मैक्स बूपा द्वारा मातृत्व बीमा दावा अस्वीकृत: ‘थैलेसीमिया माइनर’ के आधार पर इनकार और उपभोक्ता आयोग की सख्त टिप्पणी
प्रस्तावना: मातृत्व सुरक्षा या अनुबंध की बारीकियाँ?
भारत में स्वास्थ्य बीमा अब केवल अस्पताल के बिलों का भुगतान करने का साधन नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक सुरक्षा का आधार बन चुका है। विशेषकर मातृत्व (Maternity) कवर को लेकर युवा दंपत्तियों में जागरूकता बढ़ी है। लेकिन जब बीमा कंपनियाँ दावों को तकनीकी आधारों पर अस्वीकार करती हैं, तो यह केवल अनुबंध का विवाद नहीं रहता—यह उपभोक्ता अधिकारों और सेवा की गुणवत्ता का प्रश्न बन जाता है।
हाल ही में एक प्रकरण में Max Bupa Health Insurance (वर्तमान में Niva Bupa के नाम से परिचित) द्वारा एक मातृत्व बीमा दावा इस आधार पर अस्वीकृत कर दिया गया कि बीमाधारक ने “थैलेसीमिया माइनर” (Thalassemia Minor) की जानकारी पॉलिसी लेते समय उजागर नहीं की थी। कंपनी का तर्क था कि यह “मटेरियल नॉन-डिस्क्लोज़र” है।
मामला अंततः Chandigarh District Consumer Disputes Redressal Commission के समक्ष पहुँचा, जहाँ आयोग ने बीमा कंपनी की कार्रवाई को “सेवा में कमी” (Deficiency in Service) माना।
प्रकरण की पृष्ठभूमि: क्या था विवाद?
बीमाधारक महिला ने अपनी स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी के अंतर्गत मातृत्व कवर लिया था। प्रतीक्षा अवधि (waiting period) पूरी होने के बाद उसने प्रसव से संबंधित अस्पताल खर्चों के लिए दावा प्रस्तुत किया।
बीमा कंपनी ने जांच के दौरान पाया कि महिला “थैलेसीमिया माइनर” से ग्रसित है और यह तथ्य पॉलिसी प्रस्ताव फॉर्म में प्रकट नहीं किया गया था। कंपनी ने दावा खारिज करते हुए कहा:
- बीमाधारक ने एक महत्वपूर्ण चिकित्सीय तथ्य छुपाया।
- यह “उत्कृष्ट सद्भावना” (Utmost Good Faith) के सिद्धांत का उल्लंघन है।
- यदि यह जानकारी पहले दी जाती तो पॉलिसी की शर्तें भिन्न हो सकती थीं।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता का तर्क था:
- थैलेसीमिया माइनर एक हल्की आनुवंशिक स्थिति है।
- इसका प्रसव या मातृत्व उपचार से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है।
- दावा केवल प्रसव खर्च के लिए था, न कि किसी रक्त संबंधी जटिलता के लिए।
थैलेसीमिया माइनर: क्या यह गंभीर जोखिम है?
थैलेसीमिया माइनर (Carrier State) सामान्यतः एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति को गंभीर लक्षण नहीं होते। यह पूर्ण विकसित थैलेसीमिया मेजर से भिन्न है। अधिकांश मामलों में:
- व्यक्ति सामान्य जीवन जीता है।
- विशेष चिकित्सा हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होती।
- गर्भावस्था पर इसका सीमित या नगण्य प्रभाव होता है, जब तक कोई जटिलता न हो।
ऐसे में प्रश्न यह उठा कि क्या इस स्थिति का मातृत्व खर्च से कोई सीधा संबंध था?
