दिवालियापन और ऋण समाधान: भारतीय विधिक ढांचा, प्रक्रियाएँ और आर्थिक प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण
प्रस्तावना
आधुनिक आर्थिक व्यवस्था में ऋण (Debt) एक आवश्यक साधन है, जिसके माध्यम से उद्योग, व्यापार और व्यक्ति अपने विकास के लक्ष्य प्राप्त करते हैं। परंतु जब ऋण का भुगतान समय पर नहीं हो पाता, तब “दिवालियापन” (Insolvency) की स्थिति उत्पन्न होती है। दिवालियापन केवल एक व्यक्ति या कंपनी की समस्या नहीं, बल्कि यह संपूर्ण वित्तीय प्रणाली को प्रभावित करने वाला विषय है।
भारत में इस समस्या के समाधान हेतु दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (Insolvency and Bankruptcy Code – IBC) लागू की गई। इस संहिता ने ऋण समाधान की प्रक्रिया को समयबद्ध, पारदर्शी और प्रभावी बनाने का प्रयास किया है।
1. दिवालियापन का अर्थ और अवधारणा
(1) दिवालियापन (Insolvency)
जब कोई व्यक्ति या कंपनी अपनी देनदारियों का भुगतान करने में असमर्थ हो जाती है, तो उसे दिवालिया कहा जाता है।
(2) दिवाला (Bankruptcy)
दिवालियापन की विधिक घोषणा, जिसके अंतर्गत न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ऋणों का निपटान किया जाता है।
2. IBC से पूर्व की स्थिति
IBC लागू होने से पहले भारत में कई कानून थे, जैसे—
- कंपनी अधिनियम
- ऋण वसूली अधिकरण अधिनियम
- SARFAESI अधिनियम
इन कानूनों के अंतर्गत प्रक्रियाएँ लंबी और जटिल थीं। परिणामस्वरूप ऋण वसूली में वर्षों लग जाते थे।
3. IBC, 2016 की विशेषताएँ
- समयबद्ध प्रक्रिया – 180 दिन (अधिकतम 330 दिन) में समाधान।
- ऋणदाता-प्रधान व्यवस्था – निर्णय का अधिकार वित्तीय ऋणदाताओं को।
- एकीकृत कानून – कॉर्पोरेट, साझेदारी फर्म और व्यक्तिगत दिवालियापन के लिए समान ढांचा।
- राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) के माध्यम से सुनवाई।
4. कॉर्पोरेट दिवालियापन समाधान प्रक्रिया (CIRP)
चरण 1: आवेदन
वित्तीय या परिचालन ऋणदाता NCLT में आवेदन प्रस्तुत करता है।
चरण 2: अंतरिम समाधान पेशेवर (IRP) की नियुक्ति
IRP कंपनी के प्रबंधन का नियंत्रण संभालता है।
चरण 3: ऋणदाताओं की समिति (CoC)
CoC कंपनी के भविष्य पर निर्णय लेती है।
चरण 4: समाधान योजना
यदि 66% बहुमत से योजना स्वीकृत हो जाती है, तो NCLT उसे अनुमोदित करता है।
यदि समाधान संभव नहीं हो, तो परिसमापन (Liquidation) की प्रक्रिया शुरू होती है।
5. NCLT और NCLAT की भूमिका
- राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) – प्रथम स्तर पर मामलों की सुनवाई करता है।
- राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) – अपील की सुनवाई करता है।
अंतिम अपील भारत का सर्वोच्च न्यायालय में की जा सकती है।
6. ऋणदाताओं के प्रकार
- वित्तीय ऋणदाता (Financial Creditors) – बैंक और वित्तीय संस्थाएँ।
- परिचालन ऋणदाता (Operational Creditors) – आपूर्तिकर्ता, कर्मचारी आदि।
IBC में वित्तीय ऋणदाताओं को प्राथमिक निर्णय अधिकार प्राप्त है।
7. मोरेटोरियम (Moratorium)
आवेदन स्वीकार होते ही धारा 14 के अंतर्गत मोरेटोरियम लागू हो जाता है।
इस अवधि में—
- कोई नया मुकदमा दायर नहीं किया जा सकता।
