व क्या है?

उत्तर:
धारा 10 का उद्देश्य अपराध के पीछे छिपे व्यक्तियों को दंडित करना है। यह सुनिश्चित करती है कि “मास्टरमाइंड” या परोक्ष रूप से अपराध करवाने वाला व्यक्ति कानून से बच न सके। इससे समाज में कानून का भय और न्याय की प्रभावशीलता बनी रहती है।