उपभोक्ता आयोग की दृष्टि: तकनीकी आधार बनाम न्यायसंगतता
Chandigarh District Consumer Disputes Redressal Commission ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया:
- बीमा कंपनियाँ अनुबंध की बारीकियों का दुरुपयोग नहीं कर सकतीं।
- यदि अस्वीकृति का आधार मातृत्व दावे से असंबंधित है, तो यह अनुचित है।
- “मटेरियल फैक्ट” (Material Fact) वही माना जाएगा जिसका सीधे उस दावे से संबंध हो।
आयोग ने माना कि केवल इस आधार पर कि बीमाधारक ने थैलेसीमिया माइनर का उल्लेख नहीं किया, मातृत्व दावा अस्वीकार करना तर्कसंगत नहीं है।
इस प्रकार, आयोग ने इसे “Deficiency in Service” ठहराया और बीमा कंपनी को भुगतान करने का निर्देश दिया।
बीमा अनुबंध और ‘Utmost Good Faith’ का सिद्धांत
बीमा अनुबंधों में “उत्कृष्ट सद्भावना” का सिद्धांत लागू होता है, जिसके अनुसार बीमाधारक को सभी महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा करना होता है।
परंतु न्यायालयों ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि:
- हर तथ्य “मटेरियल” नहीं होता।
- तथ्य वही महत्वपूर्ण है जो जोखिम को वास्तविक रूप से प्रभावित करता हो।
- असंबंधित जानकारी छुपाने को आधार बनाकर हर दावा अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
यदि बीमा कंपनी यह सिद्ध नहीं कर पाती कि उस जानकारी से जोखिम मूल्यांकन प्रभावित हुआ होता, तो दावा अस्वीकृति न्यायोचित नहीं मानी जाएगी।
मातृत्व कवर: विशेष प्रावधान और विवाद
मातृत्व बीमा कवर में सामान्यतः:
- प्रतीक्षा अवधि (2–4 वर्ष)
- प्रसव खर्च
- नवजात शिशु का प्रारंभिक कवर
- सी-सेक्शन व सामान्य डिलीवरी खर्च
शामिल होते हैं।
यह कवर विशेष रूप से परिवार नियोजन और सुरक्षित मातृत्व को बढ़ावा देने के उद्देश्य से होता है। ऐसे में यदि बीमा कंपनियाँ तकनीकी आधारों पर दावे अस्वीकार करें, तो यह पॉलिसी के उद्देश्य को ही विफल कर देता है।
उपभोक्ता संरक्षण कानून की भूमिका
भारत में उपभोक्ता संरक्षण कानून उपभोक्ताओं को अनुचित व्यापार प्रथाओं और सेवा में कमी के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है।
जब बीमा कंपनी अनुचित या असंगत आधारों पर दावा अस्वीकार करती है, तो उपभोक्ता आयोग हस्तक्षेप कर सकता है।
इस मामले में आयोग ने स्पष्ट संकेत दिया कि:
- बीमा कंपनियों को पारदर्शिता रखनी होगी।
- अनुबंध की व्याख्या उपभोक्ता के विरुद्ध अत्यधिक कठोर तरीके से नहीं की जा सकती।
- मातृत्व जैसे संवेदनशील मामलों में मानवीय दृष्टिकोण आवश्यक है।
न्यायिक दृष्टांत: पूर्व निर्णयों का प्रभाव
भारत के विभिन्न उच्च न्यायालयों और राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने पूर्व में भी यह माना है कि:
- “Non-disclosure” तभी प्रासंगिक है जब वह जोखिम को प्रभावित करे।
- तकनीकी आधारों पर दावे अस्वीकार करना अनुचित व्यापार व्यवहार हो सकता है।
- बीमा कंपनियाँ केवल ‘fine print’ के आधार पर जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं।
यह निर्णय उसी न्यायिक प्रवृत्ति की पुष्टि करता है।
सामाजिक और नीतिगत प्रभाव
यह मामला केवल एक बीमाधारक का व्यक्तिगत विवाद नहीं है। इसके व्यापक प्रभाव हैं:
- बीमा उद्योग पर संदेश – अनुबंध की शर्तों का दुरुपयोग नहीं चलेगा।
- उपभोक्ता जागरूकता – दावे अस्वीकृत होने पर कानूनी उपाय उपलब्ध हैं।
- मातृत्व सुरक्षा – महिलाओं के अधिकारों को संरक्षण।
मातृत्व एक जैविक और सामाजिक जिम्मेदारी है। इसे अनुबंध की तकनीकी व्याख्याओं में उलझाना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
बीमा कंपनियों के लिए सबक
- प्रस्ताव फॉर्म को स्पष्ट और सरल बनाना।
- जोखिम मूल्यांकन में वैज्ञानिक आधार अपनाना।
- दावे अस्वीकृति में पारदर्शिता रखना।
- संवेदनशील मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना।
उपभोक्ताओं के लिए सलाह
- पॉलिसी लेते समय सभी ज्ञात चिकित्सीय स्थितियों का खुलासा करें।
- प्रस्ताव फॉर्म की प्रति अपने पास रखें।
- दावा अस्वीकृत होने पर कारण लिखित में लें।
- आवश्यकता होने पर उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज करें।
निष्कर्ष: अनुबंध से परे न्याय का संतुलन
Max Bupa Health Insurance के इस मामले में Chandigarh District Consumer Disputes Redressal Commission का निर्णय यह स्पष्ट करता है कि बीमा अनुबंध केवल कागजी दस्तावेज नहीं हैं; वे सामाजिक सुरक्षा के उपकरण हैं।
यदि बीमा कंपनियाँ असंबंधित तथ्यों के आधार पर दावे अस्वीकार करेंगी, तो न्यायिक संस्थाएँ हस्तक्षेप करेंगी।
यह निर्णय बीमा उद्योग और उपभोक्ताओं दोनों के लिए एक संतुलित संदेश है—
पारदर्शिता, प्रासंगिकता और न्यायसंगतता ही बीमा अनुबंध की आधारशिला है।