- संपत्ति की जब्ती पर रोक रहती है।
- कंपनी को पुनर्गठन का अवसर मिलता है।
8. परिसमापन (Liquidation)
यदि समाधान योजना असफल हो जाती है, तो कंपनी की संपत्तियों को बेचकर ऋणदाताओं में वितरण किया जाता है।
वितरण का क्रम IBC की धारा 53 में निर्धारित है—
- परिसमापन लागत
- सुरक्षित ऋणदाता
- असुरक्षित ऋणदाता
- शेयरधारक
9. व्यक्तिगत दिवालियापन
IBC में व्यक्तिगत और साझेदारी फर्मों के दिवालियापन का भी प्रावधान है।
हालाँकि, इसका पूर्ण कार्यान्वयन अभी चरणबद्ध रूप से किया जा रहा है।
10. IBC का आर्थिक प्रभाव
- बैंकिंग क्षेत्र में NPA (Non-Performing Assets) में कमी
- ऋण वसूली में तेजी
- विदेशी निवेशकों का विश्वास बढ़ा
- व्यवसाय करने की सुगमता (Ease of Doing Business) में सुधार
11. प्रमुख न्यायिक निर्णय
(1) Swiss Ribbons Pvt. Ltd. v. Union of India
सुप्रीम कोर्ट ने IBC की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।
(2) Essar Steel Case
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि CoC के व्यावसायिक निर्णय में न्यायालय सीमित हस्तक्षेप करेगा।
12. चुनौतियाँ और आलोचना
- NCLT में लंबित मामलों की संख्या
- परिसमापन दर अपेक्षाकृत अधिक
- छोटे परिचालन ऋणदाताओं की सीमित भूमिका
13. बैंकिंग प्रणाली से संबंध
IBC का सीधा प्रभाव बैंकिंग प्रणाली पर पड़ा है।
जब कंपनियाँ समय पर ऋण नहीं चुकातीं, तो बैंक NCLT के माध्यम से समाधान प्रक्रिया प्रारंभ कर सकते हैं। इससे वित्तीय अनुशासन मजबूत हुआ है।
14. वैश्विक परिप्रेक्ष्य
अमेरिका में “Chapter 11 Bankruptcy” मॉडल है, जबकि यूके में “Administration” प्रक्रिया लागू है।
IBC ने इन अंतरराष्ट्रीय मॉडलों से प्रेरणा लेकर भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढांचा तैयार किया है।
15. व्यावहारिक उदाहरण
यदि किसी कंपनी ने बैंक से 500 करोड़ रुपये का ऋण लिया और भुगतान में असफल रही, तो बैंक NCLT में आवेदन करेगा।
- मोरेटोरियम लागू होगा
- IRP नियुक्त होगा
- CoC समाधान योजना पर विचार करेगी
यदि कोई निवेशक कंपनी को पुनर्जीवित करने की योजना प्रस्तुत करता है और CoC उसे स्वीकृत कर देती है, तो कंपनी बच सकती है।
16. दिवालियापन और ऋण समाधान का सामाजिक प्रभाव
- रोजगार संरक्षण
- निवेशकों का विश्वास
- आर्थिक स्थिरता
IBC का उद्देश्य केवल परिसमापन नहीं, बल्कि “व्यवसाय को जीवित रखना” है।
निष्कर्ष
दिवालियापन और ऋण समाधान की प्रभावी व्यवस्था किसी भी विकसित अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य है।
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 ने भारत में ऋण समाधान की प्रक्रिया को एक नया आयाम दिया है। यह कानून समयबद्ध, पारदर्शी और ऋणदाता-प्रधान प्रणाली स्थापित करता है।
हालाँकि चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं, परंतु यह संहिता भारतीय वित्तीय प्रणाली को सुदृढ़ और उत्तरदायी बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम सिद्ध हुई है।
इस प्रकार, दिवालियापन कानून न केवल ऋण वसूली का साधन है, बल्कि आर्थिक पुनर्गठन और विकास का माध्यम भी है।